सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
उन्नीसवां अध्याय
उन्नीसवां अध्याय
पहला खंड
अग्निः प्रत्नेन जन्मना शुम्भानस्तन्व ३ २ स्वाम्. कविर्विप्रेण वावृधे.. (१)
हे अग्नि! आप प्रकाशमान व मेधावी हैं. पुराने स्तोत्रों से यजमान आप को प्रज्वलित
कर के आप का विस्तार करते हैं. (१)
ऊर्जो नपातमा हुवे ऽ ग्निं पावकशोचिषम्. अस्मिन्यज्ञे स्वध्वरे.. (२)
हे अग्नि! हम अपने इस यज्ञ में अग्नि को आमंत्रित करते हैं. आप पवित्र व प्रकाशमान
हैं. आप ऊर्जा को नीचे नहीं गिरने देते हैं. (२)
स नो मित्रमहस्त्वमग्ने शुक्रेण शोचिषा. देवैरा सत्सि बर्हिषि.. (३)
हे अग्नि! आप अपनी चमकीली लपटों से अन्य देवताओं के साथ कुश के आसन पर
विराजिए. आप हमारे मित्र हैं. (३)
उत्ते शुष्मासो अस्थू रक्षो भिन्दन्तो अद्रिवः. नुदस्व याः परिस्पृधः.. (४)
हे सोम! पत्थरों से कूट कर आप का रस निकाला जाता है. आप की उमड़ती हुई लहरों
से राक्षसों का नाश होता है. जो हम से प्रतिस्पर्धा करते हैं, आप उन शत्रुओं का नाश करने
की कृपा कीजिए. (४)
अया निजघ्निरोजसा रथसङ्गे धने हिते. स्तवा अभिभ्युषा हृदा.. (५)
हे सोम! आप सामर्थ्यवान व शत्रुनाशक हैं, रथ को साथ ले कर शत्रुओं को नष्ट
कीजिए. हम हृदय से आप से धन देने के लिए अनुरोध करते हैं. (५)
अस्य व्रतानि नाधृषे पवमानस्य दूढ्या. रुज यस्तवा पृतन्यति.. (६)
हे सोम! आप पवित्र हैं. आप के दृढ़ व्रतों से दुष्ट राक्षस प्रगति नहीं कर सकते. जो शत्रु
युद्ध करना चाहते हैं, आप उन शत्रुओं का नाश कीजिए. (६)
त २ हिन्वन्ति मदच्युत २ हरिं नदीषु वाजिनम्. इन्दुमिन्द्राय मत्सरम्.. (७)
सोमरस मद बरसाने वाला, स्फूर्तिदायक व हरी कांति वाला है. इंद्र हेतु सोम को नदी के
जल से प्रेरित किया जाता है. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*
आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः.
मा त्वा के चिन्नियेमुरिन्न पाशिनो ऽ ति धन्वेव ताँ इहि.. (८)
हे इंद्र! आप के घोड़े मनोहर हैं. उन के बाल मोरपंख जैसे हैं. आप उन घोड़ों सहित यज्ञ
में पधारने की कृपा कीजिए. शिकारी आप की राह में जाल न फैला सकें, अतः आप उन्हें
रेगिस्तान में पहुंचा दीजिए. (८)
वृत्रखादो वलं रुजः पुरां दर्भो अपामजः.
स्थाता रथस्य हर्योरभिश्वर इन्द्रो दृढा चिदारुजः.. (९)
हे इंद्र! आप घोड़ों से सजे हुए रथ में बैठ कर बलवान शत्रुओं को भी हरा देते हैं. आप
उन की नगरियों का भी नाश कर देते हैं. आप राक्षसों के बलनाशक हैं. आप दुष्टों की दुष्ट
प्रवृत्तियों का भी नाश करते हैं. (९)
गम्भीराँ उदधी २४ रिव क्रतुं पुष्यसि गा इव.
प्र सुगोपा यवसं धेनवो यथा हृदं कुल्या इवाशत.. (१०)
हे इंद्र! गंभीर समुद्र को जैसे छोटे तालाब अधिक जल दे कर पोसते हैं, वैसे ही आप
यजमान की मनोकामना पूरी कर के उन्हें पोसते हैं. ग्वाले जैसे गायों को घास चारा डाल कर
पोसते हैं, वैसे ही यजमान इंद्र को सोमरस भेंट कर के पोसते हैं. (१०)
यथा गौरो अपा कृतं तृष्यन्नेत्यवेरिणम्.
