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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages
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वायु की ५४ किरणें = ५० मातृका + यं रं लं वं ।
आकाशकी ७२ किरणें = अ ५ बार,.......औ ५ बार = १४ × ५
= ७० + ऐं ह्रीं ।
मन की ६४ किरणें = अ वर्ग चार बार = १६ × ४ = ६४ ।
एषु स्वराः स्मृताः सौम्याः स्पर्शाः सौराः शुभोदयाः ।
आग्नेया व्यापकाः सर्वे सोम सूर्याग्नि देवताः ॥
( शा. नि. २.२ )
तत्वात्मानः स्मृताः स्पर्शाः मकारः पुरुषो मतः ।
व्यापका दशते कामधनधर्मप्रदायिनः ॥ (२. ४)
विन्दु पुमान्रविः प्रोक्तः सर्गः शक्तिर्निशाकरः ।
स्वराणां मध्यमं यच्च चतुस्रं तच्च नपुंसकम् ॥ २. ६
पिंगलायां स्थिता ह्रस्वा ईडायां संगताः परे ।
सुषुम्नायां मध्यगाज्ञेया श्वत्वारो ये नपुंसकाः ॥ २. ७
वाय्वाग्निभूजलाकाशाः पंचाशल्लिपयः क्रमात् ।

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under आज्ञा?
Ah! Look at row 5:
अनाहत: ङ् | ञ्
मणिपूर: × | ण् | न् | ×
स्वाधिष्ठान: म् | ×
मूलाधार: श् | ×
आज्ञा: ह्
Wait, so row 5 of आज्ञा is ह्!
Then what is in row 3 of Guru Chakra?
Wait! Is that 'ह्' or is it 'क्ष'? No, क्ष is in row 2 of Ajna.
Wait, could row 3 of Guru Chakra be 'ॐ'?
Wait, look at row 3: the character has 'ह' shape, but wait!
Could it be 'ह'?
Wait, in some texts:
In Ajna: ह, क्ष.
Here क्ष is in अग्नि (row 2), ह is in आकाश (row 5) under आज्ञा.
Wait, what about row 3 of Guru chakra?
Wait, let's look at the character again.
Does it say "ह"?
Wait, look at the number: could it be 'ह'?
Wait, is it "ह" or "×" that was misprinted?
No, it's a Devanagari letter "ह" with a virama: "ह्".
Wait, why would it be in Guru Chakra?
Guru Chakra is associated with "हंख

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सौंदर्य लहरी १२१
किरणों की अधिष्ठातृ शक्तियां
अधिष्ठातृ शक्तियों के नाम शिव शक्ति के जोडे से नीचे
दिये जाते हैं।
पृथिवीः— १. उड्डीश्वर, उड्डीश्वरी, २. जलेश्वर, जलेश्वरी,
३. पूर्णेश्वर, पूर्णेधरी, ४. कामेश्वर, कामेश्वरी, ५. श्रीकंठ, गगना,
६. अनन्त स्वरसा, ७. शंकर, मति, ८. पिंगल, पाताल देवी,
९. नारदारव्य, नादा, १०. आनन्द, डाकिनी, ११. आलभ्य, शाकिनी,
१२. महानन्द, लाकिनी, १३. योग्य, काकिनी, १४. अतीत, साकिनी
१५. पाद, हाकिनी, १६. आधारेश, रक्ता, १७. चक्रीश, चंडा,
१८. करंगीश, कराला, १९. मदधीश, महोच्छुष्मा, २०. अनादि
विमल, मातंगी, २१. सर्वज्ञ विमल, पुलिन्दा, २२. योग विमल,
शंबरी, २३. सिद्ध विमल, वाचापरा, २४. समय विमल, कुलालिका,
२५. मित्रेश, कुब्जा, २६. उड्डीश, लध्वा, २७. षष्ठीश, कुलेश्वरी,
२८. चर्याधीश, अजा।
जलदेवता— १. सद्योजात, माया, २. वाम देव, श्री ३. अघोर,
पद्मा, ४. तत्पुरुष, अंबिका, ५. अनन्त, निवृत्ति, ६. अनाथ, प्रतिष्ठा,
७. अनाश्रित, विद्या, ८. अचिन्त्य, शान्ता, ९. शशिशेखर, उमा,
१० तीव्र, गंगा, ११. मणिवाह, सरस्वती, १२. अंबुवाह, कमला,
१३ तेजोधीश, पार्वती, १४ विद्यावागीश्वर, चित्रा, १५. चतुर्विधेश्वर
सुकमला, १६. उमांगंगेश्वर, मानमथा, १७. कृष्णेश्वर, श्रिया,
१८. श्रीकंठ, लया, १९. अनन्त, सती, २०. शंकर, रत्नमेखला,
२१. पिंगल, यशोवती, २२. सादारव्य, हंसानन्दा, २३. परि-

