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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 175 of 415

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Page 175

सौंदर्य लहरी १२९
का भाव यह होगा कि कवीन्द्रों के चित्त रूपी कमल बन को
विकसित करने के लिये अरुणा देवी बाला भगवती सूर्य सदृश है।
[ १७ ]
सावित्रिभिर्वाचां शशिमणिशिलाभङ्गरुचिभि—
र्वशिन्याद्याभिस्त्वां सह जननि संचिन्तयति यः ।
सकर्ता काव्यानां भवति महतां भङ्गि सुभगै ( रुचिभि )
र्वचोभिर्वाग्देवी वदन कमला मोद मधुरैः ॥
वशिन्याद्याभिः = सर्व रोगहर अष्टार चक्र की आठ वाग्देवता
वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयनी, सर्वेश्वरी और
कौलिनी । भंगि = व्यंग ।
अर्थ:— वशिनी आदि सावित्रियों सहित, जो चन्द्रकान्त
मणि की शिला की घडी हुई मूर्तियों की शोभा वाली हैं, हे
जननी ! जो मनुष्य तेरा ध्यान करता है, वह उच्च कोटि के
काव्यों की रचना करने लगता है । उसकी सुन्दर कविता
वाग्देवी के मुख कमल के आमोद पूर्ण माधुर्य से युक्त होती है ।
सं० टि० यहां आठ वशिनी आदि वाग्देवियों सहित भगवती
के ध्यान का उपदेश है और वाग्देवियों की शोभा चन्द्रकान्त मणियों
की शोभा जैसी बताई गई है ।
यह शक्ति कूट की देवी ज्ञान शक्ति का ध्यान है ।