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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

DevanagariHindipublished286 pages

Page 244 of 286

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Page 244

त्रयोदश प्रभाव २४७
बीरा बन्यो मुख खात मनोहर, मोहिं सिंगार लग्यो सब फीको।
भाल भली बिधि जौ लौं गुपाल कियो उहिं बाल बनाइ न टीको ।१४।
शब्दार्थ - पाग = पगड़ी । बनी = शोभित हुई। बागो = अँगरखा ।
पटुआ = दुपट्टा । पटुका = कमर में बाँधने का वस्त्र । सोंधो = सुगंध । बीरा =
पान का बीड़ा । वह बाल = राधिका ।
भावार्थ- (आपकी पगड़ी भी बनी है, अँगरखा भी छजता है, गले का
दुपट्टा भी ठीक बन गया, कमर में कसा हुआ पटका भला लगता है। ( चंदन
का लेप अंगराग आदि ) चढ़ाते समय सुगंध की व्यवस्था भी ठीक बन गई,
वक्षःस्थल पर मन को भानेवाला हार भी ठीक बन गया। पान का बीड़ा
मुँह में खाते समय खूब छजा, पर मुझे तो तब तक ये सब श्रृंगार फीके लगते
हैं जब तक उस नायिका ने आपके ललाट पर भली भाँति रचकर टीका नहीं
लगाया (चलिए उससे टीका लगवा आइए) ।
सूचना-हस्तलिखित प्रति में निम्नलिखित एक छंद और मिलता है-
मुग्धा को मिलैबो-( सवैया )
ऊजरु है यह गाउँ भदू मुँह कान्ह को नाउँ जु लीजत पैहै ।
जानै को मारी तू कौनहि का करी को है रे छैल छबीली जौ तैं है।
बात सँभारि कहौ सुनिहै कोउ आगि लगावों कोऊ जल दैहै।
कान्ह ही मारी तो बारी है बावरी तू उनको कैसे मारि सकै है।
राधा को झुकिवो-( कवित्त )
(४५६) फिरि फिरि फेरि फेरि फेरचो मैं हरी को मन,
मन फेरें फिरी पुनि भाग की भली घरी ।
पल पल पाइनि परति हुतो जनकें सु,
पारचो पीय तेरें पाइ पी के पाइ हौं परी।
बड़िनि की बेटिनि की बड़ीये बड़ाई मेटि,
केसौदास बड़ेन में जौ तूँ हौं बड़ो करी ।
हौं तौ जानी मनाएँ तें मेरो गुन मानिहै, मैं
ताहि क्यों मनाई तैं जु मोहीं सों मनी धरी ।१५।
१४-पटुआ-बटुआ । कटि राजत-कटरा कटि । चढ़ावत-मनोहर ।
भावतो-भावत । बीरा-बीरी। कियो-दियो । उहि-वह । १५-परति ०--परिहु
तिय । बड़िनि०-बड़ी बड़ी बधून । बड़ेन ०---बड़ेनहू में जो तू मैं । जानी-जान्यौ,
जानो । मनाएँ०-मन में तूं । मैं-हौं । मनाई० - मनाइहौं जो मोहूँ । मनी०-
भली करी ।