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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

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DevanagariHindipublished286 pages

About this granth

Rasikapriya (रसिकप्रिया) is Keshavdas's Braj Bhasha treatise on the erotic sentiment (shringara rasa), written in the late sixteenth century under the patronage of Prince Indrajit Singh of Orchha. It became the model for describing types of heroes and heroines in Hindi Riti poetry, later poets followed its scheme, and its scenes were painted widely in Rajasthani and Pahari miniatures.

Its sixteen prabhavas treat the nature of rasa and the kinds of shringara, the types of hero, the companion and the messenger, the types of heroine and their gestures, the eight situations of the heroine such as one whose lover is devoted, one betrayed and one who waits adorned, the lover's pique and its appeasement, and love in union and separation. For each definition Keshav gives his own verses on Radha and Krishna.

This edition carries the Priyaprasad commentary of Acharya Vishwanath Prasad Mishra, the noted critic and editor of Riti poetry, and runs to 286 pages.

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द्वादश प्रभाव २३५
सूधे साधु सुद्ध वे तौ कुटिल प्रसिद्ध ये तौ,
केसव मरम-चोर परम किरात हैं।
पाइहैं पकरि तब पाइहै न कैसैंहू तूँ,
थोरो इठलाति ये तौ अति इठलात हैं।
बरजति क्यों न तो सों कब की कहति, मेरे
मोहन के मनै तेरे नैन छूवै छूवै जात हैं ।२३।
शब्दार्थ—अमल = स्वच्छ । तिक्ष = तीक्ष्ण । चल = चंचल । नलिन =
कमल । पात = पत्र, दल । सूधे = सीधे । साधु = सज्जन । सुद्ध = पवित्र ।
किरात = भील, दुर्जन ।
भावार्थ—( श्रीकृष्ण के मन की शुद्धता और राधिका के नेत्रों की अस्पृ-
श्यता का वर्णन है ) श्रीकृष्ण का मन तो कमल की तरह कोमल और स्वच्छ
है, पर ये तेरे नेत्र तीक्ष्ण, चंचल, मलिन और नए नीले कमल के पत्र के ऐसे
हैं । वे (श्रीकृष्ण मन से) तो सीधे, सज्जन और पवित्र हैं और ये कुटिल, मर्म
(चित्त) को चुरानेवाले एवम् निरे किरात ( अत्यंत अपवित्र, दुष्ट ) हैं। पर
जब वे इसे पकड़ लेंगे ( तेरे नेत्र उनके मन में धँस जाएँगे ) तब तू इन्हें किसी
प्रकार पा न सकेगी ( फिर वहाँ से निकलेंगे नहीं ) तू तो थोड़ा इठलाती है,
पर ये तेरे ये नेत्र अधिक इठला रहे हैं। मैं न जाने कब से तुझे मना कर रही
हूँ (पर मना करने पर भी) तेरे ये (कुटिल सिरचढ़े) नेत्र मेरे मोहन के मन
को बार बार छू छू जाते हैं ( तूने नेत्र तो लगाना आरंभ कर दिया, पर ये
लगने पर फिर वश में न रह जाएँगे ।
रामजनी को वचन कृष्ण सों, यथा--( सवैया )
(४३५) कौनहूँ तोष कहा भयो केसव कामिनि कोटिक सों हित ठाटैं ।
रंच न साध सधै सुख की बिनराधिकै अधिक लोचन डाटैं ।
क्यों खरी सीतल बास करै मुख जौ भखियै घनसार के साटैं ।
लालच हाथ रहै ब्रजनाथ पै प्यास बुझाइ न ओस के चाटैं ।२४।
शब्दार्थ—तोष = तृप्ति । हित = प्रेम । ठाटें = करने से । रंच = किंचित्
भी । साध = इच्छा । सधै = पूरी हो । अधिक = आधे । डाटें = देखने से ।
खरी = खड़िया । घनसार = कपूर । साटें = बदले में ।
भावार्थ—क्या करोड़ों कामिनियों से प्रेम का ठाट ठटने से आपकी कोई
२३-अमल-श्रमल । प्रसिद्ध-करम । मरम-परम । मरम-चोर-चितचोर।
इठलाति-इतराति । तो सों-तू ही । मनै-नैन । २४—रंचन-रंचक । सधै-
सुधै । जो०-जो रे भक्षी ।

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२३६ रसिकप्रिया
तृप्ति हो गई ? (निश्चित जानिए कि ) राधिका को, आधे ही नेत्र से सही,
बिना देखे सुख की इच्छा थोड़ी भी पूरी नहीं हो सकती। यदि कपूर के बदले
में ( उजली उजला ) खरिया खा ली जाय तो क्या वह मुँह को शीतल और
सुवासित कर सकती है ? ( तुम जो बहुतों से प्रेम कर रहे हो, इसमें) हे
ब्रजनाथ, केवल लालच ही हाथ रहेगा ( तृप्ति न होगी ) । क्या कभी ओस
चाटने से भी प्यास बुझती है ?
अलंकार—लोकोक्ति ।
संन्यासिनी को वचन राधिका सों, यथा-( कवित्त )
(४३६) छुटै न छुटाएँ जब करिहौ धौं कैसी बात,
केसौदास अनयास प्यास भूख भागिहै।
खेल भूलि जाइगो जुड़ाइगो न चित्त चेति,
कछु ना सुहाइगो री रैनिदिन जागिहै ।
ताते तें तपति दूनी सीरे तें सहस गुनी,
उपजि परैगी उर ऐसी और आगि है।
ऐंड सों ऐंडाइ जिन अंचल उड़ात, ओली,
ओड़ति हौं काहू की जु डीठि उड़ि लागिहै ।२५।
शब्दार्थ—अनयास = बिना परिश्रम, यों ही । खेल = क्रीड़ा । जुड़ाइगो
न = चित्त को शांति न मिलेगी । चेति = सावधान हो । ताते तें = उष्ण
उपचारों से । सीरे = शीतल उपचारों से । और = अन्य, विलक्षण । ऐंड़ =
लटक, गर्व की मुद्रा । ओली = चादर, अंचल । ओली ओड़ति हौं = अंचल
पसारकर प्रार्थना करती हूँ ।
भावार्थ—देख तू ऐंड़ से ऐंड़ा मत, तेरा अंचल उड़ा ( हटा ) जा रहा
है । मैं तुझसे आँचल पसारकर प्रार्थना करती हूँ ( ऐसा मत कर ) । किसी
की दृष्टि आकर लग जाएगी । जब ( दृष्टि लग जाएगी और ) छुटाने से
भी न छूटेगी तब क्या करेगी ? यों ही तेरी प्यास और भूख भाग जाएगी ।
क्रीड़ा भूल जाएगी, चित्त शांत न रहेगा, सावधान हो जा । फिर कुछ भी
अच्छा न लगेगा । रातदिन तू जागती ही रहेगी। हृदय में ऐसी विलक्षण
आग उत्पन्न हो जायगी कि उष्ण उपचारों से तो दूनी होगी और शीतल
उपचारों से सहस्रों गुनी हो जाया करेगी ।
२५—छुटैं न-छूटिहै, न छूटिहै । बात-तब । भागिहै-लागिहै । न-री ।
और-एक । ओली-प्रति । ओड़ति हौं-जानति हैं। उड़ि-उर ।

