सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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समया देवी मे समयाचार की उपास्य देवी निर्दिष्ट है, लास्य
भगवती के नृत्य का नाम है और ताण्डव शंकर के नृत्य का नाम
है । नवरस युक्त ताण्डव नृत्य को महा ताण्डव कहते हैं । नौ रस
ये हैं— १. शृंगार, २. विभत्स, ३. रौद्र, ४. अद्भुत, ५. भयानक
६. वीर, ७. हास्य, ८. करुणा, ९. शान्त । ये नौरस साहित्य,
कविता, नृत्य और गान विद्या के अंग हैं । नवात्मा शिवजी को
कहते हैं, जिसकी व्याख्या ऊपर श्लोक ३४ के नीचे दी जा चुकी है ।
आधार चक्र में प्राण के निरोध होने पर योगी नृत्य करने
लगता है, कहा है
आधार वात रोधेन शरीरं कम्पते यदा,
आधारवात रोधेन योगी नृत्यति सर्वदा ॥ यो. शि. ६ २८)
आधारवात रोधेन विश्वं तत्रैव दृश्यते ।
सृष्टिराधारमाधारमाधारे सर्व देवताः
आधारे सर्ववेदाश्चतस्मादाधारमाश्रयेत् ॥ (६, २९.)
अर्थ:— आधार चक्र में जब प्राण शक्ति का निरोध होता
है, तब शरीर कांपने लगता है योगी नृत्य करने लगता है, और वहाँ
ही विश्व दिखने लगता है । आधार चक्र में जो सृष्टि का आधार
है, सब देवता, सब वेद रहते हैं । इसलिये आधार चक्र का आश्रय
लेना चाहिये ।
समया देवी का नाम मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्रों के
ध्यान में मिलता है, अन्य चक्रों के ध्यान में नहीं, इससे यह प्रतीत