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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

DevanagariHindipublished286 pages

Page 241 of 286

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Page 241

२४४ रसिकप्रिया
पाइिन लागत सोंधो चढ़ावत पान खवावतहीं निसि जागे ।
कान्ह चलौ उठि बैठे कहा ? मन मूसि परायो ब रूसन लागे ।८।
शब्दार्थ—भूषन-भेद = विविध प्रकार के गहने । बनाइकै = सजाकर ।
बागे = वस्त्र । राग = प्रेम । सोंधो = सुगंध । मूसि = चुराकर । रूसन लागे =
रूठने लगे ।
भावार्थ—उस समय का तो ध्यान कीजिए जब विविध प्रकार के गहनों,
पुष्पों और वस्त्रों से सजकर उसे आकृष्ट करने के लिए आया करते थे । भाग्य,
सोहाग और प्रेम को बढ़ाकर हृदय से उस पर अनुरक्त हुए । पैरों पड़ते, सुगंध-
द्रव्य लगाते और पान खिलाते हुए ही तुम रात रात भर जागते रह जाते
थे । अतः हे कृष्ण, उठकर चलिए । यहाँ क्या बैठे हैं, दूसरे का मन चुराकर
अब रूठने चले हैं ?
राधा को मिलैबो—( सवैया )
(४५०) दुर्लभ देवनिहूँ काँ सु तौ हरि को मन हाँसिन ही हरि लीनो ।
टारहु जैं हिय तें कबहुँ अब ज्यों गुरु को दियो मंत्र प्रबीनो ।
लेत लियो तौ न देत दियो अब मानहु ता दिन दुःख नवीनो ।
माँगन आवै तौ दीजै भटू अपनो मन, जौ वह जाइ न दीनो ।६।
शब्दार्थ—जैं = ( जिन ) मत । लेति० = लेते समय तो बड़े आनंद से
उसे ले लिया, पर अब वह दिया नहीं जाता, प्रत्युत देने में एक नया दुःख ही
खड़ा हो जाता है । अतः यदि माँगने आएँ तो श्रीकृष्ण को चाहे उनका मन
मत लौटाना पर अपना मन दे देना ।
सूचना—यह छंद सरदार की टीका में तो है, पर उन्होंने लिखा है—
‘यह कबित्त केशव को नाहीं तातें नारायण कवि नाहीं लिखो’ । हस्तलिखित
प्रतियों में भी यह छंद है । लीथोवाली प्रति में नहीं है । इसमें केशव की
छाप नहीं है ।
पुनः—( सवैया )
(४५१) आजु देवारि की राति जौ कीजै तौ आजु के द्योस लौं है है सभागी ।
बात सुनी जननी पै जबै तब ही मति मान की नींद सं जागी ।
अंग सिंगारि निहारि निसा तिन चित्तबिहारनि सों अनुरागी ।
दीप दै देवनि जाइ .... मिलि केसवराय सा खेलन लागो ।१०।
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.....-बागे । चढ़ावत-लगावत । निसि०-रसपागे । परायो ब-परायौ
सु । ६—मन-पु० । ही-इ । हरि-हठि । जें-जो । तौन देत०-तौन मानहु
सों मानिहौ तादिन । दुक्ख-दुस्ट । १०-पुनः-मध्य को मिलैबो । तौ-सु ।
जबै-जहीं । केसवराय-केसबदास ।