साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
चतुर्दशोऽध्यायः ७३
चतुर्दशोऽध्यायः ७३
वेदविद्गणों के तुम ही वेद्य हो, नित्य सर्वज्ञानयुक्त सकल देवगण के भी श्रेष्ठ देवता का जो रूप है, वही तुम्हारा रूप है। तुमको नमस्कार है॥२१॥
विश्वकृद्विश्वभूतिश्च वैश्वानरसुरार्चितम्।
विश्वस्थितमचिन्त्यञ्च यद्रूपं तस्य ते नमः॥२२॥
तुम विश्वकृत् (विश्व के सृष्टिकर्त्ता), विश्व के पालक, वैश्वानर (जठराग्नि) तथा देवताओं से अर्चित हो। विश्व में स्थित तथा अचिन्त्य जो रूप है, वह तुम्हारा है। ऐसे तुमको मैं नमस्कार करता हूँ॥२२॥
परं वेदात्परं यज्ञात् परं लोकात् परं दिवः।
परमात्मेति विख्यातं तद्रूपं यस्य ते नमः॥२३॥
जो वेद के परतत्त्व, यज्ञ के परतत्त्व हैं, भूलोक-द्युलोक से भी जो श्रेष्ठ हैं, वे परमात्मा नाम से विख्यात हैं। वह जिनका रूप है, ऐसे तुमको नमस्कार है॥२३॥
अविज्ञेयमनालक्ष्यमध्यात्मगति चाव्ययम्।
अनादिनिधनं चैव यद्रूपं तस्य ते नमः॥२४॥
सहज में जाना नहीं जाता, दुर्निरीक्ष्य, आत्मा के प्रापक एवं आदि-अन्तहीन जो रूप है, वह तुम्हारा है। तुमको नमस्कार है॥२४॥
नमो नमः कारणकारणाय नमो नमः पापविमोचनाय।
नमो नमो वन्दितवन्दिताय नमो नमस्तापविनाशनाय॥२५॥
जो कारण के भी कारण हैं, उन तुमको नमस्कार है, नमस्कार है। तुम पापविमोचक को नमस्कार है, नमस्कार है। तुम पूज्य से भी पूजनीय को नमस्कार है, नमस्कार है। तुम ताप-पाप-विनाशक को नमस्कार है, नमस्कार है (अर्थात् तुम्हें मैं पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ)॥२५॥
नमो नमः सर्ववरप्रदाय नमो नमः सर्वधनप्रदाय।
नमो नमः सर्वसुखप्रदाय नमो नमः सर्वमतिप्रदाय॥२६॥
सबको सभी वर देने वाले तुमको नमस्कार-नमस्कार। समस्त धनप्रदाता तुमको नमस्कार-नमस्कार। सकल सुखप्रदायक तुमको नमस्कार-नमस्कार। सबके मतिप्रदाता तुमको नमस्कार-नमस्कार॥२६॥
श्रुत्वा भगवान् देवस्तैजसं रूपमास्थितः।
उवाच वाचं कल्याणीं को वरो वः प्रदीयताम्॥२७॥
यह सब सुनकर भगवान् लीलाशील सूर्यदेव ने तैजस रूप में विराजित होकर कल्याणकर वाक्य कहा—तुम सबको क्या वर दूँ?॥२७॥
७४ श्रीसाम्बपुराणम्
ब्रह्मोवाच
तवातितेजसं रूपं न कश्चित् सोढुमुत्सहेत्।
सहनीयं भवत्वेतद्धिताय जगतः प्रभो ॥२८॥
ब्रह्मा कहते हैं—आपके इस तेजस्कर रूप को कोई सहन नहीं कर पाता। हे प्रभु! जगत् के हित के लिये आपका यह रूप सहनीय हो जाय॥२८॥
एवमस्त्विति सोऽप्युक्त्वा भगवान् दिनकृद् विभुः।
लोकानां कार्यसिद्ध्यर्थं घर्मवर्षहिमप्रदः ॥२९॥