आपित्वे नः प्रपित्वे तूयमा गहि कण्वेषु सु सचा पिब.. (११)
हे इंद्र! आप हमारे दोस्त की तरह आइए. आप उसी ललक से आइए, जैसे प्यास से
व्याकुल हिरण तालाब के पास जाता है. आप कण्वों के निकट सोमपान करने की कृपा
कीजिए. (११)
मन्दन्तु त्वा मघवन्निन्द्रन्दवो राधोदेयाय सुन्वते.
आमुष्या सोममपिबश्चम्वू सुतं ज्येष्ठं तद्दधिषे सहः.. (१२)
हे इंद्र! आप धनवान हैं. सोमरस आप को मदमस्त बना दे. आप इस सोमरस को
पीजिए. आप हमें और हमारे बेटों को खूब धन दीजिए. (१२)
त्वमङ्ग प्र श २४ सिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम्.
न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः.. (१३)
हे इंद्र! आप हमारी प्रशंसा करते हैं. आप सब से बढ़िया सुख देते हैं. हम आप ही से
प्रार्थना करते हैं, क्योंकि आप के अतिरिक्त कोई दूसरा उतना धनवान और सुखदायक नहीं
है. (१३)
मा ते राधा २४ सि मा त ऊतयो वसो ऽ स्मान्कदा चना दभन्.
ebook converter DEMO Watermarks*
विश्वा च न उपमिमीहि मानुष वसूनि चर्षणिभ्य आ.. (१४)
हे इंद्र! आप के धन कभी भी हमारे लिए हानिकारक न हों. आप के रक्षा साधन भी
कभी हमें हानि न पहुंचाएं. आप संसार के शरणदाता हैं. आप मनुष्यों को सभी धन देने की
कृपा कीजिए. (१४)
दूसरा खंड
प्रति ष्या सूनरी जनी व्युच्छन्ती परि स्वसुः. दिवो अदर्शि दुहिता.. (१)
उषा सूर्य की बेटी हैं. वे श्रेष्ठ नारी हैं. वे अपना प्रकाश चारों ओर फैलाती हुई जाती हैं.
दिन के न दिखाई देने पर वे अपना प्रकाश फैलाती हैं. (१)
अश्वेव चित्रारुषी माता गवामृतावरी. सखा भूदश्विनोरुषाः.. (२)
उषा रश्मियों की मां हैं. वे रश्मियां अद्भुत और चमकीली हैं. वे अश्विनीकुमारों की मित्र
हैं. (२)
उत सखास्यश्विनोरुत माता गवामसि. उतोषो वस्व ईशिषे.. (३)
उषा उपासना के योग्य हैं. वे रश्मियों की मां हैं और अश्विनीकुमारों की मित्र हैं. (३)
एषो उषा अपूर्व्या व्युच्छति प्रिया दिवः. स्तुषे वामश्विना बृहत्.. (४)
हे अश्विनी! उषा अपूर्व, प्रिय व दिन लाती हैं. हम विशाल स्तोत्रों से उन की उपासना
करते हैं. (४)
या दस्रा सिन्धुमातरा मनोतरा रयीणाम्. धिया देवा वसुविदा.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! आप बुद्धिमानों के धनदाता हैं. आप नदियों को पैदा करने वाले,
मनोहर व धनवान हैं. (५)
वच्यन्ते वां ककुहासो जूर्णायामधि विष्टपि. यद्वा रथो विभिष्पतात्.. (६)
जब आप दोनों अश्विनीकुमारों का रथ पक्षी की भांति उड़ कर ऊपर जाता है तब आप
दोनों के लिए स्वर्ग में भी स्तोत्र पढ़े जाते हैं. (६)
उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति. येन तोकं च तनयं च धामहे.. (७)
हे उषा! आप धनवती और यज्ञ कार्य भी आरंभ करने वाली हैं. आप अद्भुत वैभव
दीजिए, जिस से हम संतान और अपने मित्रों का भरणपोषण करने में समर्थ हो सकें. (७)