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द्वादश प्रभाव २३७
सूचना—'नजर' लगने और दृष्टि लगने ( प्रेम करने ) की एक सी ही
अवस्था मानी गई है ।
संन्यासिनि को वचन कृष्ण सों, यथा—( कबित्त )
(४३७) सीतलहू हीतल तिहारें न बसति वह,
तुम न तजत तिल ताको उर ताप-गेहु ।
आपनो ज्यौ हीरा सो पराएँ हाथ ब्रजनाथ,
दैहै तौ अकाथ हाथ मैन ऐसो मन लेहु ।
एते पर केसोदास तुम्हैं न प्रवाह वाहि,
वहै जक लागी भागी भूख सुख भूल्यो देहु ।
माड़ौ मुख छाड़ौ छिन छल न छबीले लाल,
ऐसी तौ गँवारिन सों तुमहूँ निबाहौ नेहु ।२६।
शब्दार्थ—हीतल = हृदय । तिल = थोड़ा भी । ताप गेहु = ताप का
घर, उत्तप्त । ज्यौ = जी, चित्त । अकाथ = व्यर्थ । मैन = मोम । प्रवाह =
(परवाह) चिंता । वाहि = उसे । जक = रट, धुन । माड़ौ = केसर आदि
से सुशोभित करते हो ।
भावार्थ—छबीले लाल, तुम भी कैसी गँवारिन से प्रेम का निर्वाह कर
रहे हो । वह तो तुम्हारे शीतल हृदय में बसती नहीं और तुम उसके उत्तप्त
हृदय को क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़ते (कितना कष्ट सहते हो)।
(आप ऐसे उदार हैं कि) अपना हीरे के ऐसा (मूल्यवान्) मन दूसरे के
हाथ देकर व्यर्थ ही उसका मोम के ऐसा (तुच्छ) मन लिये हुए हैं। इतने
पर भी आपको तो अपने मन की परवा नहीं, पर उसे अपने मन की धुन
लगी है। उसी धुन में उसकी भूख भाग गई है, देह की सुध नहीं, सुख
भूला हुआ है। फिर भी तुम (केसर से) उसका मुख सुशोभित करते हो
और वह क्षण भर के लिए छल नहीं छोड़ती। (व्यंग्य यह है कि आपका
हृदय उसके वियोग से उत्तप्त नहीं, उसे आप भूले हुए हैं, पर वह विरह से
जलती हुई भी क्षण भर के लिए आपको नहीं भुलाती । आपने अपना हीरे
सा कठोर मन दूसरों को सौंप दिया है और उसका मोम सा कोमल हृदय
आपके वश में है। आपको तो अपनी कोई चिंता नहीं • पर वह अपने मन
की बराबर चिंता करती है, इसी मन की दुर्दशा में भूख मारी गई है, देह
की सुधबुध नहीं रह गई है। आपके वियोग में उसका मुँह केसर की तरह
२६—तजत-तजहु । आपनो-आपने । ज्यो-जो । सो-को । अकाथ हाथ-
अकाथ साथ । मैन०-माखन सो । केसोदास-केसोराइ । देहु-गेहु : माड़ौ०-
मांजौ मुख छाड़ौ ।

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२३८ रसिकप्रिया

पीला पड़ गया, है पर आपके मुख पर आंच भी नहीं—ऐसी नागरी से आप
कैसे बुरे ढंग से प्रेम को निबाह रहे हैं ! ) ।
अलंकार—व्याजर्निंदा ।
पटइनि को वचन राधिका सों, यथा—( सवैया )
(४३८) याही कों मेरी गुसाइँनि मैं मिलई पहिलेँ बतियाँ छलि छैलो ।
बातैं मिलै अँखियाँ मिलई सखियान की आँखिनि पारि कै ऐलो ।
आँखि मिले मुँह लागि रहै मन लेहु मिलै ब गहैं हम गैलो ।
मिले मन माई कहा करिहौ मुहुँ ही के मिलैं तौ कियो मन मैलो ।२७।
शब्दार्थ—याही को = इसीलिए। छलि छैलो = छैल ( नायक ), को
छलकर । बातैं मिलै = बात हो जाने पर । अँखियाँ मिलई = साक्षात्कार
कराया । पारिकै = डालकर । ऐलों = धूल । मुँह लागि रहै = मुँह मिला,
बातें करने का अवसर मिला । मन लेहु मिलै ब = अब उनके मन मिला न
लो । गहैं हम गैलो = हम अपनी गली पकड़ें । माई = हे सखी ।
भावार्थ—क्या इसी अवसर के लिए मैंने वे सब बातें की थीं ? मैंने
नायक को छलकर तुम्हारी बातें मिलाईं ( बातचीत पक्की की ) । बातें मिल
जाने पर सखियों की आँखों में धूल डालकर आँखें मिलाईं ( साक्षात्कार
कराया ) । आँखें मिलने पर मुँह मिला ( बातचीत का अवसर मिला ) ।
अच्छा अब मन भी मिला लो, हम अपने रास्ते जाएँ। जब तुमने मुँह के
मिलने पर ही मन इतना मैला कर लिया तब मन के मिल जाने पर न जाने
क्या करोगी ( जिसने इतना उपकार किया उसके साथ यह व्यवहार ! ) ।
सूचना—( १ ) मानमोचन कराना चाहती है ।
( २ ) 'मिलाने' का तारतम्य होने से पटइन भासित होती है ।
पुनः—( सवैया )
(४३६) गेह को नेह की देह की दीबें की भूषन की जिन भूख भगाई ।
मोहिं हँसी-दुख दोऊ दई तिनहीं सों जनावति है चतुराई ।
केसवदास बड़ाई दई तौ कहा भयो जाति-सुभाव न जाई ।
सोने सिंगारहु सोंधे चढ़ावहु पीतर की पिवराई न जाई ।२८।
शब्दार्थ—दीबे की = देने की, धन दे सकने की शक्ति । भूषन = आभू-
षण । हंसी = आनंद । दई = हे दैव । सोंधे = सुगंध ।
२७—लागि०-सों मिलिहै । लेहु-नेहु । मिले०-माई मिले मन का ।
तौ-तें, जो । २८—की-के । की-के । की-के । दीबे-दीखै । को-कें । भगाई-
भराई । केसवदास-केसवराइ । तो-सो । जाति-जान । चढ़ावहु-बिमायन ।

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द्वादश प्रभाव २३६
भावार्थ—जिन्होंने घर, प्रेम, शरीर, धन और आभूषण की तेरी भूख
मिटा दी, मुझे हंसी भी आती है और दुख भी होता है कि हे ईश्वर, आज तू
उन्हीं से चतुराई कर रही है। भला तुझे इतनी बड़ाई दी भी गई तो क्या
हुआ, कभी भी जाति-स्वभाव नहीं जाता। पीतल को चाहे सोने से सिंगारा
जाय चाहे उस पर सुगंध का लेप ही क्यों न किया जाय उसकी पितराई
( दुर्गुण ) जाती नहीं।
अलंकार—लोकोक्ति ।
सूचना—सरदार ने लिखा है—'याही पेंच तें केशव सामान्या कहि
चुके...... हमारे शिष्य नारायण कवि को भ्रम भयो कि यह कबित्त
और को है।'
हस्तलिखित प्रतियों में भी यह छंद मिलता है। हाँ, लीथोवाली प्रति में
यह नहीं है। छंद 'केशव' का ही जान पड़ता है। धन और भूषणादि की
इच्छा पूर्ण करने की बात होने से इसमें सामान्या ही नायिका होगी।
पटइनि को वचन कृष्ण सों, यथा—( सवैया )
(४४०) वा मृगनैनी ज्यों औरनहीं जु लगावत हौ मुँह ऐसे न हूजै ।
सोनैंई सी सुनपीतर होइ तौ केसव कैसहूँ हाथ न छूजै ।
आप गिरा गुन जौ सिखवै तऊ काक न कोकिल ज्यों कल कूजै ।
सुंदर स्याम बिराम करौ कछु आम की साध न आमिलि पूजै ।२६।
शब्दार्थ—ज्यों = भाँति । सुनपीतर = घटिया पीतल । गिरा = सरस्वती ।
काक = कौआ । न कल कूजै = सुंदर स्वर से नहीं बोलता । बिराम करौ =
रुको, अपने कार्य बंद करो। साध = प्रबल इच्छा ।
भावार्थ—उस मृगनयनी की भाँति आप जो अन्य स्त्रियों को मुंह लगाते
हैं, एसा न होना चाहिए। सोने की तरह सोनपीतल भी होता है पर उसे कोई
हाथ से नहीं छूता । यदि स्वयम् सरस्वती ( बोलने का ) गुण सिखाए तो भी
कौआ कोयल की तरह सुंदर वाणी नहीं बोलता । इसलिए हे श्यामसुंदर,
अब आप अपनी करतूत बंद करें। क्या कभी आम की इच्छा इमली पूर्ण
कर सकती है ?
अलंकार—लोकोक्ति ।
( दोहा )
(४४१) बैन ऐन-सुख मैन करि, कहे सखिनि के धर्म ।
केसव कहौं कछूक अब तिनके कोबिद कर्म ।३०।
२६—सोनेंई०-सोने सो जो कहूँ पीतर । होइ-होहि । धर्म-नर्म, मर्म,
कर्म ।

