सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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सदा चढाये रखती हैं और वह धनुष् उसकी त्यौरी चढ़ी हुई भौंहें
ही हैं। कामदेव के धनुष् की प्रत्यंचा भौंरों की कही जाती है, इसलिये
भौंरा की उपमा रखने वाले दोनों नेत्र धनुष् की प्रत्यंचा समझनी
चाहिये, अर्थात् भगवती की त्यौरी चढ़ते ही संसार के सब भय भाग
जाते हैं और भ्रुकुटी का मध्यभाग मानो धनुष् को चढ़ाते समय
बाँये हाथ की मुट्ठी में दबा हुआसा है।
संसार का सबसे बड़ा शत्रु काम है इसलिये उसका धनुष
मानो भगवती ने स्वयं छीन लिया है।
कामएष क्रोध एष रजोगुण समुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
(गीता ३, ३७)
काम से क्रोध उत्पन्न होता है, कामात्क्रोधोऽभिजायते (गीता-
२, ६२) इसलिये क्रोध भी काम का ही रूपान्तर है जो रजोगुण
से उत्पन्न होता है, भगवान कहते हैं कि यह बड़ा पेटू है, बहुत भोजन
करने वाला है अर्थात् कभी तृप्त नहीं होता और बड़ा पापी है।
अर्थात् सब पापों का घर है। इसलिये इसे यहां संसार का बैरी
समझना चाहिये।
उपरोक्त श्लोक का भाव है कि भगवती की त्यौरी का ध्यान
करने से कामवासना शांत हो जाती है और सब भय दूर हो जाते हैं