उषो अद्येह गोमत्यश्वावति विभावरि. रेवदस्मे व्युच्छ सूनृतावति.. (८)
हे उषा! आप गोवती व अश्ववती हैं. आप रात्रि के बाद दिन लाने वाली हैं. आप हमें पुत्र
ebook converter DEMO Watermarks*
और धन दीजिए. (८)
युंक्ष्वा हि वाजिनीवत्यश्वाँ अद्यारुणाँ उषः. अथा नो विश्वा सौभगान्या वह.. (९)
हे उषा! आप यज्ञ कार्य आरंभ कराने वाली व धनवती हैं. आप अपने रथ में लाल घोड़ों
को जोतिए. हमें संसार में सौभाग्यवान बनाने की कृपा कीजिए. (९)
अश्विना वर्तिरस्मदा गोमद्दस्रा हिरण्यवत्. अर्वाग्रथ ꣳ समनसा नि यच्छतम्.. (१०)
हे अश्विनीकुमारो! आप शत्रुओं का नाश करने वाले हैं. आप हमें गोवान बनाइए. आप
अपने सुनहरे रथ को मन से हमारे यज्ञ में लाने की कृपा कीजिए. (१०)
एह देवा मयोभुवा दस्रा हिरण्यवर्तनी. उषर्बुधो वहन्तु सोमपीतये.. (११)
उषा के साथ उद्बुद्ध (जाग्रत) सुनहरी किरणें, इन सुखमय अश्विनीकुमारों को सोमपान
करने के लिए हमारे यज्ञ में लाने की कृपा करें. (११)
यावित्था श्लोकमा दिवो ज्योतिर्जनाय चक्रथुः.
आ न ऊर्जं वहतमश्विना युवम्.. (१२)
हे अश्विनीकुमारो! आप स्वर्गलोक से यज्ञ के लिए ज्योति ला कर लोगों का हित करने
की कृपा कीजिए. आप दोनों हमें अन्नवान व ऊर्जावान बनाने की कृपा कीजिए. (१२)
तीसरा खंड
अग्निं तं मन्ये यो वसुरस्तं यं यन्ति धेनवः.
अस्तमर्वन्त आशवो ऽ स्त॑ नित्यासो वाजिन इष ꣳ स्तोतृभ्य आ भर.. (१)
हे अग्नि! आप सर्वव्यापक हैं. हम आप की उपासना करते हैं. घोड़े व गाएं जिन की
शरण में हैं, हम यजमानों को भी आप अपनी शरण में लीजिए. हम नित्य नियम निभाने वाले
और हवि देने वाले हैं. आप हमें अन्नदान कीजिए. हम आप की उपासना करते हैं. (१)
अग्निंहिं वाजिनं विशे ददाति विश्वचर्षणिः.
अग्नी राये स्वाभुव ꣳ स प्रीतो याति वार्यमिष ꣳ स्तोतृभ्य आ भर.. (२)
हे अग्नि! आप यजमान को अन्नवान बनाने वाले, व्यापक दृष्टि वाले और पूजनीय हैं.
आप प्रसन्न हो कर आसानी से यजमानों को धन देते हैं. आप उपासकों को भरपूर धन देने
की कृपा कीजिए. (२)
सो अग्निर्ये वसुर्गृणे सं यमायन्ति धेनवः.
समर्वन्तो रघुद्रुवः स ꣳ सुजातासः सूरय इष ꣳ स्तोतृभ्य आ भर.. (३)
हे अग्नि! सारी गौएं तेज गति वाले घोड़े व विद्वान् आप की शरण में हैं. आप पूजनीय
ebook converter DEMO Watermarks*
हैं. आप यजमानों को भरपूर अन्न प्रदान करने की कृपा कीजिए. (३)
महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती.
यथा चिन्नो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते.. (४)
हे उषा! आप प्रकाशवती हैं. आप हम सभी को पहले की तरह आज भी बोधित
(जाग्रत) करने की कृपा कीजिए. आप हम पर भी वैसी ही कृपा कीजिए, जैसी आप ने व्यय
के पुत्र सत्यश्रवा पर की. जैसा आप ने उन्हें (सत्यश्रवा को) जाग्रत किया, वैसे ही हमें भी
जाग्रत करने की कृपा कीजिए. (४)
या सुनीथे शौचद्रथे व्यौच्छो दुहितर्दिवः.