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यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का लिप्यंतरण है:

२४० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—ऐन = ( अयन ) घर । ऐन-सुख = सुख का घर, सुखदायक ।
मैन=( मदन ) काम । कोबिद = चातुर्यपूर्ण ।
इति श्रीमन्महाराजकुमार इंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां
सखीजनवर्णनं नाम द्वादशः प्रभावः ॥१२॥
त्रयोदश प्रभाव
अथ सखीजनकर्म-वर्णन—(दोहा)
(४४२) सिक्षा, बिनय, मनाइबो, मिलवै करि सिंगार ।
झुकि अरु देइ उराहनो, यह तिनको ब्योहार ।१।
शब्दार्थ—सिक्षा=सीख । मिलवै = मिलाती है। झुकि = क्रुद्ध होकर ।
राधिका सों शिक्षा-(सवैया)
(४४३) नाह लगें मुख सौति दहैं दुख, नाहिं लगें दुख देह दह्रैगो ।
नाहीं अबै सुख देति है केसव, नाह सदा सुख देत रह्रैगो ।
नाही तें नाही री नाहीं भलाई, भली सब नाह ही तें पै कहैगो ।
नाह सों नेह निबाहि बलाइ ल्यौं; नाहीं सों नेह कहा निबहैगो।२।
भावार्थ—(मानवती नायिका को सखी शिक्षा दे रही है) हे सखी, पति
के मुख लगने पर ( प्रेम करने पर ) दुःख सौतों को जलाता है और यदि
'नहीं' मुख लगेगी तो वही दुख तेरे शरीर को जलाएगा । 'नहीं' केवल इस
समय सुख देती है और पति सदा सुख देता रहेगा । 'नहीं' से भलाई
नहीं है, नहीं है। पति के अनुकूल रहने से ही सब भली कहेंगे । इसलिए मैं
तेरी बलैया लेती हूँ तू नायक से प्रेम का निर्वाह कर, 'नहीं' से भला क्या
प्रेम मिलेगा ।
सूचना—यहाँ देह को केशव ने संस्कृत के अनुकूल पुंलिंग ही रखा है ।
कृष्ण की शिक्षा—( कबित्त )
(४४४) कुंकुम उबटि कुमकुमा के न्हवाइ जल,
सोंधो सिर लाइ याहि लाए कहा रास में ।
चंदन चढ़ाइ फूलमाल पहिराइ भूलि,
वेही काज आँजि मौलि कीनी है प्रकास में ।
१—वर्णन-कथन । मिलवै-मिलिबो, मिलवहि । करि-करहि । सिंगार-
सिंगार । अरु-के । २—राधिका सों-नायिका सों शिक्षा सखी की, राधिका की
शिक्षा प्रकास । दुख देह-मुख देह । तें-री । री-तें । भली-भलो । ही
तें-हिते । बलाइ ल्यों-री बाबरी ।

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१६ त्रयोदश प्रभाव २४१
केसव कपूर पूरि काहे कौ खवाचौ पान,
जौ पै मन मगन है ऐसे ही बिलास में ।
वाहि न मनावौ हरि हाहा करि पाइ परि,
सब ही सुबास बसै जाके मुखबास में ।३।
शब्दार्थ—कुंकुम = केसर । उबटि = मलकर । सोंधो सिर लाइ = सिर में
सुगंध लगाकर । आँजि माँजि = अंजन लगाकर साफ सुथरी करके, श्रृंगार
करके । प्रकास में = सबके समक्ष । पूरि = डालकर । बिलास = आनंद ।
वाहि = उसे ( अन्य नायिका को ) ।
भावार्थ—केसर का उबटन लगाकर और केसर के ही जल से स्नान
कराके सिर में सुगंध लगाकर इसे रास में क्यों ले आए हो ? चंदन चढ़ाकर
और फूलमाला पहनाकर, भूल करके बिना किसी मतलब के इसे सँवार-सिंगार
कर प्रकाश में किया है ( सबके सामने लाए हो)। पान में कपूर डालकर उसे
क्यों खिलाते हो, यदि आपका मन ऐसे ही विलास में मग्न है तो आप जाकर
और पैरों पड़कर विनय करके उसे क्यों नहीं मनाते जिसके मुख की सुगंध में
सब प्रकार की सुगंध मिलती है । ( व्यंग्य यह है कि तुम दिखाने को तो आप
अपनी नायिका लेकर आए हो, पर तुम्हारी दृष्टि में कोई और स्त्री है, उसे
ही जाकर सँवारिए सिंगारिए ) ।
राधा सों विनय—( सवैया )
(४४५) ऐसेंही क्यों चुप ह्वै रहिहौं सखि हौं सहिहौं सतराहट सौ लौं ।
क्यों सरिहै मिलिबे बिन तोहि तऊ मिलियै मिलियै दिन जौ लौं ।
केसव कोरि करौ उपचार मिलै को कहा मिलिहै सुख तौ लौं ।
देखि धौं अंगनि आरसी लै मिलिहै पिय सों मन ही मन कौ लौं ।४।
शब्दार्थ—सतराहट = झिड़की । सौ लौं = सौ तक (अनेक) । सरिहै =
( काम ) चलेगा । मिलियै दिन जौ लौं = जब तक मिलने का दिन मिले ।
उपचार = उपाय ।
भावार्थ—मैं इस प्रकार कैसे चुप रहूँगी । मैं तो तेरी सैकड़ों तक
झिड़कियाँ सहूँगी और वही बारवार कहूँगी ) । बिना मिले तेरा काम कैसे
चलेगा । तब तक मिलते रहना चाहिए जब तक मिलने का दिन ( मौका )
३—कुँकुव०-कुंकुम जवादिसेंद । कुमकुमा०-कुमकुमा के नहवाइ, कुंकु-
मान अन्हवाइ । फूलमाल-फूलि फूल, फूले फूल, पुनि फूल । आँजि-आज । जौ
पै०-मन जो मगन है जू । ऐसेंही-ऐसोई, वेसेई । ४—हौं सहिहौं=होत कहा ।
तऊ०-तऊ मिलिहै । देखि०-देखियै । मिलिहै-मिलिहौ ।