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१२२ सौंदर्य लहरी
दिव्यौघ, वामा. २४. मारदिव्यौध, ज्येष्ठा, २५. पीठौघ, रौद्री,
२६. सर्वेश्वर, सर्वमयी ।
आग्नेय— १. परापर, चंडेश्वरी, २. परम, चतुष्मती, ३. तत्पर,
गुह्य काली, ४. अपर, संवर्ता, ५ चिदानन्द, नीलकुब्जा, ६ अघोर,
गंधा, ७. डामराघोर, समरसा, ८ ललित, रूपा, ९. स्वच्छ, स्पर्शा,
१० भूतेश्वर, शब्दा, ११. आनन्द, डाकिनी, १२. आलस्य,
रत्नडाकिनी, १३. प्रभानन्द, चक्रडाकिनी, १४. योगानन्द,
पद्म डाकिनी, १५. अतीत, कुब्ज डाकिनी, १६. स्वाद, प्रचंड
डाकिनी, १७. योगेश्वर, चंडा, १८ पीठेश्वर, कोशला, १९. कुल-
कौलेश्वर, पावनी, २०. कुक्षेश्वर, समया, २१. श्रीकंठ, कामा,
२२. अनन्त, रेवती, २३ शंकर, ज्वाला, २४. पिंगलाख्य, कराला,
२५. सदाख्य, कुब्जिका, २६. कालरात्रिगुरू, परा, २७. सिद्ध गुरू,
शान्त्यातीता, २८. रत्न गुरू, शान्ता, २९. शिव गुरू, विद्या,
३०. मेल गुरू, प्रतिष्ठा, ३१. समय गुरू, निवृत्ति ।
वायव्य— १. खगेश, भद्रा, २. कूर्म, आधारा, ३. मेष,
कोषा, ४. मीन, मल्लिका, ५. ज्ञान, विमला, ६. महानन्द, शर्वरी,
७. तीव्र, लीला, ८. प्रिय, कुमुदा, ९. कालिक, मैनकी, १०. डामर
डाकिनी, ११. रामर, राकिनी, १२. लामर, लाकिनी, १३. कामर,
काकिनी, १४. सामर, साकिनी, १५. हामर, हाकिनी, १६.
आधारेश, राका, १७. चक्रीश, बिन्दु, १८. कुकुर, कुला, १९. मद्-
ग्रीश, कुब्जिका, २०. हृदीश, काम कला, २१ शीरस, कुल
दीपिका, २२. शिखेश, बर्बरी, २३. वर्मन, बहुरूपा, २४. शाख्रश,

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सौंदर्य लहरी १२३
महत्तरी, २५. परम गुरू, मंगला, २६. पराधिकार गुरू, सौकर्या,
२७. पूज्य गुरू, रामा ।
आकाश— १. हृदय, कौलिनी, २. घर, कान्ता, ३. भोग,
विशेषी, ४. भय, योगिनी, ५. मह, ब्रम्ह तारा, ६. शव, शवरी,
७. द्रव, कालिका, ८. सरस, जुष्ट चांडाली, ९. मोह, अघोरेशी
१०. मनो भव, हेला, ११. केक, महारक्ता, १२. ज्ञान गुह्य,
कुब्जिका, १३. खर, डाकिनी, १४. ज्वल शाकिनी, १५. महाकुल,
लाकिनी, १६. भियोज्वल, काकिनी, १७. तेज, साकिनी, १८.
भूति, हाकिनी, १९ वासु, पापघ्नी, २०. कुल, सिंही, २१. संहार,
कुलांबिका, २२. विश्वंभर, कामा, २३. कौटिल, कूण माता, २४.
गालव, काली, २५. व्योम, व्योमा, २६. श्वसन, नादा, २७.
खेन्वर, महादेवी, २८. बहुल, महत्तरी, २९. तात, कुण्डलिनी, ३०.
कुलातीत, कुलेश्वरी, ३१. अज, ईंधिका, ३२. अनन्त, दीपिका,
३३. ईश, रेचिका, ३४. शिख, मोचिका, ३५. परम, परा,
३६. पर, चिति ।
मन— १. पर, परा, २. भव, भवपरा, ३. चित्, चित्परा,
४. महामाया, महामाया परा, ५. इच्छा, इच्छापरा, ६. सृष्टि, सृष्टि
परा, ७. स्थिति, स्थिति परा, ८. निरोध, निरोध परा, ९. मुक्ति, मुक्ति
परा, १०. ज्ञान, ज्ञान परा, ११. सत्, सति परा, १२. असत्, असति
परा, १३. सदसत्, सदसति परा, १४. क्रिया, क्रिया परा, १५. आत्मा,
आत्मपरा, १६. इंद्रियाश्रय, इंद्रियाश्रय परा, १७. गोचर,
गोचर परा, १८. लोक मुख्य, लोक मुख्य परा, १९. वेदवत्, वेद-
वतिपरा, २०. संवित्, संविति परा, २१ कुण्डलिनी, कुण्डलिनी परा,

