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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 294 of 415

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Page 294

२४४ सौन्दर्य लहरी
जैसे स्त्रियां मांग में सिंदुर भरती हैं उसी प्रकार मानो देवी
के मुख कमल की अरुणिमा केशों की मांग में सिंदूर सी चमकती
हुई मूर्धा पर बह रही है । मानों उदय कालीन सूर्य की लाल
किरणें रात्रि के अन्धकार को चीरना चाहती हैं । परन्तु अन्धकार
रूपी दुश्मनों ने उसको कैद कर लिया है ।
स्रोत का प्रवाह ऊपर से निम्न तल पर हुआ करता है, परन्तु
भगवती की शोभा की कान्ति उर्ध्व गामिनी है । उसे योगियों में
ज्ञान के सूर्य के उदय होने से पूर्व प्रकट होने वाले प्रातिभ ज्ञान के
सदृश समझना चाहिये ।
अलकों का ध्यानः—
( ४५ )
अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभसश्रीभिरलकैः
परीतं ते वक्त्रं परिहसति पंकेरुह रुचिम् ।
दरस्मेरे यस्मिन्दशन रुचि किंजल्करुचिरे
सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहन चक्षुर्मधुलिहः ॥
कठिन शब्दों का अर्थः— अराल=घुंघराले; कलभ=बच्चा; स्मेर=
मुस्कराहट; दर=किंचित्, थोडी; किंजल्क=स्फटिक; मधुलिह=भौरा;
अलक=जुल्फ ।
अर्थः—स्वाभाविक घुंघराली जवान भौंरा की कांतियुक्त
अलकावलि से घिरा हुआ तेरा मुख, कमलों की शोभा का