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२४२ रसिकप्रिया
मिलता जाय । इस प्रकार चाहे करोड़ों उपाय करो, पर मिलने का सुख तब
तक मिल ही नहीं सकता ( जब तक मिला न जाय ) । थोड़ा दर्पण लेकर
अपने अंगों को तो देख ले ( दुबली होती जा रही है ) । इस प्रकार प्रिय से
मन ही मन कब तक मिलती रहेगी ?
कृष्ण सों विनय—( कबित्त )
(४४६) कंज कैसे फूले नैन दारचौं से दसन ऐन,
बिंब से अधर, हास सुधा सो सुधारचो है ।
बेनी पिकबैनी की त्रिबेनी सी बनाइ गुही,
बार कै सेवार करिहाँ कों करि हारचो है ।
कीने कुच अमल कलपतरु के से फल,
केसौदास यातें बिधि मुगध बिचारचो है ।
देखौ न गुपाल सखी मेरी को सरीर सब,
सोने सों सँवारि सब सोंधे सों सँवारचो है ।५।
शब्दार्थ—दा०यों = (दाड़िम) अनार । ऐन = ठीक । बिंब = बिंबाफल,
कूँदरू । सुधारचो = बनाया हुआ ( आनंददायक ) । बेनी = वेणी, चोटी ।
पिकबैनी = कोयल के से कंठ ( वाणी ) वाली । कै = करके ।
भावार्थ—उसके नेत्र कमल के से हैं, दाँत ठीक अनार ( के दाने ) की
भाँति हैं, ओठ बिंबाफल से हैं और हँसी अमृत के समान आनंददायक है ।
उस कोकिल के से कंठ वाली की चोटी त्रिवेणी ( गंगा, यमुना, सरस्वती के
संगम ) की भाँति, केश सेवार के से करके ब्रह्मा कमर बनाते बनाते अंत.में
हार ही बैठा । उसने कल्पवृक्ष के सुंदर फलों के से उसके कुच बनाए हैं,
इसलिए ब्रह्मा ( अपनी ) उस सृष्टि पर स्वयम् मुग्ध है । इसलिए हे गोपाल
आप मेरी सखी का शरीर देखिए न ! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि वह
(शरीर) सोने से बनाया गया है और सुगंध से सँवारा गया है (सोने में सुगंध
नहीं होती, पर उसका शरीर देखकर ऐसा जान पड़ता है कि सोना और सुगंध
दोनों एकत्र हैं ) ।
राधा को मनाइबो—( सवैया )
(४४७) 'नाहीं'सिखौबति नाहीं भली सखि पावक सों तिनको मुँह डाहौ ।
भौंहनि के भुलबौ भद्दू भावनि नैननि के मत सों हित बाढ़ौ ।
५—कंज-मुख । बिंब-लाल । गुही-बीर । बार० बार सी बारीक, धार
सो बारीक, बार ज्यों सिवार । अमल०-अमल धमलका के फल के से । सब
सोंधे-मनौं मैन, मनु सैन, मानो मैन । सँवारचो-सुधारचो ।

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त्रयोदश प्रभाव २४३
कालि तें कालि कै होन दई हँसी, पाइ परौं न परौ मुँह काढ़ौ ।
राज करौ यह राज सदा रहै केसव चित्र ज्यों आगे ही ठाढ़ौ ।६।
भावार्थ—जो 'नहीं' सिखाती हैं वे भली नहीं हैं । 'नहीं' सिखानेवाली
स्त्रियों का मुख आग से जला दो । भौंहों के ( इस रोष भाव ) को भुला दो,
नेत्रों के अनुकूल चलकर प्रेम बढ़ायो । कल-कल करके तो तुमने खूब अपनी
हँसी होने दी । पैरों पड़ती हूँ अब पड़ी ( लेटी ) न रहो अपना मुँह ( चादर
में से ) बाहर निकालो । चलो रजो राजो, तुम्हारा यह राज सदा रजा रहे
और चित्र की भाँति ज्यों का त्यों आगे खड़ा रहे ।
सूचना—हस्तलिखित प्रति में और सरदार की टीका में यह छंद मिलता
है, पर लीथोवाली प्रति में नहीं है । सरदार ने लिखा है—'यह कबित्त प्राचीन
पुस्तकन में नाहीं मिलत तातें नारायण कवि नहीं लिख्यो ।
पुनः—( सवैया )
(४४८) रीझि रिझाइ झरोखनि झाँकि रही मुख देखि दिखाइ सुबाहीं ।
बोलन आएँ अबोली भई अब केसव ऐसी हमें न सुहाहीं ।
मैं बहुतै बहराई हैं तो सी तू बहरावति मोहिं वृथाहीं ।
एहीं समान सदा चलिहौ हरि सों हँसि 'हाँ' करै मोहीं सों नाहीं ।७।
शब्दार्थ—रीझि = मुग्ध होकर । रिझाइ = मुग्ध करके । सुबाहीं=स्व-
भावतः, प्रकृत्या । बोलन = बोलने के लिए । अबोल = मौन । बहराई =
भुलावा दिया । सयान = चतुराई ।
भावार्थ—स्वयम् मुग्ध होकर और नायक को मुग्ध करके झरोखों से
झाँक कर स्वभावतः उनका मुख देख रही है और अपना दिखा रही है । पर
जब यहाँ बोलने के लिए आते हैं तब चुप्पी साध लेती है । मुझे ऐसी स्त्रियाँ
अच्छी नहीं लगतीं । तेरी ऐसी बहुतों को मैंने भुलावा दिया है, पर तू जो मुझे
भुलावा देना चाहती है वह व्यर्थ है । क्या सदा तेरी यही चतुराई चलती रहेगी ?
कैसी विलक्षण है कि नायक से तो हँसकर 'हाँ' करती है और मुझसे 'नहीं' ।
कृष्ण को मनाइबो—( सवैया )
(४४६) भूषन-भेद बनाइकै केसव फूल बनाइ बनाइकै बागे ।
भाग बढ़ाइ सुहाग बढ़ाइक राग बढ़ाइ हियें अनुरागे ।
६—पावक-जावक । सों-लों । होन-दौन । न परो-तन प्यौ । यह
जहँ । राज-आज । आगे०-आग ही डाढ़ो । ७—री-पै । एहीं-याही, ऐसे ।
करै-करि । मोहीं-मोहिं, मोहू ।

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२४४ रसिकप्रिया
पाइनि लागत सोंधो चढ़ावत पान खवावतहीं निसि जागे।
कान्ह चलौ उठि बैठे कहा ? मन मूसि परायो ब रूसन लागे ।८।
शब्दार्थ—भूषन-भेद = विविध प्रकार के गहने । बनाइकै = सजाकर ।
बागे = वस्त्र । राग = प्रेम । सोंधो = सुगंध । मूसि = चुराकर । रूसन लागे =
रूठने लगे ।
भावार्थ—उस समय का तो ध्यान कीजिए जब विविध प्रकार के गहनों,
पुष्पों और वस्त्रों से सजकर उसे आकृष्ट करने के लिए आया करते थे । भाग्य,
सोहाग और प्रेम को बढ़ाकर हृदय से उस पर अनुरक्त हुए । पैरों पड़ते, सुगंध-
द्रव्य लगाते और पान खिलाते हुए ही तुम रात रात भर जागते रह जाते
थे । अतः हे कृष्ण, उठकर चलिए । यहाँ क्या बैठे हैं, दूसरे का मन चुराकर
अब रूठने चले हैं ?
· राधा को मिलैबो—( सवैया )
(४५०) दुर्लभ देवनिहूँ कौं सु तौ हरि को मन हाँसिन ही हरि लीनौ ।
टारहु जैं हिय तैं कबहुँ अब ज्यों गुरु को दियो मंत्र प्रबीनौ ।
लेत लियो तौ न देत दियो अब मानहु ता दिन दुक्ख नवीनौ ।
माँगन आवै तौ दीजै भटू अपनो मन, जौ वह जाइ न दीनौ ।६।
शब्दार्थ—जै = ( जिन ) मत । लेति० = लेते समय तो बड़े आनंद से
उसे ले लिया, पर अब वह दिया नहीं जाता, प्रत्युत देने में एक नया दुःख ही
खड़ा हो जाता है । अतः यदि माँगने आएँ तो श्रीकृष्ण को चाहे उनका मन
मत लौटाना पर अपना मन दे देना ।
सूचना—यह छंद सरदार की टीका में तो है, पर उन्होंने लिखा है—
‘यह कबित्त केशव को नाहीं तातें नारायण कवि नाहीं लिखो' । हस्तलिखित
प्रतियों में भी यह छंद है। लीथोवाली प्रति में नहीं है। इसमें केशव की
छाप नहीं है।
पुनः—( सवैया )
(४५१) आजु देवारि की राति जौ कीजै तौ आजु के द्योस लौं है है सभागी ।
बात सुनी जननी पै जबै तब हा मति मान का नींद न जागी ।
अंग सिँगारि निहारि निसा तिन चित्तबिहारनि सों अनुरागी ।
दीप दै देवनि जाइ ---- मिसि केसवराय भा खेलन लागी ॥१०॥
....-बागे । चढ़ावत-लगावत । निसि०-रसपागे । परायो ब-परायौ
सु । ६—मन-पुत्र । ही-इ । हरि-हठि । जैं-जो । तौन देत०-तौन मानहु
सों मानिहौ तादिन । दुख्ख-दुस्ट । १०-पुनः-मध्य को मिलैबो । तौ-सु ।
जबै-जबहीं । केसवराय-केसवदास ।