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१२४ सौंदर्य लहरी
२२. सोष्पुम्मी, सोपुम्मी परा, २३. प्राण सूत्र, प्राण सूत्र परा, २४.
स्पन्द, स्पन्द परा, २५. मातृका, मातृका परा, २६. स्वरोद्भव,
स्वरोद्भव परा, २७. वर्णज, वर्णज परा, २८. वर्गज, वर्गजा परा,
२९. शब्दज, शब्दज परा, ३०. वर्णज्ञात, वर्णज्ञता परा, ३१. संयो-
गज, संयोगज परा, ३२. मंत्र विग्रह, मंत्र विग्रह परा ।
पांचों तत्वों का संबंध मूलाधार से विशुद्ध चक्र तक क्रमशः
५ चक्रों से है औन मन का सम्बन्ध भ्रूमध्य में आज्ञा चक्र से,
इसलिये इन किरणों का भी सम्बन्ध छःओं चक्रों से है । छः चक्रों
से वर्ष की छः ऋतुओं की समानता की जाती है । अर्थात वसन्त
की मूलाधार से समानता है । क्योंकि इस ऋतु में पृथ्वी का वेध
होकर पुष्प खिलते हैं और सुगन्ध का विकास होता है, ग्रीष्म ऋतु
की स्वाधीष्ठान चक्र से समानता की जाती है, इस ऋतु में जल का
वेध होकर सब जल सूखने लगता है । वर्षा की मणिपूर से समानता
है, क्योंकि इस ऋतु में अग्नि का वेध होकर विद्युत और पर्जन्य
का विकास होता है । शरद् ऋतु की अनाहत चक्र से समानता
की जाती है क्योंकि इसमें वायु का वेध होकर वातावरण शान्त
निर्मल हो जाता है । हेमन्त ऋतु की विशुद्ध चक्र से समानता है,
क्योंकि इस ऋतु में आकाश के वेध सूचक शीत की प्रधानता
होती है, और शिशिर ऋतु की आज्ञा चक्र से समानता की जाती
है क्योंकि इसमें चित्त की प्रसन्नता बढ़ती है । इस प्रकार उक्त ३६०
किरणों को वर्ष की ३६० तिथियों से समानता यह बात सिद्ध
करती है कि पिंड का संवत्सर पुरुष आधार है । कृष्ण और शुक्ल
पक्षों को भी शक्ति शिवात्म समझना चाहिये । कृष्णपक्ष में चन्द्रमा

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सौंदर्य लहरी १२५
की अन्वय और शुक्ल पक्ष में उन्नेय भूमिका समझनी चाहिये । इसी
प्रकार उत्तरायण और दक्षिणायन को सूर्य ( प्राण ) की उन्नेय और
अन्वय भूमिकायें समझनी चाहिये ।
अगले तीन श्लोकों में वाक् सिद्धि का वर्णन है । १५ वें
वाक् सिद्धि श्लोक में सात्विक, १६ वें राजसिक और १७ वें
मिश्रित भावों युक्त कविता शक्ति के विकास
का वर्णन है ।
[ १६ ]
शरज्ज्योत्स्नाशुभ्रां शशियुतजटाजूटमकुटां
वरत्रासत्राणस्फटिकघुटि (णि) कापुस्तककराम् ।
सकृन्न त्वां नत्वा कथमपि सतां सन्निदधते
मधुक्षीरद्राक्षा मधुरि मधुरीणा भणितयः ॥
अर्थः— शरत् पूर्णिमा की चांदनी के सदृश शुभ्रवर्णा,
द्वितीया के चन्द्रमा युक्त जटाजूट रूपी मकुट धारण किये हुए,
दो हाथों से भक्तों को त्रास से त्राणार्थ अभयद और वरद अभि-
नय किये हुए और दो हाथों में स्फटिक मणियों की माला और
पुस्तक धारण किये हुए, तुझको एक बार भी नमन न करनेवाला
मनुष्य किस प्रकार सत्कवियों की सी मधु, दूध और द्राक्षा की
मधुरता से युक्त मधुर कविता कर सकता है, अर्थात् नहीं
कर सकता ।