सूर्यदेव ने कहा—ऐसा ही हो और भगवान् विभु दिनकर लोक की कार्यसिद्धि के लिये उष्ण, वृष्टि तथा शीतल हिमप्रद हो गये (वर्षा, ग्रीष्म तथा शीत—तीन रूप वाले हो गये)॥२९॥
अतः सांख्याश्च योगाश्च ये चान्ये मोक्षकाङ्क्षिणः ।
ध्यायन्ति ध्यानिनो नित्यं हृदयस्थं दिवाकरम् ॥३०॥
सर्वलक्षणहीनोऽपि युक्तो वा सर्वपातकैः ।
सर्वमन्तवते पापं देवमर्कसमाश्रितः ॥३१॥
इसीलिये सांख्य गण, योगीगण एवं अन्य मोक्षार्थी तथा ध्यानीगण हृदयस्थ दिवाकर का नित्य ध्यान करते हैं। समस्त लक्षणहीन होने पर भी अथवा सर्वपातकी व्यक्ति भी सूर्यदेव का आश्रय लेकर समस्त पापों को दूर कर लेता है॥३०-३१॥
अग्निहोत्रञ्च वेदाश्च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः।
भानोर्भक्तेर्नमस्कारात् कलां नार्हति षोडशीम् ॥३२॥
अग्निहोत्र, समस्त वेद, यज्ञ तथा बहुत दक्षिणा आदि भी सूर्यभक्त को नमस्कार करने की तुलना में सोलहवाँ भाग भी नहीं है॥३२॥
तीर्थानां परमं तीर्थं मङ्गलानाञ्च मङ्गलम्।
पवित्राणां पवित्रं च प्रपद्येऽहं दिवाकरम् ॥३३॥
ब्रह्माद्यैः संस्तुतं देवैर्यै नमस्यन्ति भास्करम् ।
सर्वकिल्विषनिर्मुक्ताः सूर्यलोकं व्रजन्ति ते ॥३४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ब्रह्मभाषितः स्तवो नाम चतुर्दशोऽध्यायः
जो तीर्थों में परमतीर्थ, मंगल में परम मंगल, पवित्रों में परम पवित्र हैं, उन दिवाकर का मैं शरणापन्न होता हूँ। जो ब्रह्मादि देवगण द्वारा संस्तुत दिवाकर को नमस्कार करता है, वह सभी पापों से निर्मुक्त होकर सूर्यलोक में जाता है॥३३-३४॥
श्रीसाम्बपुराण में ब्रह्मा द्वारा कथित सूर्यस्तव नामक चतुर्दश अध्याय समाप्त
पञ्चदशोऽध्यायः
(ब्रह्मकृतस्तोत्रम्)
साम्ब उवाच
शरीरलिखनं भानोः कथं वै कति वादितः।
देवैर्वा ऋषिभिर्वापि तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥१॥
साम्ब कहते हैं कि सूर्य का यह शरीर-लेखन (शरीर का अङ्कन, प्रचण्ड उग्र तापमय शरीर का संक्षेपीकरण) किसलिये, कितने प्रकार से, किंवा देवता अथवा ऋषि द्वारा कहा गया है, वह कहिये॥१॥
नारद उवाच
ब्रह्मलोके सुखासीनं ब्रह्माणं ससुरासुरम्।
ऋषयश्चोपसङ्गम्य इदमूचुः समाहिताः ॥२॥
नारद कहते हैं—ब्रह्मलोक में देवता तथा असुरों के साथ सुखपूर्वक बैठे ब्रह्मा के निकट उपस्थित होकर ऋषियों ने समाहित चित्त से इस प्रकार कहा॥२॥
भगवन्नदितेः पुत्रो य एष दिवि राजते।
मार्तण्ड इति विख्यातस्तिग्मतेजो महातपाः ॥३॥
अस्य तेजोभिरखिलं जगत् स्थावरजङ्गमम्।
क्लिश्यमानमनाक्रन्दमुपेक्षसि कथं प्रभो ॥४॥