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त्रयोदश प्रभाव २४५
शब्दार्थ—आजु कें० = यदि दीवाली की रात सानंद मनाई जाय तो
अगले वर्ष की दीवाली तक अच्छे दिन बीतते हैं। पै = से। मति० = बुद्धि
मान की निद्रा से जाग उठी, मान छोड़कर बुद्धि कल्याण-साधन में लगी ।
चित्त-बिहार = मनोरंजन ।
सूचना—इस छंद के विषय में भी सरदार लिखते हैं—'पूर्ववत् यह
भी ग्रन्थ को बनायो है। तातें नारायण कवि तिलक नाहीं लिख्यो।'
राधिका को मिलैबो—( कबित्त )
(४५२) जौ हौं गनों औगुननि तौ तूँ गनै गुनगन,
जौ हौं गनों गुन तौ तूँ औगुन के गन मैं ।
केसौदास ऐसें प्रीति छिपावति छलनि मैं,
जैसें छनछबि छूटै छिपै जाइ घन मैं ।
भारी है निठुर निसि भादों की भयावनी में,
सु क्यों बसै घर जाको पीउ बसै बन मैं ।
बैठे तें उठावै, उठि चले तें मचलि रहै,
सोई मेरी क्यों न कहै जोई तेरे मन मैं ।११।
शब्दार्थ—छनछबि = बिजली। ऐसें० = तू अपनी प्रीति छल करके ऐसे
छिपाती है जैसे बिजली चमकती है, पर बादल में छिप जाती है। तेरे प्रेम
की केवल झलक मिलती है। जौ हौं० = मैं प्रिय के अवगुणों को गिनती हूँ तो
तू गुण गिनती है, मैं गुण गिनती हूँ तो तू अवगुण गिनती है। सु क्यों० =
जिसका प्रिय वन में बसता है वह घर में कैसे बस सकेगी। मेरी = मेरी
( प्यारी )। उठि० = यदि उठकर चलती हूँ तो न जाने देने के लिए मचलने
लगती है। जो तेरे मन में है वह क्यों नहीं कहती ( कि मुझे प्रियतम से ले
चलकर मिला दे)।
कृष्ण को मिलैबो—( कबित्त )
(४५३) सिखै हारी सखी डरपाइ हारी कादंबिनी,
दामिनो दिखाइ हारी दिसि अधरात की ।
झुकि झुकि हारी रति मारि मारि हारयो मार,
हारी झकझोरति त्रिबिध गति बात की ।
११—राधिका-प्रिया । औगुननि-औगुन । गुनगन-गुनन गन । औगुन
के गन में -अगुन गनन में । केसौदास-केसौराइ । ऐसें-ऐसी । छनछबि-छन-
छवि । छनछवि०-छिनछवि छूटि छिपै जाइ घन मैं, छिन छूटि छवि छिपै छुटि
घन मैं । सु क्यों-कैसे । तें मचलि०-तहीं बैठि रहै । मेरी०-क्यों न कहै बीर,
क्यों न कहे प्यारी ।

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२४४ रसिकप्रिया
पाइिन लागत सोंधो चढ़ावत पान खवावतहीं निसि जागे ।
कान्ह चलौ उठि बैठे कहा ? मन मूसि परायो ब रूसन लागे ।८।
शब्दार्थ—भूषन-भेद = विविध प्रकार के गहने । बनाइकै = सजाकर ।
बागे = वस्त्र । राग = प्रेम । सोंधो = सुगंध । मूसि = चुराकर । रूसन लागे =
रूठने लगे ।
भावार्थ—उस समय का तो ध्यान कीजिए जब विविध प्रकार के गहनों,
पुष्पों और वस्त्रों से सजकर उसे आकृष्ट करने के लिए आया करते थे । भाग्य,
सोहाग और प्रेम को बढ़ाकर हृदय से उस पर अनुरक्त हुए । पैरों पड़ते, सुगंध-
द्रव्य लगाते और पान खिलाते हुए ही तुम रात रात भर जागते रह जाते
थे । अतः हे कृष्ण, उठकर चलिए । यहाँ क्या बैठे हैं, दूसरे का मन चुराकर
अब रूठने चले हैं ?
राधा को मिलैबो—( सवैया )
(४५०) दुर्लभ देवनिहूँ काँ सु तौ हरि को मन हाँसिन ही हरि लीनो ।
टारहु जैं हिय तें कबहुँ अब ज्यों गुरु को दियो मंत्र प्रबीनो ।
लेत लियो तौ न देत दियो अब मानहु ता दिन दुःख नवीनो ।
माँगन आवै तौ दीजै भटू अपनो मन, जौ वह जाइ न दीनो ।६।
शब्दार्थ—जैं = ( जिन ) मत । लेति० = लेते समय तो बड़े आनंद से
उसे ले लिया, पर अब वह दिया नहीं जाता, प्रत्युत देने में एक नया दुःख ही
खड़ा हो जाता है । अतः यदि माँगने आएँ तो श्रीकृष्ण को चाहे उनका मन
मत लौटाना पर अपना मन दे देना ।
सूचना—यह छंद सरदार की टीका में तो है, पर उन्होंने लिखा है—
‘यह कबित्त केशव को नाहीं तातें नारायण कवि नाहीं लिखो’ । हस्तलिखित
प्रतियों में भी यह छंद है । लीथोवाली प्रति में नहीं है । इसमें केशव की
छाप नहीं है ।
पुनः—( सवैया )
(४५१) आजु देवारि की राति जौ कीजै तौ आजु के द्योस लौं है है सभागी ।
बात सुनी जननी पै जबै तब ही मति मान की नींद सं जागी ।
अंग सिंगारि निहारि निसा तिन चित्तबिहारनि सों अनुरागी ।
दीप दै देवनि जाइ .... मिलि केसवराय सा खेलन लागो ।१०।
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.....-बागे । चढ़ावत-लगावत । निसि०-रसपागे । परायो ब-परायौ
सु । ६—मन-पु० । ही-इ । हरि-हठि । जें-जो । तौन देत०-तौन मानहु
सों मानिहौ तादिन । दुक्ख-दुस्ट । १०-पुनः-मध्य को मिलैबो । तौ-सु ।
जबै-जहीं । केसवराय-केसबदास ।