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१२६ सौंदर्य लहरी
सं० टि० यह और अगले दो श्लोक मिल कर सारस्वत प्रयोग
कहलाते हैं । अच्युतानन्द के अनुसार यहां वाग्भव रूप क्रिया शक्ति
का ध्यान है, अर्थात वाग्भव कूट की देवी क्रिया शक्ति का ध्यान
बताया गया है ।
यहां कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने पर सारस्वत सिद्धि हो
की ओर संकेत है । कहा है ।
सर्वे वाक्यात्मका मंत्रा वेद शास्त्राणि कृत्स्नशः ।
पुराणानि च काव्यानि भाषाश्च विविधा अपि ॥ ३,७
सप्तस्वराश्च गाथाश्च सर्वे नाद समुद्भवाः :
एषा सरस्वती देवी सर्वभूतगुहाश्रया ॥ ३, ८
य इमां वैखरीं शक्तिं योगी स्वात्मनि पश्यति ।
स वाक सिद्धिमाप्नोति सरस्वत्याः प्रसादतः ॥
३,१० (यो. शिखा.)
अर्थः— सब वाक्यात्मक मंत्र वेद शास्त्र, पुराण और काव्य,
विविध भाषायें, सातों स्वर और गाथायें सब नाद से उत्पन्न होती
हैं । यह नाद रूपा सरस्वती देवी सब प्राणियों की बुद्धिरूपी गुहा में
रहती है । जो योगी इस वैखरी शक्ति को अपने भीतर देखता है उसे
सरस्वती के प्रसाद से वाक् सिद्धि की प्राप्ति हो जाती है ।
कुण्डलिनी शक्ति जागकर चार रूपों में प्रकट होती है, उन
रूपों के नाम ये हैं, क्रियावती, कलावती, वर्णमयी और वेधमयी ·
शारीरिक कंपदि, हठ योग के आसन प्रणायाम मुद्रादि, नृत्यादि

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सौन्दर्य लहरी १२७
क्रियाओं में क्रियावती का रूप हैं। ३६ तत्वों के व्यतिरेक और
शुद्धि की क्रियाओं में कलावती का रूप है। वर्णात्मिका मंत्रमयी
है और षट् चक्र बेध वेधमयी करती है। वर्णमयी सरस्वती का रूप
है जो समस्त शब्दमय जगत् को परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी
इन चारों स्तरों पर धारण किये हुए है।
चत्वारि वाक् परिमिता पदान्येतानि विदुर्ब्राह्मणांये मनीषिणः ।
गुहात्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ ऋक
ॱ अर्थात् वाचा चार पाद वाली होती है, उनको जो बुद्धिमान
ब्राह्मण हैं वे ही जानते हैं, उनमें से तीन तो गुहा में निहित (छुपी
हुई) हैं, वे अपने स्थानों से नीचे नहीं हिलती, चौथी वैखरी को
मनुष्य बोलते हैं। इस मंत्र के साथ ऐं बीज की उपासना की जाती
है। देखें सरस्वती रहस्योपनिषद। यह वाक् बीज वाग्भव कूट
का रूप है। इस श्लोक में सारस्वत प्रयोग का ध्यान बताया
गया है। अगले दो श्लोक भी सारस्वत प्रयोग से ही संबंध रखते हैं।
[ १६ ]
कवीन्द्राणां चेतः कमलवनबालातपरुचिं
भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् ।
विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतर शृङ्गार लहरी—
गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतां (भां) रञ्जनमयी ॥

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१२८ सौन्दर्य लहरी
अर्थः — कवीन्द्रों के चित्त रूपी कमल वन को खिलाने के
लिये उदय होते हुए सूर्य के सदृश अरुणा रूपी आपका जो
कोई थोडे महान पुरुष भजन करते हैं, वे ब्रह्मा की प्रिया
(सरस्वती) के तरुणतर शृंगार लहरी से निकली गंभीर कविताओं
द्वारा सत्पुरुषों का मनोरंजन किया करते हैं ।
सं० टि० यहां कामकूट की देवी इच्छा शक्ति 'का ध्यान
बताया गया है।
व्याख्या— १५ वें श्लोक में 'शरदज्योत्सना,' 'शशि युत
जटाजूट मकुटां,' पद, वरद और अभयद अभिनय, माला और पुस्तक
सहित ध्यान भगवती के सात्विक रूप का ध्यान है और 'मधुक्षीर
मधुरि मधुरीणा युक्त भणितयः' से भी सात्विक कविता की ओर
संकेत है । परन्तु इस श्लोक में 'अरुणा' 'प्रेयस्यास्तरुणतर शृंगार
लहरी' इत्यादि पदों में भगवती के रजोगुण स्वरूप का ध्यान है
और शृंगार रस परिपूर्ण कविता की ओर संकेत है । ऐसी कविता
का उपयोग भी मनोरंजन मात्र ही होता है; उनसे किसी प्रकार
आध्यात्मिकता की उपलब्धि नहीं हो सकती ।
'बाला तप रुचि' में 'बाला' पद सष्ट रूप से बाला मंत्र की
ओर ध्यान दिलाता है, जिसकी उपासना रूपी तप से चित्त रूपी
कमल बन का विकसित होना भी प्रध्वनित होता है। क्योंकि बाला
तप का अर्थ 'बाला एव आतपः' अर्थात् सूर्य सदृश बाला भगवती
इत्यादि अर्थ किया जा सकता है। इस प्रकार अर्थ करने से श्लोक

