सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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है। यहां पर तो सत्य ब्रह्म का भर्गम् (तेज) और उसकी शक्ति एक
ही जान पड़ती है। सारा जगत्-पिण्ड और ब्रह्मांड उसी की परिणति
मात्र है। शक्तिमान अपनी शक्ति के रूप में व्यक्त होता है, और
शक्ति की द्युति उस ही की ज्योति का प्रकाश है। अर्थात् शक्ति
में वह स्वयं चमकता है अथवा यों कहें कि शक्ति स्वयं शक्तिमान
का तेजोमय प्रसार है, जिसकी अभिव्यक्ति किसी स्तर पर चेतनवत्
दिखती है, और किसी स्तर पर जडवत् । जडचेतन की विभाग
रेखा शक्ति और तेज दोनों की भिन्नता का मिथ्या ज्ञान है। और
यदि दोनों को भिन्न मानें तो दोनों का इतरेत्तर अध्यास रूपी एक
का दूसरे के धर्मों का अपने ऊपर अध्यारोपण कर लेना भी मिथ्या
ज्ञान है। क्योंकि शक्ति में परिणामी धर्म स्पष्ट है परन्तु तेज का
चेतन स्वरूप धर्म अपरिणामी है। परन्तु जड शरीर में चेतन के
धर्मों का अध्यारोपण होने से चेतना भी परिणामिनीसी दीख पडती
है, यद्यपि वह मौलिक रूप से अपरिणामी है. केवल उसकी जड
शरीर पर पडने वाली छाया परिणामीवत् प्रतीत होती है। अर्थात्
'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' के मुख को ढकने वाला हिरण्यमय पात्र तेजो-
मय आजमान है, उस तेज में शक्ति है और शक्ति में तेज है।
तेज से शक्ति में कांति है और उसकी तेजोमई प्रभा आदिमूल
शक्ति की प्रत्येक स्तर की परिणति में चमक रही है। विद्युत-अणु
में वह विद्युत् है और प्रत्येक विद्युत्-कण उसके तेज से परिपूर्ण है।
अग्नि सूर्य सब में शक्ति है और शक्ति कहीं भी तेज से रहित
नहीं। शक्ति रजोगुण और तमोगुण की विरोधी सापेक्षिक सक्रिय
और क्रिया रहित परिणामों युक्त अनेक रूपों का स्वांग भरकर सर्वत्र