रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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शब्दार्थ—आजु के० = यदि दीवाली की रात सानंद मनाई जाय तो
अगले वर्ष की दीवाली तक अच्छे दिन बीतते हैं। पै = से। मति० = बुद्धि
मान की निद्रा से जाग उठी, मान छोड़कर बुद्धि कल्याण-साधन में लगी।
चित्त-बिहार = मनोरंजन।
सूचना—इस छंद के विषय में भी सरदार लिखते हैं—'पूर्ववत् यह
भी ग्रन्थ को बनायो है। तातें नारायण कवि तिलक नाहीं लिख्यो।'
. राधिका को मिलैबो—( कबित्त )
(४५२) जौ हौं गनौँ औगुननि तौ तूँ गनै गुनगन,
जौ हौं गनौँ गुन तौ तूँ औगुन के गन में।
केसौदास ऐसैं प्रीति छिपावति छलन में,
जैसैं छनछबि छूटै छिपै जाइ घन में।
भारी है निठुर निसि भादों की भयावनी में,
सु क्यों बसै घर जाको पीउ बसै बन में।
बैठे तँ उठावै, उठि चले तँ मचलि रहै,
सोई मेरी क्यों न कहै जोई तेरे मन में।११।
शब्दार्थ—छनछबि = बिजली। ऐसैं० = तू अपनी प्रीति छल करके ऐसे
छिपाती है जैसे बिजली चमकती है, पर बादल में छिप जाती है। तेरे प्रेम
की केवल झलक मिलती है। जौ हौं० = मैं प्रिय के अवगुणों को गिनती हूँ तो
तू गुण गिनती है, मैं गुण गिनती हूँ तो तू अवगुण गिनती है। सु क्यों० =
जिसका प्रिय वन में बसता है वह घर में कैसे बस सकेगी। मेरी = मेरी
(प्यारी)। उठि० = यदि उठकर चलती हूँ तो न जाने देने के लिए मचलने
लगती है। जो तेरे मन में है वह क्यों नहीं कहती (कि मुझे प्रियतम से ले
चलकर मिला दे)।
कृष्णा को मिलैवो—( कबित्त )
(४५३) सिखै हारी सखी डरपाइ हारी कादंबिनी,
दामिनी दिखाइ हारी दिसि अधरात की।
झुकि झुकि हारी रति मारि मारि हारयो मार,
हारी झकझोरति त्रिबिध गति बात की।
११—राधिका-प्रिया। औगुननि-औगुन। गुनगन-गुनन गन। औगुन
के गन में-अवगुन गनन में। केसौदास-केसौराइ। ऐसैं-ऐसी। छनछबि-छन-
रुचि। छनछवि०-छिनछवि छूटि छिपै जाइ घन मैं, छिन छूटि छवि छिपै छुटि
घन मैं। सु क्यों-कैसे। तँ मचलि०-तहीं बैठि रहै। मेरी०-क्यों न कहै बीर,
क्यों न कहै प्यारी।