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सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

चौथा अध्याय

चौथा अध्याय
पहला खंड
एते असृग्रमिन्दवस्तिरः पवित्रमाशवः. विश्वान्यभि सौभगा.. (१)
हे सोम! आप तेजी से छलनी की ओर भाग रहे हैं. यजमान अपने सौभाग्य के लिए आप को परिष्कृत कर रहे हैं. (१)
विघ्नन्तो दुरिता पुरु सुगा तोकाय वाजिनः. त्मना कृण्वन्तो अर्वतः.. (२)
हे सोम! आप शक्तिदाता, पापनाशी व हमारी पीढ़ियों को पशु धन देते हैं. आप अपना मार्ग स्वयं निर्मित करते हैं. (२)
कृण्वन्तो वरिवो गवे ऽ भ्यर्थन्ति सुष्टुतिम्. इडामस्मभ्य ꣳ संयतम्.. (३)
हे सोम! आप हमें धन प्रदान करते हैं. आप हमारी गायों के लिए भी श्रेष्ठ धन प्रदान करते हैं. आप पालने वाले हैं. आप हमारी प्रार्थनाओं को स्वीकार कीजिए. (३)
राजा मेधाभिरीयते पवमानो मनावधि. अन्तरिक्षेण यातवे.. (४)
हे सोम! आप राजा हैं. हम बुद्धि से आप की उपासना करते हैं. आप अंतरिक्ष में भ्रमण करते हैं. आप द्रोणकलश में स्थित रहते हैं. (४)
आ नः सोम सहो जुवो रूपं न वर्चसे भर. सुषवाणो देववीतये.. (५)
हे सोम! आप को देवीदेवताओं के उपयोग के लिए परिष्कृत किया जाता है. आप हमें भरपूर रूप, वर्चस्व (प्रभाव) व तेज प्रदान कीजिए. (५)
आ न इन्द्रो शातग्विनं गवां पोष ꣳ स्वश्व्यम्. वहा भगत्तिमूतये.. (६)
हे सोम! आप हमें सैकड़ों गाएं व घोड़े प्रदान कीजिए. आप उन सब का पालनपोषण करने में सक्षम हैं. आप हमें भाग्यशाली बनाने की कृपा कीजिए. (६)
तं त्वा नृम्णानि बिभ्रत ꣳ सधस्थेषु महो दिवः. चारु ꣳ सुकृत्येमहे.. (७)
हे सोम! आप स्वर्गलोक के महान वैभव से संपन्न हैं. आप चारु (सुंदर) हैं. आप को हम अपने सुकर्मों से पाना चाहते हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (७)
संवृक्त धृष्णुमुक्थ्यं महामहिव्रतं मदम्. शतं पुरो रुरुक्षणिम्.. (८)
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हे सोम! आप महान, महिमाशाली व व्रती हैं. आप शत्रुओं के सैकड़ों नगरों का नाश
करने वाले हैं. हम आप से धन चाहते हैं. (८)
अतस्त्वा रयिरभ्यवद्राजान २४ सुक्रतो दिव:. सुपर्णो अव्यथी भरत्.. (९)
हे सोम! आप सुकर्म करने वाले, धन व शक्तिदाता हैं. आप कभी व्यथित नहीं होते हैं.
