सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in context१३० सौन्दर्य लहरी
जैसे चन्द्रमा की ज्योत्स्ना से चन्द्रकान्त मणि द्रवीभूत होती है,
वैसे ही पन्द्रहवें श्लोकोक्त शरद्-ज्योत्स्ना-शुभ्रा भगवती के ध्यान से
आठों वाग्देवियां द्रवीभूत होने लगती हैं । और उनके मन्त्र स्वरूप
अ क च ट त प य श वर्गवाली सम्पूर्ण मातृका शक्तियां चन्द्रकान्त
मणियों के नांई, जो समस्त वैखरी वाणी की वर्णात्म आधार हैं
द्रवीभूत होकर उस कवि में वर्णपदमंत्रविग्रहा नवरसयुक्त वैखरी
शक्ति का विकास करने लगती हैं ।
यह श्लोक सात्विक और राजसिक दोनों भावों को एक स्थानीय
कर देता है । 'महतां काव्यानाम्' पद से ऋषि प्रणीत शास्त्रों का
अभिप्राय है ।
मधुमती भूमिका की सिद्धि ।
( १८ )
तनुच्छायाभिस्ते तरुण तगणि श्रीध(स)रणिभि
दिवं सर्वामुर्वीमरुणिमनिमग्नां स्मरति यः ।
भवन्त्यस्य त्रस्यद्वनहरिणशालीन नयनाः
सहोर्वश्या वश्याः कतिकतिन गीर्वाणगणिकाः ॥
कठिन शब्दः—तरणि=सूर्य; सरणि=किरणें; गीर्वाण गणिका=
अप्सराएं, दिवं=आकाश; उर्वी=पृथिवी, छाया=कान्ति ।
अर्थः—तरुण सूर्य की श्री अर्थात् कान्ति को धारण
करने वाली तेरे शरीर की छाया ( कान्ति ) से आकाश और