सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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मुकुट का ध्यान
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गतैर्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सान्द्रघटितं
किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः
स नीडेयच्छायाच्छुरणशबलं चन्द्रशकलं
धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥
कठिन शब्दों के अर्थः— सान्द्रं घटितं=घनी भूत पास २ जडे
हुए. नीडे=घोंसले में. छायाच्छुरण=मणियों की द्युति की चमक.
शकल=टुकडा. शौनासीरं=इन्द्र का. धिषणा=समझ, धारणा.
अर्थः— हे हिमाचल की पुत्रि ! जो मनुष्य तेरे सुवर्ण
के बने हुए किरीट का वर्णन करे तो उसकी धारणा ऐसी क्यों
न होगी, कि मानो इन्द्र धनुष निकला हुआ है । क्योंकि वह
किरीट गगन मणियों अर्थात तारागण रूपी मणियों से घनीभूत
जडा हुआ है और चन्द्रमा के टुकडे का पक्षि के घोंसले सदृश
जान पडता है और जो उपः कालीन प्रकाश में रंगबरंगा चमक
रहा है ।
अर्थात् उषः कालीन आकाश प्रकृति देवी का किरीट है ।
यहां कृष्णा चतुर्दशी और अमावस्या की संधि में पडने वाले उषः
काल का चित्र खेचा गया है । कृष्णा चतुर्दशी भगवती की उपासना
के लिये उपयुक्त तिथि समझी जाती है अर्थात वह भगवती का ही