गरुड़ आप को स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर लाने की कृपा करें. (९)
अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे. अभिष्टिकृद्विचर्षणि:.. (१०)
हे सोम! स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर आने के बाद आप और ज्ञानदायी (संपन्न),
महिमाशाली, आकर्षक व क्षमतावान हो जाते हैं. (१०)
विश्वस्मा इत् स्वर्दृशे साधारण २४ रजस्तुरम्. गोपामृतस्य विभ्रत्.. (११)
हे सोम! आप स्वयं प्रकाशमान हैं. आप यज्ञ के रक्षक व जल के प्रेरक हैं. आप अमृत
और दिव्य हैं. (११)
इषे पवस्व धारया मृज्यमानो मनीषिभि:. इन्दो रुचाभि गा इहि.. (१२)
हे सोम! आप ज्ञानवान हैं. मनीषी यजमान आप को परिष्कृत करते हैं. आप पौष्टिक
अन्न देने वाले है. आप अपनी धाराओं में प्रवाहित होइए. (१२)
पुनानो वरिवस्कृध्यूर्जं जनाय गिर्वण:. हरे सृजान आशिरम्.. (१३)
हे सोम! आप हरे व उपासना के योग्य हैं. आप जलवान होइए. आप यजमानों को अन्न
प्रदान करने की कृपा कीजिए. (१३)
पुनानो देववीतय इन्द्रस्य याहि निष्कृतम्. द्युतानो वाजिभिर्हित:.. (१४)
हे सोम! आप पवित्र व दिव्य हैं. आप को इंद्र और देवताओं के लिए परिष्कृत किया
जाता है. आप हित साधक, द्युतिमान व शक्तिशाली हैं. आप इंद्र तक पहुंचने की कृपा
कीजिए. (१४)
दूसरा खंड
अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा. हव्यवाड् जुह्वास्य.. (१)
हे अग्नि! आप कवि, विद्वान्, युवा, हविवाहक व यज्ञ के रक्षक हैं. आप को समिधा से
प्रज्वलित किया जाता है. (१)
यस्त्वामग्ने हविष्पतिर्दूतं देव सपर्यति. तस्य स्म प्राविता भव.. (२)
हे अग्नि! आप हविपति तथा देवदूत हैं. आप की जो विधिवत रक्षा करते हैं, आप उन
की रक्षा करने की कृपा कीजिए. (२)
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यो अग्निं देववीतये हविष्माँ आविवासति. तस्मै पावक मृडय.. (३)
हे अग्नि! आप हविमान हैं. हम देवताओं को हवि पहुंचाने के लिए आप से अनुरोध
करते हैं. आप पवित्र हैं. आप हमें सुखी बनाने की कृपा कीजिए. (३)
मित्र ॐ हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्. धियं घृताची ॐ साधन्ता.. (४)
हे मित्र! आप पवित्र और दक्ष हैं. हे वरुण! आप जल उपजाते हैं. आप दोनों देव हमें
बुद्धि प्रदान कीजिए. आप हमें साधिए एवं हमारे शत्रुओं का नाश कीजिए. हम आप दोनों
देवों का आह्वान करते हैं. (४)
ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा. क्रतुं बृहन्तमाशाथे.. (५)
हे मित्र! हे वरुण! आप सत्य के रक्षक हैं. आप यज्ञ को सफल बनाते हैं. आप हमें भी
पुण्यशाली व सत्य का रक्षक बनाइए. (५)
कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया. दक्षं दधाते अपसम्.. (६)
हे मित्र! हे वरुण! आप दक्ष, जलधारी, कवि व अनेक स्थानों पर वास करते हैं. आप
हमें क्षमतावान बनाते हैं. (६)
इन्द्रेण स ॐ हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा. मन्दू समानवर्चसा.. (७)
हे मरुद्गण! आप समान वर्चस्व वाले सदैव प्रसन्न रहते हैं. आप तेजोमय, वीर व
भयमुक्त हैं. आप इंद्र के साथ सुशोभित होते हैं. (७)
आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे. दधाना नाम यज्ञियम्.. (८)
हे मरुद्गण! आप पूजनीय व नामधारी हैं. आप अपने धाम (नष्ट होने के बाद फिर से
उत्पन्न होने वाले अन्न और जल) में गर्भ धारण कर के आकार प्राप्त करते हैं. आप यज्ञ को
धारण करते हैं. (८)
वीडु चिदारुजत्नुभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्निभिः. अविन्द उस्रिया अनु.. (९)
हे इंद्र! आप मजबूत से मजबूत किले को भी ढहा सकते हैं. आप गूढ़ से गूढ़ गुफा में
भी प्रवेश कर सकते हैं. आग जैसे तेजस्वी मरुद्गण रुकी हुई किरणों को प्रकाश में लाते हैं.