हे भगवन्! अदिति के पुत्र जो द्युलोक में विराजित हैं, जो मार्तण्ड कहलाते हैं, जो प्रचण्ड किरणों वाले तथा महातपस्वी हैं, उनके तेज से अखिल स्थावर-जंगम विश्व क्लिष्ट होकर चित्कार कर रहा है। हे प्रभु! आप क्यों उपेक्षा कर रहे हैं॥३-४॥
वयमप्याहिताशङ्कास्तेजसा सम्प्रमोहिताः।
दिवि भुव्यन्तरिक्षे च शर्म नोपलभामहे ॥५॥
हम भी भीत-त्रस्त हैं, तेज से सम्यक् रूपेण विमोहित होकर द्युलोक, भूलोक तथा अन्तरिक्ष लोक में कहीं भी कल्याण नहीं पा रहे हैं॥५॥
एवमुक्तस्तु भगवानुवाच कमलासनः।
तमेव शरणं देवं गच्छामः सहितं वयम् ॥६॥
७६ श्रीसाम्बपुराणम्
ततस्तमुदयोदग्रं शैलराजावतंसकम्।
सप्रजापतयः सर्वे संस्तौतुमुपचक्रमुः ॥७॥
ऐसा कहने से (उनके इस प्रकार कहने से) भगवान् कमलासन (ब्रह्मा) कहते हैं—
तुम्हारे साथ मैं इन देव की शरण लेता हूँ। तदनन्तर श्रेष्ठ पर्वत के वंशधर उदयाचल के शिखर पर अवस्थित सूर्यदेव के लिये प्रजापति गण के साथ वे सब स्तुति करने लगे।।६-७।।
ब्रह्मोवाच
नमो नमः सुरवरतिग्मतेजसे नमो नमः प्रणतहितानुकम्पिने ।
नमो नमस्त्रिभुवनभूतभाविने क्रतुक्रियाशुभफलसम्प्रदायिने ॥८॥
शुभाशुभप्रविचयकर्मसाक्षिणे सहस्रसंदीधितये नमो नमः ।
प्रशस्तसप्ताश्वयुतान्तपक्षिणे ध्रुवैकरश्मिग्रथितायते नमः ॥९॥
सबालखिल्याप्सरकिन्नरोरगैः ससिद्धगन्धर्वपिशाचगुह्यकैः ।
सयक्षरक्षोगणचारणोत्तमैर्नमो नमः सत्कृतवन्दिताय ते ॥१०॥
ब्रह्मा कहते हैं—हे देवश्रेष्ठ! तीक्ष्ण किरणमालिन्! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप प्रणतजनों के लिये हितानुकम्पी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। त्रिभुवन के प्राणियों के रक्षक, यज्ञक्रिया का शुभ फल देने वाले आपको बार-बार नमस्कार है। बालखिल्य, अप्सरा, किन्नर, सर्पगण, सिंह, गन्धर्व, पिशाच, गुह्यक, यक्ष, राक्षस और चारणश्रेष्ठ द्वारा पूजित तथा स्तुत आपको नमस्कार है।।८-१०।।
यदा रसान् संसृजते शरीरिणां गभस्तिभिर्घर्महिमाम्बुसर्जनैः ।
जगच्च संशोषयसे ससागरं नमः सदाम्नायनुताय भास्वते ॥११॥
जब तेज, हिम तथा जल सृष्टि के द्वारा देहधारी गण में रस की सृष्टि करते हैं, तब आपकी किरणों द्वारा सागर के साथ-साथ समस्त जगत् का भी शोषण किया जाता है, सर्वदा वेदस्तुत तेजप्रकाशक आपको नमस्कार है।।११।।
जड़ान्धमूकान् बधिरान् सकुब्जकान्
सदद्रुकुष्ठान् कृमिभिः स्रवद्व्रणान् ।
करोषि तानेव पुनर्नवान् यदा
तदा महाकारुणिकाय ते नमः ॥१२॥
जड़, अन्ध, मूक, वधिर, कुब्ज, दद्रु, कुष्ठ, कृमि-क्षारित, व्रणयुक्त तथा काश-रोगीगण को आप पुनः नवीन शरीर-सा कर देते हैं। अतः आप महा कारुणिक को नमस्कार है।।१२।।