या व्युच्छ सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते.. (५)
हे उषा! आप स्वर्गलोक की दुहिता (पुत्री) हैं. आप शुचद्रथ के पुत्र सुनीथ हेतु अंधेरे को
भगा कर प्रकट हुईं. आपने सुनीथ पर जैसी कृपा की, वैसी ही आप व्यय के पुत्र सत्यश्रवा
पर भी कीजिए. (५)
सा नो अद्याभरद्वसुर्व्युच्छा दुहितर्दिवः.
यो व्यौच्छः सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते.. (६)
हे उषा! आप स्वर्गलोक की दुहिता (बेटी) हैं. आप हमें भरपूर धन देने व आज हमारे
अंधेरे (प्राकृतिक और अज्ञान रूप दोनों) को नष्ट करने की कृपा कीजिए. आप सत्यस्वरूपा
हैं. आप व्यय के पुत्र सत्यश्रवा पर अपनी कृपा कीजिए. (६)
प्रति प्रियतम ꣳ रथं वृषणं वसुवाहनम्.
स्तोता वामश्विनावृषि स्तोमेभिर्भूषति प्रति माध्वी मम श्रुत ꣳ हवम्.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! आप का रथ वैभव व पराक्रम धारण करता है. आप का रथ
उपासकों की प्रार्थना से सुशोभित होता है. आप हमारी प्रार्थनाओं को सुनने की कृपा
कीजिए. (७)
अत्यायातमश्विना तिरो विश्वा अह ꣳ सना.
दस्रा हिरण्यवर्तनी सुषुम्णा सिन्धुवाहसा माध्वी मम श्रुत ꣳ हवम्.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! आप दूसरों का अतिक्रमण कर के (लांघ कर) हमारे पास पधारने
की कृपा कीजिए. आप शत्रुनाशक हैं. आप की कृपा से हम अपने शत्रु पर विजय पा सकें.
आप सोने के रथ वाले हैं. आप धनवान हैं. आप नदी के समान बहते हैं. आप हमारी
प्रार्थनाओं को सुनने की कृपा कीजिए. (८)
आ नो रत्नानि बिभ्रतावश्विना गच्छतं युवम्.
रुद्रा हिरण्यवर्तनी जुषाणा वाजिनीवसू माध्वी मम श्रुत ꣳ हवम्.. (९)
ebook converter DEMO Watermarks*
हे अश्विनीकुमारो! आप सोने के रथ वाले, शत्रुनाशी, धनधारी, धनधान्य वाले व यज्ञ
प्रेमी हैं. आप हमारे यज्ञ में पधारिए और प्रतिष्ठित होइए. आप हमारी प्रार्थनाओं को सुनने की
कृपा कीजिए. (९)
चौथा खंड
अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्.
यह्वा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सस्रते नाकमच्छ.. (१)
हे अग्नि! आप लोगों (यजमानों) की समिधा से प्रदीप्त होते हैं. नींद से उठ कर गौएं
जैसे जाग्रत होती हैं, वैसे ही आप जाग्रत हैं. पेड़ों की शाखाएं जैसे आकाश की ओर फैलती
हैं, वैसे ही आप की लपटें स्वर्ग की ओर फैलती हैं. (१)
अबोधि होता यजथाय देवानूर्ध्वो अग्निः सुमनाः प्रातरस्थात्.
समिद्धस्य रुशददर्शि पाजो महान् देवस्तमसो निरमोचि.. (२)
हे अग्नि! आप यज्ञ के प्रबल आधार हैं. देवों के लिए (हवि पहुंचाने हेतु) आप को
प्रज्वलित किया जाता है. आप ऊर्ध्वगामी हैं व सुबह अच्छे मन से ऊपर की ओर जाते हैं.
आप महान हैं. आप को हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं. आप देवताओं व संसार को अंधकार से
दूर करते हैं. (२)
यदीं गणस्य रशनामजीगः शुचिरङ्क्ते शुचिभिर्गोभिरग्निः.
आदक्षिणा युज्यते वाजयंत्युत्तानामूर्ध्वो अधयज्जुहूभिः.. (३)
हे अग्नि! आप बाधाएं व अंधेरे को दूर करते हैं. आप संसार को प्रकाशमान व यजमान
घी की आहुतियों से बलवान बनाते हैं. आप ऊर्ध्वगामी हो कर उस घी वाली आहुतियों को
स्वीकारते हैं. (३)
इद ॐ श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरागाच्चित्रः प्रकेतो अजनिष्ट विश्वा.
