साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
तृतीयोऽध्यायः ११
तृतीयोऽध्यायः ११
पितृलोक, राक्षस लोक, नागलोक, यमलोक, वरुणलोक, इन्द्र की अमरावती तथा कुबेर की पुरी में एवं पृथ्वी पर जितने राजागण हैं, जो पाताल में हैं, उन सभी के स्थान पर इनकी बाधाहीन अप्रतिहत गति है।।११-१२।।
वासुदेवं स वै द्रष्टुं नीत्वा द्वारावतीं पुरीम्।
आयान्तं ऋषिभिः सार्द्धं क्रोधनो मुनिसत्तमः ॥१३॥
एक बार वह नारद कोपन स्वभाव ऋषियों के साथ वासुदेव का दर्शन करने के लिये द्वारिकापुरी आये।।१३।।
अथात्रागच्छतस्तस्य सर्वे यदुकुमारकाः।
प्रद्युम्नप्रमुखा ये ते प्रह्वेनावनताः स्थिताः ॥१४॥
अभिवाद्यार्घ्यपाद्यैश्च पूजां कुर्वन्ति यत्नतः।
साम्बस्त्ववश्यम्भावित्वात्तस्य शापस्य मोहितः ॥१५॥
तदनन्तर प्रद्युम्न आदि सभी प्रमुख यदुकुमारगण ने वहाँ आकर तथा सविनय अवनत होकर अभिनन्दन-पाद्य-अर्घ्य प्रभृति द्वारा यत्नपूर्वक उनका पूजन किया। अवश्यम्भावी के कारण साम्ब उस शाप से मोहित हो गया।।१४-१५।।
अवज्ञां कुरुते नित्यं नारदस्य महात्मनः।
ततः क्रीडासु सततं रूपयौवनगर्वितः ॥१६॥
अविनीतं सुतं ज्ञात्वा चिन्तयामास नारदः।
अस्याहमविनीतस्य करिष्ये विनयं भृशम् ॥१७॥
साम्ब अपने रूप एवं यौवन से गर्वित होकर सतत् क्रीड़ा में मत्त रहता था और सर्वदा महात्मा नारद की अवज्ञा किया करता था। इस वासुदेवपुत्र को अविनीत देखकर नारद चिन्तित हो गये और विचार किया कि इस अविनीत को मैं अच्छी तरह संयत करूँगा।।१६-१७।।
एवं सञ्चिन्तयित्वा तु वासुदेवं ततोऽब्रवीत्।
इमाः षोडशसाहस्र्यः पत्न्यो देवस्य यास्तव।
सर्वासां च मनांस्यासां साम्बेन किल केशव ॥१८॥
हृतानि पुण्डरीकाक्ष रूपयौवनशालिना।
रूपेणाप्रतिमः साम्बो लोकेऽस्मिन् सचराचरे।
अतो हीच्छन्ति तास्तस्य दर्शनं ह्यपि ते प्रियः ॥१९॥
ऐसा विचार करके नारद ने वासुदेव से कहा—हे केशव! आपकी जो १६००० पत्नियाँ हैं, उन सबका मन साम्ब ने अपहृत कर लिया है। हे पुण्डरीकाक्ष! रूप-
१२ श्रीसाम्बपुराणम्
यौवनयुक्त साम्ब का रूप चराचर में अतुलनीय है। इसलिये सभी स्त्रीगण उसे देखने की इच्छा करती हैं, यहाँ तक कि आपकी पत्नियाँ भी॥१८-१९॥
वशिष्ठ उवाच
श्रुत्वैतन्नारदाद्वाक्यं भाविनाऽर्थेन मोहितः।
अविचार्र्यैव तत् सर्वं देवः प्रोवाच नारदम्॥२०॥
वशिष्ठ कहते हैं—नारद की यह बात सुनकर भवितव्यता के कारण ही वासुदेव ने विना कोई विचार किये नारद से इस प्रकार कहा॥२०॥
वासुदेव उवाच
न ह्यहं श्रद्दधाम्येवं यदेतद् व्याहृतं त्वया।
ब्रुवाणमेवं देवं तु नारदः प्रत्युवाच ह॥२१॥
वासुदेव ने कहा—(हे नारद!) आपने जो कुछ कहा, उसका मैं तनिक भी विश्वास नहीं करता। वासुदेव का यह उत्तर सुनकर नारद ने प्रत्युत्तर दिया—मैं वैसा करूँगा, जिससे आपको विश्वास हो॥२१॥
वशिष्ठ उवाच
एवमुक्त्वा ययौ भूत्वा नारदस्तु यथागतः।
ततः कतिपये चाह्नि द्वारकां पुनरभ्यगात्॥२३॥
तस्मिन्नहनि देवोऽपि सहान्तःपूरिकाजनैः।
अनुभूय जलक्रीड़ा यानमासेवते रहः॥२४॥
ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—ऐसा कहकर नारद यथाभिलषित देश को चले गये। तदनन्तर कुछ दिनों के उपरान्त पुनः द्वारिका आये। उस दिन श्रीकृष्ण भी अन्तःपुर की रमणियों के साथ जलक्रीड़ा करके निर्जन में अवस्थित थे॥२३-२४॥
रम्ये रैवतकोद्याने हर्म्यमालोपशोभिते।
सर्वर्तुकुसुमैर्नित्यं वासिते चित्रकानने॥२५॥
नृत्यद्भिर्बर्हिभिर्नित्यं केकाशतनिनादिते।
कोकिलारावसंघुष्टे चक्रवाकोपशोभिते॥२६॥
रैवतक (द्वारका के निकट पर्वत) के रम्य उद्यान में अट्टालिकावली शोभित थी। वह सभी ऋतुओं के पुष्पों द्वारा नित्य आमोदित थी। वह विचित्र कानन नित्य नृत्यरत मयूर तथा १००-१०० केका के शब्द से गूंजा करता था। वह कोकिल के शब्द से शब्दित तथा चक्रवाक पक्षियों द्वारा उपशोभित था॥२५-२६॥
कोकिलामधुरालापे जलकुक्कुटनादिते।
षट्पदोद्गीतमधुरे शुकचातकनादिते॥२७॥