सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
Page 174 of 415
Read in context१२८ सौन्दर्य लहरी
अर्थः — कवीन्द्रों के चित्त रूपी कमल वन को खिलाने के
लिये उदय होते हुए सूर्य के सदृश अरुणा रूपी आपका जो
कोई थोडे महान पुरुष भजन करते हैं, वे ब्रह्मा की प्रिया
(सरस्वती) के तरुणतर शृंगार लहरी से निकली गंभीर कविताओं
द्वारा सत्पुरुषों का मनोरंजन किया करते हैं ।
सं० टि० यहां कामकूट की देवी इच्छा शक्ति 'का ध्यान
बताया गया है।
व्याख्या— १५ वें श्लोक में 'शरदज्योत्सना,' 'शशि युत
जटाजूट मकुटां,' पद, वरद और अभयद अभिनय, माला और पुस्तक
सहित ध्यान भगवती के सात्विक रूप का ध्यान है और 'मधुक्षीर
मधुरि मधुरीणा युक्त भणितयः' से भी सात्विक कविता की ओर
संकेत है । परन्तु इस श्लोक में 'अरुणा' 'प्रेयस्यास्तरुणतर शृंगार
लहरी' इत्यादि पदों में भगवती के रजोगुण स्वरूप का ध्यान है
और शृंगार रस परिपूर्ण कविता की ओर संकेत है । ऐसी कविता
का उपयोग भी मनोरंजन मात्र ही होता है; उनसे किसी प्रकार
आध्यात्मिकता की उपलब्धि नहीं हो सकती ।
'बाला तप रुचि' में 'बाला' पद सष्ट रूप से बाला मंत्र की
ओर ध्यान दिलाता है, जिसकी उपासना रूपी तप से चित्त रूपी
कमल बन का विकसित होना भी प्रध्वनित होता है। क्योंकि बाला
तप का अर्थ 'बाला एव आतपः' अर्थात् सूर्य सदृश बाला भगवती
इत्यादि अर्थ किया जा सकता है। इस प्रकार अर्थ करने से श्लोक