यथा प्रसूता सवितुः सवायैवा रात्र्युषसे योनिमारैक्.. (४)
हे उषा! आप सभी ज्योतियों से श्रेष्ठ ज्योति वाली हैं. आप की ज्योति सर्वत्र फैलती है.
सभी वस्तुओं को ज्योतिर्मय बना देती हैं. सविता के अस्त होने के बाद रात्रि उषा को उत्पन्न
होने के लिए जगह देती हैं. (४)
रुशद्वत्सा रुशती श्वेत्यागादारैगु कृष्णा सदनान्यस्याः.
समानबन्धू अमृते अनूची द्यावा वर्णं चरत आमिनाने.. (५)
हे उषा! आप सूर्य का चमकीला स्वरूप ले कर पैदा हुई और रात्रि काले रंग का. सूर्य
दोनों के समान रूप से बंधु हैं, दोनों अमर हैं. स्वर्गलोक में एक के बाद एक आतीजाती हैं.
दोनों एकदूसरे का प्रभाव समाप्त करती हैं. (५)
ebook converter DEMO Watermarks*
समानो अध्वा स्वस्रोरनंतस्तमन्यान्या चरतो देवशिष्टे.
न मेथेते न तस्थतुः सुमेके नक्तोषासा समनसा विरूपे.. (६)
दोनों बहनों (उषा और रात्रि) की एक ही राह है. वह राह अनंत है. उसी राह पर ये दोनों
एकदूसरे के पीछे चलती हैं, भले ही इन के स्वरूप एकदूसरे से अलग हैं पर इन के मन समान
हैं. ये दोनों अपनेअपने कार्यों में लगी रहती हैं. (६)
आ भात्यग्निरुषसामनीकमुद्विप्राणां देवया वाचो अस्थुः.
अर्वाञ्चा नून १४ रथ्येह यातं पीपिवा १४ समश्विना घर्ममच्छ.. (७)
अग्नि प्रज्वलित हो गए हैं. उषा के प्रकट होते ही अग्नि प्रज्वलित हो जाते हैं. दिव्य
प्रार्थनाएं शुरू हो गई हैं. अश्विनीकुमार रथ में विराज गए हैं. हम उन से सोमरस पीने के लिए
यज्ञ में पधारने का अनुरोध करते हैं. (७)
न स १४ स्कृतं प्र मिमीतो गिमष्ठान्ति नूनमश्विनोपस्तुतेह.
दिवाभिपित्वे ऽ वसागमिष्ठा प्रत्यवतिं दाशुषे शम्भविष्ठा.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! आप परिष्कृत पदार्थों को ग्रहण करने की कृपा कीजिए. यज्ञस्थान
के समीप आने वाले आप के लिए उपासना की जाती है. दिन के आते ही आप प्रतिष्ठित हो
जाते हैं. आप यजमान को प्रतिष्ठा प्राप्त कराने की कृपा कीजिए. (८)
उता यात १४ संगवे प्रातरह्नो मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य.
दिवा नक्तमवसा शन्तमेन नेदानीं पीतिरश्विना ततान.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! सूर्य उगने के समय, दिन के मध्य में, शाम और दिन रात में आप
पधारिए. आप अपने रक्षा साधनों सहित पधारने की कृपा कीजिए. आप के ये साधन
दिनरात सुखदायी हैं. अभी तक आप के बिना सोमरस पीने का कार्य शुरू नहीं किया गया है.
(९)
पांचवां खंड
एता उ त्या उषसः केतुमक्रत पूर्वे अर्धे रजसो भानुमञ्जते.
निष्कृण्वाना आयुधानीव धृष्णवः प्रति गावो ऽ रुषीर्यन्ति मातरः.. (१)
हे उषा! आप उजाला फैलाती हैं. आप के आने से पूर्व दिशा में प्रकाश हो जाता है. वीर
अपने आयुधों को जैसे चमकाते हैं, वैसे ही आप संसार को चमचमा देती हैं. माता उषा
प्रतिदिन आती और जाती हैं. (१)
उदपप्तन्नरुणा भानवो वृथा स्वायुजो अरुषीर्गा अयुक्त.
