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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 285

सौंदर्य लहरी २३५
डमरू वाद्य है, जिसको उनके चिदाकाशरूपी देह की स्पन्द-ध्वनि
का वाचिक-व्यंजक अभिनय कह सकते हैं ।
शिव तांडव का साक्षात् प्रत्यक्षी-करण तारों की टिमटिमाहट-
रूपी डिमडिम में, ग्रहों के नृत्य में, सूर्य के नेत्रोल्हास में, पृथ्वी के
षड्ऋतुओं के श्रृंगारयुक्त नाट्य में, चन्द्रमा की कलाओं में, विद्युत्
की क्रीडा में, वसंत की मंद सुगंधित वायु के झकोरों में, पुष्पों के
हास्य में, समुद्र की तरंगों में, हिमपात के हिमकणों के नर्तन में,
आंधी तूफानों की द्रुत गति में, नदियों के कल-कल निनाद में,
पर्वतों के श्रृंगार में, शस्य-श्यामा भूतल के आंचल के हिलोरों में.
पशुपक्षियों की अठखेलियों में और मनुष्य की मस्तीभरी चालों में,
कहां नहीं ? सर्वत्र किया जा सकता है !
यह सब विराट्‌विश्व सृष्टि-प्रसार का निम्नतम स्तर रूपी
मूलाधार है, जिसमें भगवती के इस लास्य नृत्य और शंकर के तांडव
को युगपद् देखने वाले उपासक जीवन मुक्ति का आनंद लेते हैं ।
जो मूढ अपने तुच्छ स्वार्थों के अंधकार वश इसका साक्षात्कार नहीं
कर पाते और मिथ्या अज्ञान वश शोक-मोह के कूपों में पड़े रोते
हैं वे वास्तव में दया के पात्र हैं ।