सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in context'१३२ सौंदर्य लहरी
काम बीज का ध्यान ।
(१९)
मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो
हरार्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् ।
स सद्यः संक्षोभं नयति वनिता इत्यतिलघु
त्रिलोकीमप्याशु भ्रमयति रवीन्दुस्तनयुगाम् ॥
कठिन शब्दः—मन्मथ कला=क्लीं अथवा ईं ।
अर्थः—मुख को बिन्दु बना कर दोनों स्तनों को उसके
नीचे दो और विन्दु बनाना चाहिये उसके नीचे हर के अर्ध-
भाग का ध्यान करना चाहिये । हे हर महिषी ! इस प्रकार
जो तेरी काम कला का ध्यान करता है, वह तुरन्त स्त्रियों के
चित्त में क्षोभ ले आता है यह अति छोटी बात है, ( उसका
सामर्थ्य तो इतना अधिक होता है कि ) अपितु वह सूर्य और
चन्द्र रूपी दो स्तन वाली त्रिलोकी को भ्रमा सकता है ।
सं० टि०:—हरमहिषी पद से आदि शक्ति ग्रहण करना चाहिये ।
'हरतीति हर' । मन्मथकला, कामकला । कामकला से हमने त्रिपुरोपनिषद्
की श्रुति११ के प्रकाश में काम बीज लिया है । परन्तु ईं को काम कला
कहते हैं । ईं में भी तीन विन्दु माने जा सकते हैं । ईकार का नीचे
क भाग हकार का आधा भाग समझा जा सकता है । इस लिये