(९)
ता हुवे ययोरिदं पप्रे विश्वं पुरा कृतम्. इन्द्राग्नी न मर्धतः.. (१०)
हे इंद्र! हे अग्नि! आप पराक्रमी उपासकों के सारे कष्ट हरने वाले व सनातन हैं. हम
आप दोनों देवों का आह्वान करते हैं. (१०)
उग्रा विघनिना मृध इन्द्राग्नी हवामहे. ता नो मृडात ईदृशे.. (११)
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हे इंद्र! हे अग्नि! आप उग्र व विघ्ननाशी हैं. हम यज्ञ में आप दोनों देवों का आह्वान
करते हैं. आप दोनों देव हमें सुखी बनाने की कृपा कीजिए. (११)
हथो वृत्राण्यार्या हथो दासानि सत्पती. हथो विश्वा अप द्विष:.. (१२)
हे इंद्र! हे अग्नि! आप श्रेष्ठ देव, आर्यों के पालनहार सभी द्वेषों को दूर करने वाले व
सत्पति हैं. आप दुश्मनों को दूर करने वाले हैं. (१२)
तीसरा खंड
अभि सोमास आयव: पवन्ते मद्यं मदम्.
समुद्रस्याधि विष्टपे मनीषिणो मत्सरासो मदच्युत:.. (१)
हे सोम! आप आनंददायी एवं स्फूर्तिदायी हैं. यजमान आनंद तथा स्फूर्ति पाने के लिए
द्रोणकलश के ऊपर रखी हुई छलनी से आप को छानते हैं. (१)
तरत्समुद्रं पवमान ऊर्मिणा राजा देव ऋतं बृहत्.
अर्षा मित्रस्य वरुणस्य धर्मणा प्र हिन्वान ऋतं बृहत्.. (२)
हे सोम! आप पवित्र, लहरदार, विशाल व राजा हैं. आप को मित्र और वरुण देव के
पीने के लिए यज्ञ में स्थापित किया जाता है. (२)
नृभिर्येमाणो हर्यतो विचक्षणो राजा देव: समुद्र्य:.. (३)
हे सोम! आप दिव्य, राजा, मनोहर व विलक्षण हैं. आप समुद्र जैसे हैं. (३)
तिस्रो वाच ईरयति प्र वह्निर्ऋतस्य धीतिं ब्रह्मणो मनीषाम्.
गावो यन्ति गोपर्ति पृच्छमाना: सोमं यन्ति मतयो वावशाना:.. (४)
हे सोम! यजमान ऋक्, यजु और साम रूप तीन वाणियों से आप का गुणगान करते हैं.
ब्राह्मण और मनीषी उसी प्रकार आप को खोजते (पूछते हुए) आते हैं, जिस प्रकार गाएं बैल
के पास जाती हैं. (४)
सोमं गावो धेनवो वावशाना: सोमं विप्रा मतिभि: पृच्छमाना:.
सोम: सुत ऋच्यते पूयमान: सोमे अर्कास्त्रिष्टुभ: सं नवन्ते.. (५)
हे सोम! दुधारू गाएं आप को चाहती हैं. ब्राह्मण पूछते हुए सोम को चाहते हैं. सुत
(यजमान) पवित्र सोम को चाहते हैं. यजमान त्रिष्टुप् छंद में रची गई प्रार्थनाओं से सोम की
उपासना करते हैं. (५)
एवा न: सोम परिषिच्यमान आ पवस्व पूयमान: स्वस्ति.