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त्रयोदश प्रभाव २४५
शब्दार्थ—आजु के० = यदि दीवाली की रात सानंद मनाई जाय तो
अगले वर्ष की दीवाली तक अच्छे दिन बीतते हैं। पै = से। मति० = बुद्धि
मान की निद्रा से जाग उठी, मान छोड़कर बुद्धि कल्याण-साधन में लगी।
चित्त-बिहार = मनोरंजन।
सूचना—इस छंद के विषय में भी सरदार लिखते हैं—'पूर्ववत् यह
भी ग्रन्थ को बनायो है। तातें नारायण कवि तिलक नाहीं लिख्यो।'
. राधिका को मिलैबो—( कबित्त )
(४५२) जौ हौं गनौँ औगुननि तौ तूँ गनै गुनगन,
जौ हौं गनौँ गुन तौ तूँ औगुन के गन में।
केसौदास ऐसैं प्रीति छिपावति छलन में,
जैसैं छनछबि छूटै छिपै जाइ घन में।
भारी है निठुर निसि भादों की भयावनी में,
सु क्यों बसै घर जाको पीउ बसै बन में।
बैठे तँ उठावै, उठि चले तँ मचलि रहै,
सोई मेरी क्यों न कहै जोई तेरे मन में।११।
शब्दार्थ—छनछबि = बिजली। ऐसैं० = तू अपनी प्रीति छल करके ऐसे
छिपाती है जैसे बिजली चमकती है, पर बादल में छिप जाती है। तेरे प्रेम
की केवल झलक मिलती है। जौ हौं० = मैं प्रिय के अवगुणों को गिनती हूँ तो
तू गुण गिनती है, मैं गुण गिनती हूँ तो तू अवगुण गिनती है। सु क्यों० =
जिसका प्रिय वन में बसता है वह घर में कैसे बस सकेगी। मेरी = मेरी
(प्यारी)। उठि० = यदि उठकर चलती हूँ तो न जाने देने के लिए मचलने
लगती है। जो तेरे मन में है वह क्यों नहीं कहती (कि मुझे प्रियतम से ले
चलकर मिला दे)।
कृष्णा को मिलैवो—( कबित्त )
(४५३) सिखै हारी सखी डरपाइ हारी कादंबिनी,
दामिनी दिखाइ हारी दिसि अधरात की।
झुकि झुकि हारी रति मारि मारि हारयो मार,
हारी झकझोरति त्रिबिध गति बात की।
११—राधिका-प्रिया। औगुननि-औगुन। गुनगन-गुनन गन। औगुन
के गन में-अवगुन गनन में। केसौदास-केसौराइ। ऐसैं-ऐसी। छनछबि-छन-
रुचि। छनछवि०-छिनछवि छूटि छिपै जाइ घन मैं, छिन छूटि छवि छिपै छुटि
घन मैं। सु क्यों-कैसे। तँ मचलि०-तहीं बैठि रहै। मेरी०-क्यों न कहै बीर,
क्यों न कहै प्यारी।

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२४६ रसिकप्रिया
दई निरदई दई याहि काहे ऐसी मति,
जारति जु रैनदिन दाह ऐसे गात की।
कैसेहूँ न मानै हौं मनाइ हारी केसौराय;
बोलि हारी कोकिला बुलाइ हारी चातकी।१२।
शब्दार्थ—कादंबिनी=मेघावली, बादलों की घटा । झुकि=क्रोध करके ।
बात =वायु ।
भावार्थ—सखियाँ उसे शिक्षा देकर हार मान बैठीं। मेघों की घटा
छाकर उसे डरवाकर हार गई। दिगंत में आधी रात के समय चमकनेवाली
बिजली अपनी दमक दिखाकर हार गई। रति कुपित हो होकर हार गई,
कामदेव अपनी मार मारकर थक गया। त्रिविध ( शीतल, मंद, सुगंध )
वायु की गति भी उसे झिंझोड़कर शांत हो बैठी। न जाने उस निर्दय दैव ने
उसे कैसी बुद्धि दी है कि वह रातदिन कोमल शरीर को ऐसी जलन से जला
रही है। यह तो किसी प्रकार भी मानती ही नहीं। कोयल बोलते बोलते चुप
हो गई। चातकी भी 'पी पी' करके उसे बुला न सकी। यहाँ तक कि उसकी
सखी होकर भी मैं मनाते मनाते ऊब गई, पर उसने न माना, न माना (अब
यदि आप चलकर मनाएँ तो कदाचित् मान जाय )।
राधिका को श्रृंगार—( सवैया )
(४५४) दीनो मैं पाइ झँवाइ महावर आँज्यो मैं आँजन आँखि सुहाई ।
भूषन भूषित कीने मैं केसव माल मनोहर मैं पहिराई ।
दर्पन लै अब दीपति देखि सखी, सब अंग सिँगारि सिधाई ।
बंक बिलोकनि, अंक लै पान खवावै को कान्ह-कुमार की नाई ।१३।
शब्दार्थ—दीनो मैं०=मैंने पैरों को झाँवें से रगड़कर महावर लगा दिया ।
आँज्यो=( आँखों ) में अंजन लगाया । आँज्यो मैं० = मैंने सुंदर आँखों में
अंजन भी लगा दिया । हू = भी । कर = हाथ में । देखि = देखो । सिधाई =
भोले भाले ढंग से ( मैंने )। बंक बिलोकनि० =अब तिरछी दृष्टि करके तुझे
गोद में लेकर श्रीकृष्ण की तरह भला पान कौन खिलाए (मुझ सीधी सादी से
तो वैसी मुद्रा हो नहीं सकती, तू उन्हीं के पास चल । वे ही तुझे इस प्रकार
से पान खिलाएँगे )।
कृष्ण को शृंगार—( सवैया )
(४५५) पाग बनी अरु बागो बन्यो पटुआ पटुका कटि राजत नीको ।
सोंधो बन्यो अति चारु चढ़ावत हार बन्यो उर भावतो जीको ।

१२—दिसि-निसि । झुकि झुकि-झकी झुकि । याहि-वाहि । र्काह-काहे ।
निरदई०-निरदई वाहि ऐसी कहि मति दई । दिन-ऐन । ऐसे-ऐसो । हौं-
ही । केसौराय-केसोदास । १३-आँज्यो-आँजो । मैं-हू, ही पै । अब-कर ।

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त्रयोदश प्रभाव २४७
बीरा बन्यो मुख खात मनोहर, मोहिं सिंगार लग्यो सब फीको।
भाल भली बिधि जौ लौं गुपाल कियो उहिं बाल बनाइ न टीको ।१४।
शब्दार्थ - पाग = पगड़ी । बनी = शोभित हुई। बागो = अँगरखा ।
पटुआ = दुपट्टा । पटुका = कमर में बाँधने का वस्त्र । सोंधो = सुगंध । बीरा =
पान का बीड़ा । वह बाल = राधिका ।
भावार्थ- (आपकी पगड़ी भी बनी है, अँगरखा भी छजता है, गले का
दुपट्टा भी ठीक बन गया, कमर में कसा हुआ पटका भला लगता है। ( चंदन
का लेप अंगराग आदि ) चढ़ाते समय सुगंध की व्यवस्था भी ठीक बन गई,
वक्षःस्थल पर मन को भानेवाला हार भी ठीक बन गया। पान का बीड़ा
मुँह में खाते समय खूब छजा, पर मुझे तो तब तक ये सब श्रृंगार फीके लगते
हैं जब तक उस नायिका ने आपके ललाट पर भली भाँति रचकर टीका नहीं
लगाया (चलिए उससे टीका लगवा आइए) ।
सूचना-हस्तलिखित प्रति में निम्नलिखित एक छंद और मिलता है-
मुग्धा को मिलैबो-( सवैया )
ऊजरु है यह गाउँ भदू मुँह कान्ह को नाउँ जु लीजत पैहै ।
जानै को मारी तू कौनहि का करी को है रे छैल छबीली जौ तैं है।
बात सँभारि कहौ सुनिहै कोउ आगि लगावों कोऊ जल दैहै।
कान्ह ही मारी तो बारी है बावरी तू उनको कैसे मारि सकै है।
राधा को झुकिवो-( कवित्त )
(४५६) फिरि फिरि फेरि फेरि फेरचो मैं हरी को मन,
मन फेरें फिरी पुनि भाग की भली घरी ।
पल पल पाइनि परति हुतो जनकें सु,
पारचो पीय तेरें पाइ पी के पाइ हौं परी।
बड़िनि की बेटिनि की बड़ीये बड़ाई मेटि,
केसौदास बड़ेन में जौ तूँ हौं बड़ो करी ।
हौं तौ जानी मनाएँ तें मेरो गुन मानिहै, मैं
ताहि क्यों मनाई तैं जु मोहीं सों मनी धरी ।१५।
१४-पटुआ-बटुआ । कटि राजत-कटरा कटि । चढ़ावत-मनोहर ।
भावतो-भावत । बीरा-बीरी। कियो-दियो । उहि-वह । १५-परति ०--परिहु
तिय । बड़िनि०-बड़ी बड़ी बधून । बड़ेन ०---बड़ेनहू में जो तू मैं । जानी-जान्यौ,
जानो । मनाएँ०-मन में तूं । मैं-हौं । मनाई० - मनाइहौं जो मोहूँ । मनी०-
भली करी ।

