साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
सप्तमोऽध्यायः ३७
सप्तमोऽध्यायः ३७
नारद कहते हैं—रश्मियों का व्यापकत्व तथा नाम मैं कहता हूँ, श्रवण करो। हेति, किरण, गो, रश्मि, गभस्ति, अभीषव, वन, उस्र, घृणि, मरीचि, नाड़ी, दीधिति, साध्य, मयूख, भानु, अंश, सप्तर्षिगण, कर तथा पाद—ये सूर्यरश्मि के २० पर्यायवाची नाम कहे गये हैं॥४२-४४॥
वन्दनादिति वक्ष्यामि नामान्येषां पृथक्-पृथक्।
रवेः करसहस्रं तु शीतवर्षोष्मभिस्तपन्॥४५॥
इन सबके प्रणाम तथा स्तुतियोग्य नाम पृथक्-पृथक् हैं। रवि के करसहस्र शीत, वर्षा तथा ऊष्म के साथ ताप प्रदान करते हैं॥४५॥
तासां चतुःशतं नाड्यो वर्षन्तेऽचिन्त्यमूर्तयः।
वन्दनाश्चैव मेध्याश्च कातनाः केतनास्तथा॥४६॥
तदनन्तर उनकी ४०० अचिन्त्य मूर्ति नाड़ियाँ वर्षण करती हैं। वन्दनीय, मेध्य (पवित्र), कातना एवं केतना—ये हैं सूर्यरश्मियों के नाम॥४६॥
अमृता नामतः सर्वाः रश्मयो वृष्टिसर्जनाः।
हिमावहास्तु त्रिंशद्वै ताभ्योऽन्या रश्मयः स्मृताः॥४७॥
अमृतरूप रश्मिसमूह वृष्टि के उत्पादक हैं। उनमें से ३० हिमवाहक एवं अन्य रश्मि के नाम से अभिहित हैं॥४७॥
चन्द्रास्ता नामतः सर्वाः पीताभास्तु गभस्तयः।
रश्मयो मेघपौष्यश्च ह्लादिन्यो हिमसर्जनाः॥४८॥
चन्द्र नामक जो रश्मियाँ हैं, वे सभी पीताभ (पीत वर्ण कान्ति वाली) हैं। मेघ तथा पूषा-सम्बन्धित रश्मियाँ ह्लादकारी (आनन्ददायक) तथा हिम की उत्पादिका हैं॥४८॥
समं बिभ्रति ताः सर्वान् मनुष्यान् देवताः पितॄन्।
मनुष्यानोषधीभिस्तु स्वधया च पितॄनपि॥४९॥
अमृतेन सुरान् सर्वांस्त्रयस्त्रिभिरतर्पयेत्।
वसन्ते चैव ग्रीष्मे च शतैः प्रतपति त्रिभिः॥५०॥
ये सब मनुष्य, देवता तथा पितरों का पोषण करती हैं। औषधि द्वारा मनुष्यों का तथा स्वधा (पिण्डादि) द्वारा पितरों का तथा अमृत द्वारा समस्त देवताओं का तृप्ति-विधान करती हैं। मनुष्य, पितर तथा देवता यथाक्रमेण औषधि, स्वधा तथा अमृत से तृप्त होते हैं। वसन्त तथा ग्रीष्म में ३०० किरणों द्वारा सूर्य ताप प्रदान करते हैं॥४९-५०॥
शरत्सु चैव वर्षासु चतुर्भिः सम्प्रवर्षति।
हेमन्ते शिशिरे चैव हिमोत्सर्गं त्रिभिः पुनः॥५१॥
३८ श्रीसाम्बपुराणम्
ओषधीषु बलं धत्ते स्वधायां च स्वधी पुनः ।
सूर्योऽमृतावमृते च त्रयं त्रिषु नियच्छति ॥५२॥
शरत् काल तथा वर्षाकाल में सूर्य चार रश्मियों से वर्षण करते हैं। हेमन्त में तथा शिशिर में पुनः तीन रश्मियों से हिमयोग करते हैं। सूर्य औषधियों में (लता-गुल्म-शस्यादि में), स्वधा तथा अमृत में बल देते हैं। तीन में (मनुष्य-देवता तथा पितरों में) तीन वस्तु (यथाक्रम औषधि-अमृत तथा स्वधा) की स्थापना करते हैं॥५१-५२॥
कालोऽग्निर्ब्रह्मणश्चैव द्वादशात्मा प्रजापतिः ।
तपत्येष सुरश्रेष्ठस्त्रींल्लोकान् सचराचरान् ॥५३॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष एव महेश्वरः ।
ऋचो यजूंषि सामानि ह्येष एव न संशयः ॥५४॥
काल में ब्रह्मा के द्वादशात्मा प्रजापति स्थावर-जंगम त्रिभुवन को ताप प्रदान करते हैं। सूर्य ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर हैं। ये ही निःसन्दिग्ध रूप से ऋक्, यजुः तथा साम वेदरूप हैं॥५३-५४॥
उद्यन् सन्दीप्यते ऋग्भिर्मध्याह्ने यजुभिस्ततः ।
सामभिश्चापि सायाह्ने दीप्यते भास्करः क्रमात् ॥५५॥
स एष तेजसो राशिर्दीप्तिमान् सार्वलौकिकः ।
पार्श्वेनोर्ध्वमधश्चैव प्रपतत्येष सर्वतः ॥५६॥
ये उदयकाल में ऋक् के द्वारा सन्दीप्त होते हैं, मध्याह्न में यजु के द्वारा तथा सायाह्न में साम द्वारा दीप्त होते हैं अर्थात् प्रातःकाल में ऋक् मन्त्र से, मध्याह्न काल में यजुर्मन्त्र से तथा सन्ध्या में साम मन्त्र से पूजित होते हैं। यह तेजोराशि, दीप्तिमान तथा सार्व-लौकिक है। ये ही पार्श्व, ऊर्ध्व या अधोदेश को ताप प्रदान करते हैं॥५५-५६॥
यथा प्रभाकरो दीपो गृहमध्ये व्यवस्थितः ।
पार्श्वेनोर्ध्वमधश्चैव तमो नाशयते समम् ॥५७॥
तद्वत् सहस्रकिरणो ग्रहराजो जगत्पतिः ।
त्रीणि रश्मिशतान्यस्य भूर्लोकं द्योतयन्ति च ॥५८॥
जैसे प्रभायुक्त दीपक गृह में स्थित होकर पार्श्व-ऊर्ध्व तथा अधः के अन्धकार को समान रूप से नष्ट करता है, वैसे ही सहस्र किरणयुक्त ग्रहराज, जगत्पति सूर्य सर्वत्र ताप प्रदान करते हैं एवं इनकी तीन सौ रश्मियाँ भू-लोक को उद्भासित—द्योतित करती हैं॥५७-५८॥
चत्वारि तु पुनस्तिर्यक् त्रीणि चोर्ध्वं सुरालयम् ।
इत्येतन्मण्डलं शुक्लं भास्करं लोकसंज्ञितम् ॥५९॥