इन्द्रमा विश बृहता मदेन वर्धया वाचं जनया पुरंधिम्.. (६)
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हे सोम! आप हमारे हित हेतु परिष्कृत होने की कृपा कीजिए. आप पवित्र होइए. आप
हमारा कल्याण कीजिए. आप हमें श्रेष्ठ बुद्धि दीजिए. आप हमारी प्रार्थना स्वीकारिए. आप
इंद्र को तृप्त कीजिए. (६)
चौथा खंड
यद्याव इन्द्र ते शत २४ शतं भूमीरुत स्युः.
न त्वा वज्रिन्त्सहस्र २४ सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी.. (१)
हे इंद्र! सैकड़ों भूमि, सैकड़ों सूर्य और सैकड़ों लोक भी आप की महिमा के बराबर नहीं
हो सकते. आप जैसा अब तक कोई उत्पन्न नहीं हुआ. भूमंडल और अंतरिक्षमंडल तक में
आप की समानता कोई नहीं कर सकता. (१)
आ पप्राथ महिना वृष्ण्या वृषन्विश्वा शविष्ठ शवसा.
अस्माँ अव मघवन् गोमति व्रजे वज्रिं चित्राभिरूतिभिः.. (२)
हे इंद्र! आप बलवान, सामर्थ्यवान व मनोकामनाएं पूरी करने वाले हैं. आप धनवान,
वज्रधारी व श्रेष्ठ मतिवान हैं. आप अपने रक्षा साधनों के साथ पधारिए. आप गायों से भरे हुए
बाड़े प्रदान कीजिए. (२)
वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृत्तबर्हिषः.
पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन्नपरि स्तोतार आसते.. (३)
हे इंद्र! आप शत्रुनाशी हैं. हम सोमरस को जलप्रवाह की भांति आप के पास प्रवाहित
कर के लाते हैं. हम आप को परिष्कृत सोमरस चढ़ाते तथा विराजने के लिए आप को कुश
का आसन भेंट करते हैं. (३)
स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः.
कदा सुतं तृषाण ओक आ गमदिन्द्र स्वब्दीव व २४ सगः.. (४)
हे इंद्र! आप सर्वत्र वास करते हैं. आप सब को वास देते हैं. यजमान सोमरस चढ़ा कर
आप की उपासना करते हैं. आप बैलों की तरह आवाज करते हुए अपने बेटों के यहां कब
पधारने की कृपा करेंगे? (४)
कण्वेभिर्धृष्णवा धृषद्वाजं दर्षि सहस्रिणम्.
पिशङ्गरूपं मघवन्विचर्षणे मक्षू गोमन्तममीमहे.. (५)
हे इंद्र! आप धनी, ज्ञानी, शत्रुनाशी व बहुरंगी हैं. आप हजारों तरह के वैभव व हजारों
गुनी शक्ति दे सकते हैं. हम कण्ववंशी यजमान आप की उपासना करते हैं. (५)
तरणिरित्सिषासति वाजं पुरंध्या युजा.
आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा नेमिं तष्टेव सुद्रुवम्.. (६)
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हे इंद्र! हम आप के उपासक हैं. हम भव सागर पार करना चाहते हैं. हम बुद्धि का बल
(शारीरिक बल के साथसाथ) भी पाना चाहते हैं. चलता हुआ पहिया जैसे एकदम नीचे आ
जाता है, वैसे ही हम प्रार्थना रूपी पहिए से इंद्र के लिए झुक जाते हैं. (६)
न दुष्टुतिर्द्रविणोदेषु शस्यते न सेधन्त १४ रयिर्नशत्.
