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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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सौंदर्य लहरी १३५
होता । इसलिये इन श्लोकों को एक ज्ञानी अथवा योगी के हृदय
में वैराग्य उत्पन्न करने के निमित्त ही लिखा जाना समझना चाहिये ।
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री शंकर भगवत्पाद की लेखिनी से
निकले हुए श्लोकों का अभिप्राय किसी सांसारिक काम वासना
से संतप्त मनुष्य की स्त्री लोलुपता की सहायतार्थ काम प्रयोगों के
लिये लिखा जाना सर्वथा असंभव है । और उनमें काम सिद्धि के
तुच्छ प्रयोगों का विनियोग देखना अथवा करना भगवत्पाद की
महानता पर कलंक लगागा मात्र है ।
शक्तिपात् करने की सिद्धि
[ २० ]
किरन्तीमङ्गेभ्यः किरणनिकुरुम्बामृतरसं
हृदित्वामाधत्ते हिमकरशिलामूर्तिमिव यः ।
स सर्पाणांदर्प शमयति शकुन्ताधिप इव
ज्वरप्लुष्टान् दृष्ट्या सुखयति सुधाधारसिरया ॥
कठिन शब्दः-- किरन्ती=किरणें फैलाती हुई (radiating)
निकुरम्ब=समूह, हिमकर=चन्द्र, शकुन्ताधिप=गरुड, सिरा=नाडी ।
सुधाधार सिरा=अमृत नाडी, जिससे अमृत का स्राव होता है ।
अर्थः— जो मनुष्य अंगों से अमृत रस रूपी किरणों के
समूह का निकास करती हुई तुझ को हृदय में धारण करता है,
और तेरा चन्द्रकान्त शिला की मूर्तीवत हृदय में ध्यान करता है,