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सौंदर्य लहरी १२९
का भाव यह होगा कि कवीन्द्रों के चित्त रूपी कमल बन को
विकसित करने के लिये अरुणा देवी बाला भगवती सूर्य सदृश है।
[ १७ ]
सावित्रिभिर्वाचां शशिमणिशिलाभङ्गरुचिभि—
र्वशिन्याद्याभिस्त्वां सह जननि संचिन्तयति यः ।
सकर्ता काव्यानां भवति महतां भङ्गि सुभगै ( रुचिभि )
र्वचोभिर्वाग्देवी वदन कमला मोद मधुरैः ॥
वशिन्याद्याभिः = सर्व रोगहर अष्टार चक्र की आठ वाग्देवता
वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयनी, सर्वेश्वरी और
कौलिनी । भंगि = व्यंग ।
अर्थ:— वशिनी आदि सावित्रियों सहित, जो चन्द्रकान्त
मणि की शिला की घडी हुई मूर्तियों की शोभा वाली हैं, हे
जननी ! जो मनुष्य तेरा ध्यान करता है, वह उच्च कोटि के
काव्यों की रचना करने लगता है । उसकी सुन्दर कविता
वाग्देवी के मुख कमल के आमोद पूर्ण माधुर्य से युक्त होती है ।
सं० टि० यहां आठ वशिनी आदि वाग्देवियों सहित भगवती
के ध्यान का उपदेश है और वाग्देवियों की शोभा चन्द्रकान्त मणियों
की शोभा जैसी बताई गई है ।
यह शक्ति कूट की देवी ज्ञान शक्ति का ध्यान है ।

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१३० सौन्दर्य लहरी
जैसे चन्द्रमा की ज्योत्स्ना से चन्द्रकान्त मणि द्रवीभूत होती है,
वैसे ही पन्द्रहवें श्लोकोक्त शरद्-ज्योत्स्ना-शुभ्रा भगवती के ध्यान से
आठों वाग्देवियां द्रवीभूत होने लगती हैं । और उनके मन्त्र स्वरूप
अ क च ट त प य श वर्गवाली सम्पूर्ण मातृका शक्तियां चन्द्रकान्त
मणियों के नांई, जो समस्त वैखरी वाणी की वर्णात्म आधार हैं
द्रवीभूत होकर उस कवि में वर्णपदमंत्रविग्रहा नवरसयुक्त वैखरी
शक्ति का विकास करने लगती हैं ।
यह श्लोक सात्विक और राजसिक दोनों भावों को एक स्थानीय
कर देता है । 'महतां काव्यानाम्' पद से ऋषि प्रणीत शास्त्रों का
अभिप्राय है ।
मधुमती भूमिका की सिद्धि ।
( १८ )
तनुच्छायाभिस्ते तरुण तगणि श्रीध(स)रणिभि
दिवं सर्वामुर्वीमरुणिमनिमग्नां स्मरति यः ।
भवन्त्यस्य त्रस्यद्वनहरिणशालीन नयनाः
सहोर्वश्या वश्याः कतिकतिन गीर्वाणगणिकाः ॥
कठिन शब्दः—तरणि=सूर्य; सरणि=किरणें; गीर्वाण गणिका=
अप्सराएं, दिवं=आकाश; उर्वी=पृथिवी, छाया=कान्ति ।
अर्थः—तरुण सूर्य की श्री अर्थात् कान्ति को धारण
करने वाली तेरे शरीर की छाया ( कान्ति ) से आकाश और

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सौन्दर्य लहरी १३१
सारी पृथिवी को अपनी अरुणिमा (लाल रंग) में निमग्न करती
हुई तेरा जो स्मरण करता है, उसके वश में, घबराई हुई
बन की हरिणियों जैसे चंचल नयनों वाली उर्वशी सहित कितनी
स्वर्ग की अप्सरायें वश में हो जाती हैं ।
सं० टि०:—यहां ज्ञानी की दिव्य दृष्टि का जो सब जगत् को
ब्रह्ममय देखने लगती है, वर्णन है। यह मधुमती भूमिका कहलाती है,
जिसमें देवाङ्गनाएं साधक को पथभ्रष्ट करने का यत्न करती हैं।
अप्सराओं से दिव्यशक्तियों का भी अभिप्राय है। उपरोक्त
ध्यान करने वाले योगियों को दिव्यशक्तियों का साक्षात् होता है,
जिनका वर्णन योगदर्शन के विभूतिपाद के ५१ वें सूत्र में मिलता है,
उनको वहां स्थानीय देवता कहा गया है। यह अनुभव योगियों को
ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होने पर मधुमती भूमिका में होता है। यह
शुद्धसत्वगुण प्रधान भूमिका है। इसमें शक्ति का प्रकाश सर्वत्र दृष्टि-
गोचर होने लगता है। अर्थात् ऐसे योगियों को भूमि और आकाश
सर्वत्र भगवती की अरुण कान्ति की छाया से बसा हुआ दिखने
लगता है। उक्त सूत्र पर व्यासजी अपने भाष्य में लिखते हैं कि उन
स्थानीय देवताओं के प्रलोभनों से योगी को सतर्क रहना चाहिये,
और संग दोष से बचने के लिये उसको इस प्रकार सोचना चाहिये
कि-घोर संसार के अंगारों में जलते हुए और जन्म मरण के अन्धकार
में पडे हुये मैंने इस क्लेश तिमिर-को दूर करने वाले योग प्रदीप
का प्रकाश बडी कठिनता से प्राप्त किया है। तृष्णा की कारणभूत
विषयभोगों की आंधी इस योगरूपी दीपक को न कभी बुझा दे ।