सुशक्तिरिन्मघवन् तुभ्यं मावते देष्णं यत्पार्ये दिवि.. (७)
हे इंद्र! सोमयाग में सशक्त (उत्तम) उपासकों को आप उचित (उपयुक्त) धन प्रदान
करते हैं. जो लोग दानदाता की निंदा करते हैं, जो लोग अच्छा काम करने वालों की निंदा
करते हैं, ऐसे लोगों पर आप अपनी कृपा मत कीजिए. (७)
पांचवां खंड
तिस्रो वाच उदीरते गावो मिमन्ति धेनव:. हरिरेति कनिक्रदत्.. (१)
यजमान तीन वाणियां उचारते हैं. उन वाणियों को सुन कर हरे रंग का सोमरस दुधारू
गाय के रंभाने जैसी आवाज करता हुआ प्रवाहित होता है. (१)
अभि ब्रह्मीरनूषत यह्वीर्रृतस्य मातर:. मर्ज्यन्तीर्दिवः शिशुम्.. (२)
हम यजमान स्वर्गलोक के शिशु सोम को परिष्कृत करने के लिए मंत्र उचारते हैं. सत्य
की माता से सोम उत्पन्न हुए हैं. ब्रह्मज्ञानी सोम की उपासना करते हैं. (२)
रायः समुद्रा १४ श्रुतुरोस्मभ्य १४ सोम विश्वतः. आ पवस्व सहस्रिणः.. (३)
हे सोम! आप हमें सभी प्रकार के सुख दीजिए. आप हमें सभी प्रकार के धन दीजिए.
आप हमारी हजारों इच्छाओं को पूरा करने के लिए प्रवाहित होने की कृपा कीजिए. (३)
सुतासो मधुमत्तमाः सोमा इन्द्राय मन्दिनः.
पवित्रवन्तो अक्षरं देवान् गच्छन्तु वो मदाः.. (४)
हे सोम! आप मधुमान हैं. हम आप के पुत्र हैं. आप इंद्र को प्रसन्न करने के लिए
प्रवाहित होइए. आप पवित्र हैं और कभी क्षरित (नष्ट) नहीं होते. आप देवताओं को आनंद
प्रदान करने के लिए उन के पास जाने की कृपा कीजिए. (४)
इन्दुरिन्द्राय पवत इति देवासो अब्रुवन्.
वाचस्पतिर्मखस्यते विश्वस्येशान ओजसः.. (५)
हे इंद्र! उपासक आप के लिए सोमरस स्वच्छ करते हैं. आप सब के ईश्वर, ओजस्वी
और वाचस्पति हैं. यज्ञ में सोमरस का उपयोग किया जाता है. (५)
सहस्रधारः पवते समुद्रो वाचमीङ्खयः.
सोमस्पती रयीणा १४ सखेन्द्रस्य दिवेदिवे.. (६)
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हे सोम! आप हजार घर वाले हैं. आप पवित्र व इंद्र के सखा हैं. आप जलवान व
धनवान हैं. आप प्रतिदिन द्रोणकलश में प्रवाहित होते हैं. (६)
पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः.
अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तः सं तदाशत.. (७)
हे सोम! आप पवित्र हैं. आप ब्रह्मज्ञान के स्वामी व देह के मालिक हैं. आप समर्थों पर
कृपा करते हैं. यज्ञ करने वाले ही आप तक पहुंच पाते हैं. जिस ने तन नहीं तपाया, वह आप
से कुछ (सुखकृपा) नहीं पा सकता. (७)
तपोष्पवित्रं विततं दिवस्पदे ऽ र्चन्तो अस्य तन्तवो व्यस्थिरन्.
अवन्त्यस्य पवितारमाशवो दिवः पृष्ठमधि रोहन्ति तेजसा.. (८)
हे सोम! आप पवित्र हैं. आप दुश्मनों को तपाने के लिए स्वर्गलोक में फैले हुए हैं. आप
की किरणें चमकीली हैं. ये चमकीली किरणें स्वर्गलोक के पीछे स्थित हैं और यजमानों की
रक्षा करती हैं. (८)
अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा मिमेति भुवनेषु वाजयूः.
मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमा दधुः.. (९)
हे सूर्य! आप सभी ग्रहों में सब से प्रमुख हैं. आप प्रकाशित होते हैं. आप सभी लोकों में
अपनी किरणें फैलाते हैं तथा सभी भुवनों में अन्न उपजाते हैं. आप की किरणें सब को
प्रकाशित करती हैं. ये किरणें अपने गर्भ में जल धारण करती हैं. (९)
छठा खंड
प्र म ꣹ हिष्ठाय गायत ऋताव्ने बृहते शुक्रशोचिषे. उपस्तुतासो अग्नये.. (१)
हे यजमानो! आप महान यज्ञ करने वाले हैं. आप अग्नि की उपासना कीजिए. अग्नि
महान व तेजस्वी हैं. (१)
आ व ꣹ सते मघवा वीरवद्यशः समिद्धो द्युम्न्याहुतः.
कुविन्नो अस्य सुमतिर्भवीयस्यच्छा वाजेभिरागमत्.. (२)
हे अग्नि! आप वीर, यशवान व उत्तम बुद्धि वाले हैं. आप पीढ़ी दर पीढ़ी धन और यश
प्रदान करते हैं. आप हम पर कृपा कीजिए. हमें अन्नबल प्रदान कीजिए. (२)
तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृक्षु सासहिम्. उ लोककृत्नुमद्रिवो हरिश्रियम्.. (३)
हे इंद्र! आप साहसी, बलशाली एवं इच्छापूरक हैं. आप लोक का भला चाहने वाले व
अश्वों से सुशोभित होते हैं. सोमरस पीते ही आप प्रसन्न हो जाते हैं. हम आप के स्वरूप की
प्रशंसा करते हैं. (३)
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येन ज्योति 28 ष्पायवे मनवे च विवेदिथ. मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि.. (४)
हे इंद्र! आप मनुष्य को दीर्घायु बनाते हैं व मानव के हितकारी हैं. आप ने मनुष्यों के
लिए ही कई वस्तुएं प्रकाशित की हैं. आप आइए प्रसन्न होइए. आप कुश के आसन पर
विराजने की कृपा कीजिए. (४)
तदद्या चित्त उक्थिनो ऽ नु ष्टुवन्ति पूर्वथा. वृषपत्नीरपो जया दिवेदिवे.. (५)
हे इंद्र! पूर्व से ही आप के यजमान आप की गाथा (यश) गाते हैं. अब भी आप के यश
को गाते हैं. आप असुरों पर विजय पाने में हमारी सहायता कीजिए. हम प्रतिदिन आप की
स्तुति करते हैं. (५)
श्रुधी हवं तिरश्च्या इन्द्र यस्त्वा सपर्यति.
सुवीर्यस्य गोमतो रायस्पूर्तिं महाँ असि.. (६)
हे इंद्र! आप महान व तिरश्चि ऋषि प्रार्थना करने में लगे हुए हैं. आप उन की प्रार्थना
सुनने की कृपा कीजिए. आप हमें श्रेष्ठ वीर्यवान व धनवान बनाइए. (६)
यस्त इन्द्र नवीयसीं गिरं मन्दामजीजनत्.
चिकित्विमनसं धियं प्रत्नामृतस्य पिप्युषीम्.. (७)
हे इंद्र! जो यजमान नईनई प्रार्थनाओं से आप की उपासना करते हैं, उन्हें श्रेष्ठ बुद्धि
मिलती है. आप उन पर अमृत बरसाते हैं व मन को पवित्र बनाने वाली सोच प्रदान करते हैं.
(७)
तमु ष्ट्वाम यं गिर इन्द्र मुक्थानि वावृधुः.
पुरूण्यस्य पौ 28 स्या सिषासन्तो वनामहे.. (८)
हे इंद्र! बहुत सी प्रार्थनाओं से हम ने आप की उपासना की है और कर रहे हैं. हम
स्तोत्रों और मंत्रों से आप का यशगान करते हैं. आप पराक्रमी हैं. हम पूरी निष्ठा के साथ आप
की उपासना करते हैं. (८)
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