सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी १२५
की अन्वय और शुक्ल पक्ष में उन्नेय भूमिका समझनी चाहिये । इसी
प्रकार उत्तरायण और दक्षिणायन को सूर्य ( प्राण ) की उन्नेय और
अन्वय भूमिकायें समझनी चाहिये ।
अगले तीन श्लोकों में वाक् सिद्धि का वर्णन है । १५ वें
वाक् सिद्धि श्लोक में सात्विक, १६ वें राजसिक और १७ वें
मिश्रित भावों युक्त कविता शक्ति के विकास
का वर्णन है ।
[ १६ ]
शरज्ज्योत्स्नाशुभ्रां शशियुतजटाजूटमकुटां
वरत्रासत्राणस्फटिकघुटि (णि) कापुस्तककराम् ।
सकृन्न त्वां नत्वा कथमपि सतां सन्निदधते
मधुक्षीरद्राक्षा मधुरि मधुरीणा भणितयः ॥
अर्थः— शरत् पूर्णिमा की चांदनी के सदृश शुभ्रवर्णा,
द्वितीया के चन्द्रमा युक्त जटाजूट रूपी मकुट धारण किये हुए,
दो हाथों से भक्तों को त्रास से त्राणार्थ अभयद और वरद अभि-
नय किये हुए और दो हाथों में स्फटिक मणियों की माला और
पुस्तक धारण किये हुए, तुझको एक बार भी नमन न करनेवाला
मनुष्य किस प्रकार सत्कवियों की सी मधु, दूध और द्राक्षा की
मधुरता से युक्त मधुर कविता कर सकता है, अर्थात् नहीं
कर सकता ।