सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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किसी का क्या दोष है ? हिरण्मय घूंघट की ही शोभा इतना
आकर्षण रखती है, कि उसे स्वयं आत्मदेव ने ही ओढ लिया है ।
अपना मुख छुपाने की दृष्टि से नहीं, परन्तु इसमें उसका अपने
सौंदर्य का विकास करने का ही मुख्य उद्देश्य जान पडता है। शायद
शून्यवादी इस रहस्य से परिचित नहीं है, उसका तो विश्वास यह जान
पडता है कि घूंघट के पीछे कोई तत्त्व नहीं, केवल शून्य पर ही
पडदा पडा हुआ है, वास्तव में जांच तो उसकी किसी हद तक ठीक
ही सी जान पडती है, परन्तु क्या शून्य का ही नाम सत्य है ? वेद
मिथ्या क्यों बहकाने लगे । इसी धारणा से शायद बुड्ढे भारत के
कतिपय पागल जिज्ञासु उस शून्य में ही मौलिक सत्य की खोज के
लिये कटिबद्ध रहते हैं । जिसका घूंघट, जो उसी की किरणों की
प्रभा की जाली से बना हुआ है, इतना सुंदर है, तो उस सत्य के
मुख की शोभा कितनी ऊंची होना चाहिये । पाठकगण ! वह अनु-
मान का विषय नहीं है, परन्तु कोई-कोई सत्य के अन्वेषक साक्षि
देते हैं कि वह अवश्य दर्शनीय है । इसलिये इन भौतिकवादियों
की बातों में नहीं आना, उसे शून्य मत समझो, वह शून्य नहीं है,
वरन् पूर्ण है, सुंदर है, स्वयं ज्योति स्वरूप है, सत्य है, अनंत ज्ञान
निधि है, और आनंद का खजाना है । वह पडदे में है दिखता नहीं
तो यह नहीं समझना चाहिये कि उसका अस्तित्व ही नहीं । ठीक
बात तो यह ही है कि सूर्य अपनी किरणों में छुपा होने के कारण
नहीं दिखाई दे रहा, बस यह बात बीसों बिसवे सत्य समझो ! उक्त
हिरण्मय पडदे को ही गायत्री मंत्र 'भर्गो देवस्य' कहकर ध्यान
करने का उपदेश करता है । तेज के ध्यान द्वारा तेजस्वी का ध्यान
होता है, और शक्ति का ध्यान करने से शक्ति मान का ध्यान होता