सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
Page 296 of 415
Read in context२४६ सौन्दर्य लहरी
चन्द्रमा से अमृत का स्राव होता ही है उससे मानों दोनों कलाएं
जुड़कर पूर्ण चन्द्रमा बन गया है दोनों कलाओं की दोनों नोक एक
दूसरे से मिलकर जुड गई हैं और बीच का अवकाश अमृत से लिप
कर पूर्णिमा के चन्द्रवत् चमकने लगा है ।
भ्रुकुटि का ध्यानः—
(४७)
भ्रुवौ भुग्ने किंचिद् भुवनभयभङ्गव्यसनि नि
त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम् ।
धनुर्मन्ये मव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः
प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— भुग्न=त्योरी; रतिपति=कामदेव;
प्रकोष्ठ=मुट्ठी का ऊपरी भाग, कलाई पोंहचा ।
अर्थ:—हे भुवन के भय का नाश करने में आनन्द लेने
वाली उमे ! भ्रुवों की त्योरी चढने पर मैं उसकी बायें हाथ में लिये
हुए कामदेव के धनुष् से उपमा देता हूं, जिसकी प्रत्यंचा भौरों की
कांति वाले तेरे दोनों नेत्रों की बनी है, और जिसका मध्य भाग
मुट्ठी के और कलाई के नीचे छुपा हुआ है ।
भाव यह है कि भगवती जगत् के भय का नाश करने के लिये
सदा उद्यत रहती है और कामदेव का धनुष् इस कार्य के लिये वह