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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 183 of 415

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Page 183

सौंदर्य लहरी १३७
[ २१ ]
तडिल्लेखातन्वीं तपनशशिवैश्वानरमयीं
निषण्णां षण्णामप्युपरि कमलानां तव कलाम् ।
महापद्माटव्यां मृदितमलमायेन मनसा
महान्तः पश्यन्तो दधति परमाह्लादलहरीम्१
१ पाठान्तर= परमानन्दलहरीम्
कठिन शब्दः— अटवी=वन, महापद्माटव्यां=सहस्रार में ।
अर्थः— महापुरुष तेरी, विद्युत् रेखा जैसी पतली, सूर्य
चन्द्र और अग्नि की त्रिमयी कला को, छः कमलों के भी ऊपर
कमलों के महावन में, मलमाया से विशुद्ध मन द्वारा देख २
कर परम आनन्द की लहर को धारण किया करते हैं ।
सं० टि० इस श्लोक में अभ्यन्तर आज्ञा चक्र के ऊपर मूर्धागत
ज्योति दर्शन का स्वरूप दिखाया गया है । इससे पूर्व जो ध्यान बताये
गये हैं, वे सब नीचे के स्तरों के ध्यान हैं। कला से चित्स्वरूपा शक्ति
का अभिप्राय है । महा पद्माटवी से सहस्रार का अभिप्राय है ।
षट् चक्र का वेध कर के कुण्डलिनी शक्ति जब सहस्रार में
उठती है, तब उसकी कला बिजली के सदृश चमकती हुई रेखा के
सदृश दृष्टिगोचर हुआ करती है । वह सोम सूर्य और अग्नि तीनों
के तेज से युक्त होती है । उसके दर्शन वे ही महापुरुष योगी कर
सकते हैं जिनके मन मल माया से विशुद्ध हो चुके हैं, जिसका