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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 293

सौन्दर्य लहरी २४३
से प्रतीत होते हैं। वैसे ही भगवती के केशों का ध्यान अज्ञान को
दूर करने वाला है। भगवती के केश स्वयं सुगन्धित हैं, इन्द्र की
वाटिका के पुष्पों को भी मानो वे ही सुगन्ध प्रदान कर रहे हैं
अर्थात् पुष्पों में जो सुगन्ध होती है वह प्रकृति देवी की ही देन
है। प्रायः केशभूषार्थ स्त्रियां अपने केशों में पुष्प गूंथा करती
हैं, यह रिवाज मद्रास प्रान्त में अधिक प्रचलित है। भाव यह है कि
स्त्रियों के केश धारण किये हुए पुष्पों से सुगन्धित होते हैं, परन्तु
भगवती के केशों की सुगन्ध से पुष्प स्वयं सुवासित होते हैं।
[ ४४ ]
वहन्ती सिन्दूरं प्रबलकबरीभारतिमिर
द्विषां वृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम् ।
तनोतुक्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्यलहरी
परिवाहः स्रोतः सरणिरिव सीमन्तसरणिः ।।
कठिन शब्दों के अर्थ:—कवरी=केश, सरणि=मार्ग, सड़क
रेखा, लाइन । वदन=मुख, सीमन्त सरणि=जिस रेखा पर सीमा का
अन्त होता है, सिर पर केशों की मांग ।
अर्थ:— तेरे मुख की सौन्दर्य लहरी के प्रवाहस्रोत के
मार्ग के सदृश सिन्दूर से भरी तेरे केशों की मांग हमारे क्षेम'
(कल्याण) का प्रसार करे, जो मांग केशों के भारमय अन्धकार
रूपी प्रबल दुश्मनों के वृन्दों से बन्दी की हुई उदय होने
वाले नवीन सूर्य की अरुण किरण के सदृश है ।