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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 180 of 415

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Page 180

१३४ सौन्दर्य लहरी
को देखने से काम की भावना का उदय होना संभव है । प्रकृति
देवी के सूर्य चन्द्र रूपी स्तनों के दूध से पुष्ट होने वाला योगी
फिर इन सामान्य स्त्रियों की मायामयी मोहिनी से कैसे प्रभावित
हो सकता है ? वह प्रकृति जननी का बालक तो दिव्यामृत पीकर
जडोन्मत्त बालवत् क्रीडा करता है। कामी पुरुष के चित्त में स्त्री के
मुख और कुच युग पर दृष्टि पडने से विकार उत्पन्न होता है, परन्तु
जो पुरुष उनको देखकर स्त्री के रूप में कामकला की
भावना कर के, उसमें उपास्य बुद्धि उत्पन्न कर लेते हैं, उनके वश
में त्रिलोकी हो जाती है। अर्थात् वे काम को जीतकर मन्मथारि
हो जाते हैं।
सूर्य जगत् का प्राण है और चन्द्रमा जगत् का मन । श्रुतियां
कहती हैं।
'प्राणः प्रजाना मुदत्येषः सूर्याः'। और 'चन्द्रमा मनसो जातः' ।
दोनों का संबंध सूर्य और चन्द्र मण्डलों से है। अनाहत चक्र
के १२ पत्र १२ आदित्यों से और विशुद्ध चक्र के १६ पत्र
चन्द्रमां की १६ कलाओं से उपमित किये जाते हैं। इसी प्रकार
मणिपूर के १० पत्र अग्नि की १० कलाओं से उपमित किये जाते
हैं। ईंडा को चन्द्र नाडी, पिंगला को सूर्य नाडी कहते हैं और सुषुम्ना
में तीनों का समावेश है। हृदय प्राण का स्थान है और आज्ञा
चक्र मन रूपी चन्द्रमा का। जो योगी सूर्य को उन्मुख कर के
सोमामृत का पान करते हैं और दिव्यानन्द का आस्वाद लेते हैं,
उनको कामाग्नि का संताप नहीं संतप्त करता। ज्ञानी, भक्त, योगी
अथवा समयाचार के उपासक किसी को भी काम प्रयोग इष्ट नहीं