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२४८ रसिकप्रिया
शब्दार्थ -झुकिबौं = मान करना । हुती=थी । गुन मानिहै = एहसान
मानेगी, कृतज्ञ होगी। मनी = ( मन्यु ) अभिमान, गर्व । मोहीं सों मनी
धरी = मुझपे ही तूने अभिमान कर रखा है ।
भावार्थ-बारंबार फेरते फेरते मैंने किसी प्रकार श्रीकृष्ण का मन फेर
लिया, उनके मन के बदल जाने से भाग्य की भली घड़ी हुई (तेरा भाग्य
जागा ) ! क्षण क्षण पर जिनके पैरों पर तू पड़ा करती थी, उन्हें लाकर
तेरे पैरों पर गिराया, मैं स्वयम् उनके पैरों पर गिरी । बड़ी प्रतिष्ठित जाति
की बेटियों की बड़ी बड़ाई को हटाकर मैंने बड़ों में भी तुझे बड़ा बनाया ।
इतने उपकार के बाद मैं तो मन में यह समझती थी कि तू मेरा उपकार
मानेगी (पर तूने सब पर पानी फेर दिया) । अब मैं भला उसे किस प्रकार
मनाऊँ, जब इतना उपकार करने पर भी तू मुझी से अभिमान कर रही है।
पुनः-( सवैया )
(४५७) केसवराय बुलावंत हैं चित चारु बिलोचन नीचे करौ जू ।
कालि करै बर एक बिसौ परौं बीसबिसे ब्रत तें न टरौ जू ।
आगिलगै तेरे कालि के सीस, परौं पर जाइ बजागि परौ जू ।
आज मिलौ तौ मिलौ ब्रजराजहि नाहिं तौ नीके ह्वै राज करौ जू १६
शब्दार्थ-कालि करै=कल करे। बर = अच्छा । कालि करै० = यदि
कल ही कल उनसे मिलो तो अच्छा । एक बिसौ = थोड़ा ही निश्चय ।
परौं = परसो । बीसबिसे = बीसों बिस्वा, पूर्ण निश्चय । बजागि = बज्राग्नि,
भयंकर अग्नि ।
भावार्थ---(सखी कहती है कि ) श्रीकृष्ण बुला रहे हैं, चित्त को सुंदर
लगनेवाले नेत्रों को थोड़ा नीचे तो करो ( मेरी ओर तो देखो, क्रोध से नेत्रों
को चढ़ाए मत रहो ) एक बिस्वा अच्छा हो कि कल मिल लो, यदि कल
मिलने का पूरा निश्चय न हो तो परसों तो इस (मिलन) व्रत से एकदम
मत टलो (अवश्य मिलो)। (इस पर नायिका बिगड़कर कहती है) तेरे
कल के सिर में आग लगे और परसों में फूंका पड़े ( भयंकर आग लगे ) ।
(तब सखी कहती है) आज मिलना हो तो श्रीकृष्ण से मिल लो, नहीं तो
अपना राज रजो (फिर उनसे मिलने की आवश्यकता ही नहीं) ।
सूचना-यह छंद सरदार की टीका में है तो, पर इसका अर्थ यह कह-
कर छोड़ दिया गया है-'यह कवित्त भी प्राचीन पुस्तकन में नाहीं मिलत
तातें नारायण कबि अर्थ याको नाहीं लिख्यो ।' यह हस्तलिखित प्रतियों में
मिलता है, किंतु लीथोवाली प्रति में नहीं है।

१६- कैसवराय-केसवदास । बिलोचन-सुलोचन । नीचे करौ-चेतहु ।
करै-फलै । एक-बीस । टरौ-टरै । तेरे-तेरी । ह्वै-ह्वैं ।

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त्रयोदश प्रभाव २४६
कृष्ण को झुकिवो-( सवैया )
(४५८) तासो बसाइ कहा कहि केसव कामलता तरु तेंदु रई ।
बिधि की लिपि लोपो न जाइ जाइ अमोलिक लै मनि सीस भुजंग दई
अपनो मुख देखहु आरसी लै पुनि बात कहौ परमान-लई ।
वृषभान-सुता पर और सुहागिल बाउ कहाँ लगि जीभ गई । १७।
शब्दार्थ—तासों बसाइ कहा = उससे क्या वश चलता है ? कामलता =
कामदेव की लता ( राधिका) । तरु = वृक्ष। तेंदु = तेंदू। रई = अनुरक्त
हुई । मेटि न०= मिटाई नहीं जा सकती । अमोलिक = अमूल्य । भुजंग = सर्प;
उपपति (परकीया नायिकाओं से प्रेम करनेवाला) । दई=दी । परमान-लई=
प्रमाणयुक्त । सुहागिल = सौभाग्यवती, नायिका। बाउ कहाँ लगि जीभ गई =
भला जीभ कहाँ तक गई है, आप कैसी बढ़ बढ़कर बातें करने लगे हैं।
भावार्थ-इसमें क्या वश चल सकता है कि कामलता तेंदू के वृक्ष
(नीरस, श्रीकृष्ण) से प्रेम करती है। ब्रह्मा का लिखा मिटाया तो जा नहीं
सकता, देखो तो अमूल्य मणि ( मन ) लेकर भुजंग के सिर पर पटक दी
( तुम्हारे ऐसे लंपट को मन सौंप दिया)। हाथ में दर्पण लेकर अपना मुँह
तो देखो । बातें कहो तो प्रामाणिक कहो ( बेसिर पैर की बातें मत करो)।
भला वृषभानु की पुत्री राधिका की और अन्य सौभाग्यवती स्त्रियों की चर्चा
ही क्या, भला तुम्हारी जीभ कहाँ तक बढ़बढ़ गई है ( कि ऐसी बातें बकते
हो) । (नायक ने कदाचित् कह दिया है कि राधिका न मिलेंगी तो मुझे
क्या नायिकाओं का टोटा है, इसी पर सखी फटकार रही है)।
राधिका सों उराहनो-( कवित्त )
(४५६) केसौदास कौन बड़ो रूप, कुलकानि पै .
अनोखो एक तेरेहीं अनख उर ओलियै ।
आपनें सयान काहू मानसे न मानै तूं,
गुमान के बिमान बैठि व्योम व्योम डोलियै ।
ऐंड सों ऐंडाइ अति अंचल उड़ाइ ऐसी,
छाँडि ऐंड बैंड चितवनि निरमोलियै ।
दीनो मन हाथ जिनि हीरा सो हरषि कै,
ता हरि सों हरिननैनी हरेहूँ तो बोलियै । १८।
१७—तेंदु-तिंदु । लिपि-गति । लोपी-मेटी । अमोलिक-अलौषित, अलौ-
किक । पुनि-कर । बाउ०-बारौ जहाँ । १८-पै०-ही पै नोंखो । अनख-मनुप ।
काहू-कान्हू । बैठि-चढ़ी । ऐंडाइ-ऐंडति । उड़ाइ-उड़ात । जिनि-जिहि ।
कै ता-ऐसे । तौ-न ।