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'१३२ सौंदर्य लहरी
काम बीज का ध्यान ।
(१९)
मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो
हरार्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् ।
स सद्यः संक्षोभं नयति वनिता इत्यतिलघु
त्रिलोकीमप्याशु भ्रमयति रवीन्दुस्तनयुगाम् ॥
कठिन शब्दः—मन्मथ कला=क्लीं अथवा ईं ।
अर्थः—मुख को बिन्दु बना कर दोनों स्तनों को उसके
नीचे दो और विन्दु बनाना चाहिये उसके नीचे हर के अर्ध-
भाग का ध्यान करना चाहिये । हे हर महिषी ! इस प्रकार
जो तेरी काम कला का ध्यान करता है, वह तुरन्त स्त्रियों के
चित्त में क्षोभ ले आता है यह अति छोटी बात है, ( उसका
सामर्थ्य तो इतना अधिक होता है कि ) अपितु वह सूर्य और
चन्द्र रूपी दो स्तन वाली त्रिलोकी को भ्रमा सकता है ।
सं० टि०:—हरमहिषी पद से आदि शक्ति ग्रहण करना चाहिये ।
'हरतीति हर' । मन्मथकला, कामकला । कामकला से हमने त्रिपुरोपनिषद्
की श्रुति११ के प्रकाश में काम बीज लिया है । परन्तु ईं को काम कला
कहते हैं । ईं में भी तीन विन्दु माने जा सकते हैं । ईकार का नीचे
क भाग हकार का आधा भाग समझा जा सकता है । इस लिये

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सौन्दर्य लहरी १३३
नीचे व्याख्या में क्लीं के स्थान पर ईं भी पढा जा सकता है । विन्दु
तीन हैं ब्रह्मा विष्णु और रुद्र । उनमें एक मुख है और दो स्तन ।
इस श्लोक में काम कला का ध्यान बताया गया है । जो क्लींमें
ककार के बिन्दु रूपी मुख के नीचे लकार के दो बिन्दुओं को दोनों
स्तनों से उपमित कर के ईकार रूपी हरार्धांगिनी के योग से बनती
है । इस मंत्र के प्रयोग का फल, इह लोक की स्त्रियों का वश करना
तो क्या तीनों लोक वश में किये जा सकते हैं । त्रिलोकी भी एक
विराट स्त्रीवत् ही है, जिसके सूर्य और चन्द्रमा दो स्तन सदृश हैं ।
परिशिष्ट नं. २ में त्रिपुरोपनिषद् की श्रुति ११ भी देखें । इस
उपमा से स्त्री मात्र में साधक का पूज्य मातृभाव जागृत किया
गया है । क्योंकि सूर्य प्राण रूपी और चन्द्रमा अमृत रूपी दुग्धपान
कराकर विश्व का पालन करते हैं । कहा भी है ।
विद्याः समस्तास्तवदेविभेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।
यद्यपि योगी के रूप लावण्य और तेजस्वी रूप को देखकर
कामिनियों के चित्त में क्षोभ उत्पन्न होना स्वाभाविक है, अपितु
योगी की इतनी महानता है कि त्रिलोकी भी उस पर अपना सर्वस्व
निछावर करने को तय्यार रहती है । क्या उसके हृदय में सामान्य
रमणियां काम का उद्वेग ला सकती हैं ? वह प्रकृति देवी के विराट
देह के सूर्य चन्द्ररूपी स्तनों के दूध को पीकर दोनों का योग करता
है । स्तन पान करने वाला शिशु कितना सुन्दर होता है, जिसके
रूप लावण्य पर सब ही मोहित होकर उसका कितने स्नेह से लालन-
पालन किया करते हैं, परन्तु क्या उस शिशु में भी कभी युवतियों