अक्रन्नुषासो वयुनानि पूर्वथा रुशन्तं भानुमरुषीरशिश्रयुः.. (२)
उषा के आते ही लाल किरणें आकाश में छा गई हैं. अपनेआप जुते हुए रथ से वे चेतना
ebook converter DEMO Watermarks*
फैलाती हैं तथा सूर्य की सेवा करती हैं. (२)
अर्चन्ति नारीरपसो न विष्टिभिः समानेन योजनेना परावतः.
इषं वहन्तीः सुकृते सुदानवे विश्वेदह यजमानाय सुन्वते.. (३)
जो यजमान अर्चना करते हैं, सोमरस को परिष्कृत करते हैं, अच्छे कार्य करते हैं, दान
करते हैं, उन यजमानों को उषा अन्न व बल देती हैं और प्रकाशमान बना देती हैं. युद्ध में
सज्जित वीर की भांति वे आकाश की शोभा बढ़ा देती हैं. (३)
अबोध्यग्निर्ज्म उदेति सूर्यो व्यु ३ षाश्चन्द्रा मह्यावो अर्चिषा.
आयुक्षातामश्विना यातवे रथं प्रासावीद्देवः सविता जगत्पृथक्.. (४)
अग्नि वेदी में प्रज्वलित हो गए हैं. सूर्य आकाश में उदित हो गए हैं. उषा महान हैं. वे
अपनी तेजस्विता से सब को प्रसन्न कर देती हैं. हे अश्विनीकुमारो! आप अपने घोड़े रथ में
जोतिए, यहां प्रस्थान करिए. सूर्य सभी को अलगअलग कार्य करने की प्रेरणा दे रहे हैं. (४)
युङ्गुञ्जाथे वृषणमश्विना रथं घृतेन नो मधुना क्षत्रमुक्षतम्.
अस्माकं ब्रह्म पृतनासु जिन्वतं वयं धना शूरसाता भजेमहि.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! आप अपने रथ में घोड़े जोत कर हमारे यज्ञ में पहुंचिए. हमें घृत से
पुष्ट करिए, हमें आत्मज्ञान दीजिए, हमें शत्रुओं को जीतने की क्षमता दीजिए. हम धन पा
सकें. हम आप को भजते हैं. (५)
अर्वाङ् त्रिचक्रो मधुवाहनो रथो जीराश्वो अश्विनोर्यातु सुष्टुतः.
त्रिबन्धुरो मघवा विश्वसौभगः शं न आ वक्षद्द्विपदे चतुष्पदे.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! आप रथ पर विराज कर यज्ञ में पधारिए. आप का रथ तीन पहियों
वाला, मधुर अमृतधारी, द्रुतगामी, अश्वजुत, सराहनीय व तीन लोगों के बैठने की जगह वाला
है. वह प्रचुर ऐश्वर्यवान और सौभाग्यवान है. आप सब के प्रति कल्याणकारी भावना रख कर
हमारे यज्ञ स्थान में पधारने की कृपा कीजिए. (६)
प्र ते धारा असश्चतो दिवो न यन्ति वृष्टयः. अच्छा वाज ᳵ सहस्रिणम्.. (७)
हे सोम! आप की झरने वाली धाराएं वैसे ही बरसती हैं, जैसे स्वर्गलोक से बरसात होती
है. आप की धाराएं अन्न बरसाती हैं. (७)
अभि प्रियाणि काव्या विश्वा चक्षाणो अर्षति. हरिस्तुञ्जान आयुधा.. (८)
हे सोम! आप सर्वप्रिय, सर्वद्रष्टा व हरिताभ हैं. आप शत्रुओं पर आयुधों से प्रहार करते
हैं. (८)
स मर्मृजान आयुभिर्विभो राजेव सुव्रतः. श्येनो न व ᳵ सु षीदति.. (९)
हे सोम! आप श्रेष्ठकर्मा (अच्छे कार्य करने वाले) हैं. यजमान आप को परिष्कृत करते
ebook converter DEMO Watermarks*
हैं. आप राजा के समान व अच्छे संकल्पों वाले हैं. बाज पक्षी जैसे वेगवान होता है, वैसे ही
आप वेगवान हैं. आप बहुत वेग से जल में मिल जाते हैं. (९)
स नो विश्वा दिवो वसूतो पृथिव्या अधि. पुनान इन्दवा भर.. (१०)
हे सोम! आप स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और सर्वत्र व्याप्त हैं. आप हमें सब प्रकार का
कल्याण प्रदान करने की कृपा कीजिए. (१०)
ebook converter DEMO Watermarks*