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२५० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—कानि=मर्यादा । अनख = रोष । श्रोलियै = घुस गया हैं,
उत्पन्न हो गया है । सयान = चतुराई । मानसै = मनुष्य को । ऐंड = गर्व ।
ऐंडाति = टेढ़ी मेढ़ी होती है । ऐंड बेंड = टेढ़ी मेढ़ी । निरमोलियै = निर्मूल्य,
अमूल्य । हरेहूँ = धीरे से भी ।
भावार्थ—तेरी कुल-मर्यादा क्या बड़ी है, केवल रूप पर ही तेरे हृदय
में ऐसा अनोखा रोष उत्पन्न हो गया है । अपने चातुर्य के सामने तू किसी
व्यक्ति को कुछ समझती ही नहीं । गुमान के विमान पर चढ़ी हुई आकाश ही
आकाश में उड़ी फिरती है (धरती पर तो पैर ही नहीं रखती) । गर्व से तू
टेढ़ी मेढ़ी हुई जा रही है, तेरा अंचल भी उड़ रहा है (उसके सँभालने की
भी चिंता नहीं, कुछ तो लज्जा कर !) । ऐसा बेतुका हठ छोड़, तू तो अत्यंत
अमूल्य दृष्टिवाली है । (कुछ तो विचार कर कि) हे हरिणनयनी, जिन
श्रीकृष्ण ने अपना हीरे सा (बहुमूल्य) मन प्रसन्नतापूर्वक तुझे दे डाला,
क्या उनसे धीरे से भी बोलना न चाहिए ।
कृष्ण को उराहनो-(कवित्त)
(४६०) सौंहनि को सोच न सकोच काहू बोच की को,
पोछौ प्यारे पीक-लीक लोचन किनारे की ।
माखन की चोरी की है थोरी थोरी मोहूँ सुधि,
जानति बिसेष वहै जोरी है जु बारे की ।
मेरियै कुमति और कहा कहौं केसौदास,
लागति है लाल लाज इहाँ पाइ धारे की ।
एती है मुठाई, वह अबहीं रुठाई, यह
छारहू तौ छूटी नाहिं पाइन के पारे की । १९।
शब्दार्थ—सोच = चिंता, परवा । सकोच = संकोच, लज्जा । बीच की
को = मध्यस्थ का । जोरी = जोड़ी । बारे की = लड़कपन की । पाइ धारे
की = यहाँ आने की । एतो है = इतनी अधिक । रुठाई = रुष्ट कर दिया ।
छारहू = धूल भी । पाइन के पारे की = पैरों पर पड़ने की ।
भावार्थ—आपको न तो शपथों की चिंता है और न बीच में पड़नेवाली
का ही संकोच है । भला नेत्रों के किनारे लगी हुई पान की पीक का चिह्न तो
पोछ डालिए । (दूसरी नायिका के यहाँ जाकर जो आपने चोरों की सी
करतूत की है यह नई बात नहीं है, लड़कपन से आप घर का मक्खन छोड़कर
१९—बिसेष०-बहै किसोरी । जोरी-मोरी । पाइ-पांव, पग । रुठाई-
रुढ़ाई । यह. वह । २०-के दुख-की दुख । पाइहै-पैहै मैं । जी की०-जीय
की तोहि ।

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त्रयोदश प्रभाव २५१

दूसरों के यहाँ) जो मक्खन की चोरी किया करते थे उसकी आपके साथ न
रहने पर भी मुझे थोड़ी थोड़ी सुध अब तक बनी हुई है और वह भी यह
बात जानती है, क्योंकि लड़कपन से वह आपके साथ ही रह रही है। मेरी
यह बुद्धि बुरी ही है (कि मैं आपको समझाने आती हूँ) और अधिक क्या
कहूँ, हे लाल, मुझे तो यहाँ पैर रखने में लज्जा जान पड़ती है। आप इतना
अधिक झूठ बोल रहे हैं और उसे अपनी करनी से अभी अभी रुष्ट भी कर
चुके हैं। देखिए अभी तक (नायिका के) पैरों पर गिरने के कारण (आपके
माथे में लगी) धूल भी नहीं छूटी है और फिर वैसी ही करनी करने लगे।
राधा-वचन सखी सों अपरंच-(सवैया)
(४६१) आँधी सी धाइ है, दाई दवारि सी, दासिन के दुख देह दही है।
ताप के तूल तँबोलिनि, मालिनि, नाइनि नाह के नेह नही है।
तेरी सौं तेरी सौं मेरी सखी सुनि तेरी अकेली की आस रही है।
कान्ह मिलाउ कि मोहिं न पाइहै आपने जी की मैं तोसों कही है। २०
शब्दार्थ-आँधी सी = आँधी की भाँति कष्टप्रद । धाइ = धात्री, धाय।
दाइ = दाई । दवारि सी = दावाग्नि की भाँति कष्ट देनेवाली । दही है =
(मेरी देह) जल रही है। तूल = (तुल्य) समान। नाह = नाथ, प्रिय ।
नही है = जुड़ी हुई है, संलग्न है (प्रिय से प्रेम कर लिया है) सौं = शपथ ।
सुनि = सुनो। तेरी अकेली = केवल एक तेरी ही। मोहिं नं० = मुझे न
पाएगी (मैं मर जाऊँगी)।
सूचना-यह छंद सरदार की टीका और हस्तलिखित प्रतियों में तो है,
पर लीथोवाली प्रति में नहीं है। इसमें केशव की छाप भी नहीं है।
(दोहा)
(४६२) इहि बिधि स्याम-सिंगार-रस, बहु बिधि बरनो लोइ ।
चारि बरन चहुँ आश्रमनि, कहत सुनत सुख होइ ।२१।
शब्दार्थ-बहु बिधि बरनो लोइ = लोगों ने बहुत प्रकार से वर्णन
किया है।
(४६३) राधा राधा-रमन के करयो सिंगार सुबेष ।
रस आदिक आगे कहौं, और रसनि को भेष ।२२।
शब्दार्थ-करचो = वर्णन किया है। भेष = स्वरूप ।
सूचना-यह छंद केवल सरदार की टीका में मिलता है।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां सखीजनकर्मवर्णनं
नाम त्रयोदशः प्रभावः ।१३।
२१-रस-सब। लोइ-सोइ ।

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चतुर्दश प्रभाव
अथ हास्यरस-लक्षणम्-- (दोहा)
(४६४) नयन नयन कछु करत जब, मन को मोद उदोत ।
चतुर चित्त पहिचानिये, तहाँ हास्यरस होत । १ ।
भावार्थ- नेत्रों (चेष्टाओं) और वचनों को कुछ का कुछ करने से जहाँ
मन में प्रसन्नता का उदय हो वहाँ हास्यरस होता है।
हास्यरस के भेद-- (दोहा)
(४६५) मंदहास कलहास पुनि, कहि केसव अतिहास ।
कोबिद कबि बरनत सबै, अरु चौथो परिहास । २ ।
मंदहास-लक्षण-- (दोहा)
(४६६) बिगसहिं नयन, कपोल कछु, दसन, दसन के बास ।
मंदहास तासों कहत, कोबिद केसौदास । ३ ।
शब्दार्थ--बिगसहि = थोड़े खुले हों। दसन के बास = दाँतों का आव-
रण, होंठ ।
भावार्थ- जहाँ नेत्र, कपोल, दाँत और होंठ (हँसने में) थोड़े थोड़े
खुल जायें वहाँ मंदहास होता है ।
(४६७) बरनत बाढ़े ग्रंथ बहु, कहे न केसवदास ।
औरौ रस यों जानियो, सबै प्रछन्न प्रकास । ४ ।
शब्दार्थ-औरौ रस० - अन्य रसों के संबंध में भी यही समझना
चाहिए अर्थात् शृंगार के अतिरिक्त अन्य सभी रसों का विस्तार-भय से संक्षेप
में ही निरूपण किया गया है। सबमें प्रच्छन्न० = सबमें प्रच्छन्न और प्रकाश
भेद होते हैं ।
सूचना- यह दोहा केवल हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
राधिका को मंदहास, यथा-- (सवैया)
(४६८) भेद की बात सुने तें कछू वह मासक तें मुसुक्यान लगी है ।
बैठति है तिनमैं हठिकै जिनको तुमसों मति प्रेमपगी है ।
१-कछु-ये, जब-जहँ, कछु । मन-जन । पहिचानिये-पहिचानिजौ ।
२-बरनत-बरनी । ३-बिगसहि-बिकसहि । दसन के-बसन के । कहत-
कहै । ४-बहु-जिंहि । कहे न-जेहि कहि, जेहि कबि ।