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१३४ सौन्दर्य लहरी
को देखने से काम की भावना का उदय होना संभव है । प्रकृति
देवी के सूर्य चन्द्र रूपी स्तनों के दूध से पुष्ट होने वाला योगी
फिर इन सामान्य स्त्रियों की मायामयी मोहिनी से कैसे प्रभावित
हो सकता है ? वह प्रकृति जननी का बालक तो दिव्यामृत पीकर
जडोन्मत्त बालवत् क्रीडा करता है। कामी पुरुष के चित्त में स्त्री के
मुख और कुच युग पर दृष्टि पडने से विकार उत्पन्न होता है, परन्तु
जो पुरुष उनको देखकर स्त्री के रूप में कामकला की
भावना कर के, उसमें उपास्य बुद्धि उत्पन्न कर लेते हैं, उनके वश
में त्रिलोकी हो जाती है। अर्थात् वे काम को जीतकर मन्मथारि
हो जाते हैं।
सूर्य जगत् का प्राण है और चन्द्रमा जगत् का मन । श्रुतियां
कहती हैं।
'प्राणः प्रजाना मुदत्येषः सूर्याः'। और 'चन्द्रमा मनसो जातः' ।
दोनों का संबंध सूर्य और चन्द्र मण्डलों से है। अनाहत चक्र
के १२ पत्र १२ आदित्यों से और विशुद्ध चक्र के १६ पत्र
चन्द्रमां की १६ कलाओं से उपमित किये जाते हैं। इसी प्रकार
मणिपूर के १० पत्र अग्नि की १० कलाओं से उपमित किये जाते
हैं। ईंडा को चन्द्र नाडी, पिंगला को सूर्य नाडी कहते हैं और सुषुम्ना
में तीनों का समावेश है। हृदय प्राण का स्थान है और आज्ञा
चक्र मन रूपी चन्द्रमा का। जो योगी सूर्य को उन्मुख कर के
सोमामृत का पान करते हैं और दिव्यानन्द का आस्वाद लेते हैं,
उनको कामाग्नि का संताप नहीं संतप्त करता। ज्ञानी, भक्त, योगी
अथवा समयाचार के उपासक किसी को भी काम प्रयोग इष्ट नहीं

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सौंदर्य लहरी १३५
होता । इसलिये इन श्लोकों को एक ज्ञानी अथवा योगी के हृदय
में वैराग्य उत्पन्न करने के निमित्त ही लिखा जाना समझना चाहिये ।
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री शंकर भगवत्पाद की लेखिनी से
निकले हुए श्लोकों का अभिप्राय किसी सांसारिक काम वासना
से संतप्त मनुष्य की स्त्री लोलुपता की सहायतार्थ काम प्रयोगों के
लिये लिखा जाना सर्वथा असंभव है । और उनमें काम सिद्धि के
तुच्छ प्रयोगों का विनियोग देखना अथवा करना भगवत्पाद की
महानता पर कलंक लगागा मात्र है ।
शक्तिपात् करने की सिद्धि
[ २० ]
किरन्तीमङ्गेभ्यः किरणनिकुरुम्बामृतरसं
हृदित्वामाधत्ते हिमकरशिलामूर्तिमिव यः ।
स सर्पाणांदर्प शमयति शकुन्ताधिप इव
ज्वरप्लुष्टान् दृष्ट्या सुखयति सुधाधारसिरया ॥
कठिन शब्दः-- किरन्ती=किरणें फैलाती हुई (radiating)
निकुरम्ब=समूह, हिमकर=चन्द्र, शकुन्ताधिप=गरुड, सिरा=नाडी ।
सुधाधार सिरा=अमृत नाडी, जिससे अमृत का स्राव होता है ।
अर्थः— जो मनुष्य अंगों से अमृत रस रूपी किरणों के
समूह का निकास करती हुई तुझ को हृदय में धारण करता है,
और तेरा चन्द्रकान्त शिला की मूर्तीवत हृदय में ध्यान करता है,

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१३६ सौन्दर्य लहरी
वह गरुड़ के सदृश सर्पों के दर्प का शमन कर देता है और
अपनी सुधा की वर्षा करने वाली (आज्ञा चक्रस्थ) नाडी के
द्वारा दृष्टि मात्र से ज्वर संतप्त मनुष्यों को सुख पहुंचाता है।
हिमकर शिला, हिम बनाने वाले चन्द्रमा की चांदनी से
द्रवीभूत होने वाली चन्द्रकान्त मणि जैसे चन्द्रमा की किरणों से
पिघलने लगती है, वैसे ही चन्द्रमण्डल के आज्ञा चक्रस्थ अधोमुख
चन्द्र बिंब से भगवती की मूर्ति भी हृदय में धारण किये जाने पर
अंग प्रत्यंग से अमृत रस की किरणें निकालने लगती हैं। वह
योगी सर्पों के दर्प को भी शान्त कर सकता है, जैसे गरुड को
देखकर सर्प भयभीत होकर चुप हो जाता है। जिस मनुष्य को
कुण्डलिनी रूपी नागन ने डस रखा है और अपनी कुंकुम सदृश दिव्य
अरुण मूर्ति के लिये उसके हृदय को निवास स्थान बना रखा है,
उस योगी पर सामान्य सर्पों के विष का प्रभाव नहीं हो सकता।
मानो कुण्डलिनी देवी की चन्द्रकान्त मणि तुल्य मूर्ति चन्द्रमा की
सोम प्रभा पडने पर अमृत का स्राव करने लगती है और हलाहल
को भी शान्त करने का सामर्थ्य रखती है। इतना ही नहीं, उस
योगी की शांभवी मुद्रा में स्थिरीभूता दृष्टि, अवलोकन मात्र से
आज्ञा चक्र की नाडी द्वारा कुण्डलिनी के उगले हुए गरलामृत को
सींचकर मनुष्यों का ज्वर शांत कर देती है। यहां ज्वर से साधारण
ज्वरों का भाव मात्र ही नहीं लेना चाहिये, यह संसार संताप भी
एक व्यापी ज्वर है, जिसके त्रिताप से भी वह योगी शक्तिपात्
दीक्षा द्वारा मुक्त कर देता है, यह प्रसिद्ध ही है। क्योंकि

