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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 290 of 415

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Page 290

२४० सौंदर्य लहरी
खेंचा है। १ श्लोक में किरीट, ३ श्लोकों में केश, एक में ललाट
एक में भ्रू, ९ श्लोकों में नेत्र, २ में दृष्टि, १ में कपोल, १ में कर्ण
एक में नासिका, १ में दान्त, १ में मुस्कराहट, १ में मुख का
तांबूल, १ में बाणि, १ में चिवुक, २ में ग्रीवा और कंठ, १ में
चार हाथ, १ में नखों की द्युति, ४ श्लोकों में स्तन पान द्वारा
वात्सल्य स्नेह, ३ श्लोकों में नाभि, २ में कटि, १ में नितम्ब, १ में
जानु, ? में पैर, ८ श्लोकों में चरण, १ में शरीर की आभा, शेष
श्लोकों में प्रार्थना युक्त सामान्य रूप से सर्वांग सौन्दर्य का चित्र
खेंचा गया है। अनुमान होता है, कि कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की
प्रातःकालीन उषा के रूप में विराट देवी का ध्यान कराया गया है।
पंडित स. सुब्रह्मण्य शास्त्री, और टी. आर. श्रीनिवास अयंगार के
अंग्रेजी में लिखित सौन्दर्य लहरी के प्रत्येक श्लोक के साथ एक-एक
यंत्र दिया गया है। जिसके पूजन और उससे संबंधित श्लोक के
जप सहित अनुष्ठान करने से अनेक कामनाओं की सिद्धी होती है,
हमने सकाम अनुष्ठानों की ओर ध्यान न देकर केवल एक
निष्काम उपासक अथवा एक योगी की दृष्टि से यह ग्रन्थ लिखा है,
क्योंकि जिस भगवती के स्तोत्र के एक २ श्लोक के अनुष्ठान
द्वारा जन्म मरण की श्रृंखलाबद्ध कारणभूत कामनाओं की पूर्ति
होती है उस स्तोत्र के सामूहिक अनुष्ठान का फल अनन्त आप्तकाम
पद का देने वाला क्यों न होगा ?