सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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क्रियाओं में क्रियावती का रूप हैं। ३६ तत्वों के व्यतिरेक और
शुद्धि की क्रियाओं में कलावती का रूप है। वर्णात्मिका मंत्रमयी
है और षट् चक्र बेध वेधमयी करती है। वर्णमयी सरस्वती का रूप
है जो समस्त शब्दमय जगत् को परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी
इन चारों स्तरों पर धारण किये हुए है।
चत्वारि वाक् परिमिता पदान्येतानि विदुर्ब्राह्मणांये मनीषिणः ।
गुहात्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ ऋक
ॱ अर्थात् वाचा चार पाद वाली होती है, उनको जो बुद्धिमान
ब्राह्मण हैं वे ही जानते हैं, उनमें से तीन तो गुहा में निहित (छुपी
हुई) हैं, वे अपने स्थानों से नीचे नहीं हिलती, चौथी वैखरी को
मनुष्य बोलते हैं। इस मंत्र के साथ ऐं बीज की उपासना की जाती
है। देखें सरस्वती रहस्योपनिषद। यह वाक् बीज वाग्भव कूट
का रूप है। इस श्लोक में सारस्वत प्रयोग का ध्यान बताया
गया है। अगले दो श्लोक भी सारस्वत प्रयोग से ही संबंध रखते हैं।
[ १६ ]
कवीन्द्राणां चेतः कमलवनबालातपरुचिं
भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् ।
विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतर शृङ्गार लहरी—
गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतां (भां) रञ्जनमयी ॥