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सौंदर्य लहरी १३७
[ २१ ]
तडिल्लेखातन्वीं तपनशशिवैश्वानरमयीं
निषण्णां षण्णामप्युपरि कमलानां तव कलाम् ।
महापद्माटव्यां मृदितमलमायेन मनसा
महान्तः पश्यन्तो दधति परमाह्लादलहरीम्१
१ पाठान्तर= परमानन्दलहरीम्
कठिन शब्दः— अटवी=वन, महापद्माटव्यां=सहस्रार में ।
अर्थः— महापुरुष तेरी, विद्युत् रेखा जैसी पतली, सूर्य
चन्द्र और अग्नि की त्रिमयी कला को, छः कमलों के भी ऊपर
कमलों के महावन में, मलमाया से विशुद्ध मन द्वारा देख २
कर परम आनन्द की लहर को धारण किया करते हैं ।
सं० टि० इस श्लोक में अभ्यन्तर आज्ञा चक्र के ऊपर मूर्धागत
ज्योति दर्शन का स्वरूप दिखाया गया है । इससे पूर्व जो ध्यान बताये
गये हैं, वे सब नीचे के स्तरों के ध्यान हैं। कला से चित्स्वरूपा शक्ति
का अभिप्राय है । महा पद्माटवी से सहस्रार का अभिप्राय है ।
षट् चक्र का वेध कर के कुण्डलिनी शक्ति जब सहस्रार में
उठती है, तब उसकी कला बिजली के सदृश चमकती हुई रेखा के
सदृश दृष्टिगोचर हुआ करती है । वह सोम सूर्य और अग्नि तीनों
के तेज से युक्त होती है । उसके दर्शन वे ही महापुरुष योगी कर
सकते हैं जिनके मन मल माया से विशुद्ध हो चुके हैं, जिसका

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१३८ सौंदर्य लहरी
दर्शन परम आल्हादकारी होता है । ब्रह्मविद्योपनिषद् में उक्त कला
का वर्णन नीचे उद्धृत श्लोकों में किया गया है ।
सूर्यमण्डल मध्येऽथ ह्यकारः शंख मध्यगः ।
उकारश्चन्द्रसंकाशस्तस्य मध्ये व्यवस्थितः ॥ ७ ॥
मकारस्त्वग्निसंकाशो विधूमो विद्युतोपमः ।
तिस्रो मात्रास्तथोज्ञेया सोमसूर्याग्निरूपिणः ॥ ८ ॥
शिखातु दीपसंकाशा तस्मिन्नुपरि वर्तते ।
अर्ध मात्रा तथा ज्ञेया प्रणवस्योपरि स्थिता ॥ ९ ॥
पद्मसूत्रनिभा सूक्ष्मा शिखा सा दृश्यते परा ॥
अर्थः— ‘ शंख के मध्य भाग में, (ध्वनि के सदृश ) प्रणव
की प्रथम मात्रा अकार सूर्य मण्डल के मध्य है, उकार दूसरी मात्रा
चन्द्रमा के सदृश उसके मध्य में स्थित है, तीसरी मात्रा मकार
अग्नि सदृश जिसमें धूआं न हो, विद्युत् वत् चमकती हुई उसके
मध्य में है । इस प्रकार तीनों मात्राओं को सोमसूर्याग्निमयी जानना
चाहिये । उसके ऊपर दीप शिखा के सदृश लौ है, उसको प्रणव के
ऊपर आधी मात्रा समझना चाहिये । वह कमल सूत्र जैसी सूक्ष्म
शिखा योगियों को दृष्टिगोचर होती है ? उक्त प्रणव कला जो
शक्ति की ही कला है, सहस्रार में दिखती है । शुद्ध अन्तःकरण
वाले योगी ही उसे देख सकते हैं, और उसका दर्शन परम आल्हाद
का देने वाला होता है । इसके दर्शन के पश्चात् ज्ञान की भूमिका
का उदय होता है । सिद्धियों की भूमिका भी नीचे ही रह जाती
है, क्योंकि प्रत्येक चक्र की सिद्धियां भिन्न २ हैं ।