रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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Read in context१६ त्रयोदश प्रभाव २४१
केसव कपूर पूरि काहे कौ खवाचौ पान,
जौ पै मन मगन है ऐसे ही बिलास में ।
वाहि न मनावौ हरि हाहा करि पाइ परि,
सब ही सुबास बसै जाके मुखबास में ।३।
शब्दार्थ—कुंकुम = केसर । उबटि = मलकर । सोंधो सिर लाइ = सिर में
सुगंध लगाकर । आँजि माँजि = अंजन लगाकर साफ सुथरी करके, श्रृंगार
करके । प्रकास में = सबके समक्ष । पूरि = डालकर । बिलास = आनंद ।
वाहि = उसे ( अन्य नायिका को ) ।
भावार्थ—केसर का उबटन लगाकर और केसर के ही जल से स्नान
कराके सिर में सुगंध लगाकर इसे रास में क्यों ले आए हो ? चंदन चढ़ाकर
और फूलमाला पहनाकर, भूल करके बिना किसी मतलब के इसे सँवार-सिंगार
कर प्रकाश में किया है ( सबके सामने लाए हो)। पान में कपूर डालकर उसे
क्यों खिलाते हो, यदि आपका मन ऐसे ही विलास में मग्न है तो आप जाकर
और पैरों पड़कर विनय करके उसे क्यों नहीं मनाते जिसके मुख की सुगंध में
सब प्रकार की सुगंध मिलती है । ( व्यंग्य यह है कि तुम दिखाने को तो आप
अपनी नायिका लेकर आए हो, पर तुम्हारी दृष्टि में कोई और स्त्री है, उसे
ही जाकर सँवारिए सिंगारिए ) ।
राधा सों विनय—( सवैया )
(४४५) ऐसेंही क्यों चुप ह्वै रहिहौं सखि हौं सहिहौं सतराहट सौ लौं ।
क्यों सरिहै मिलिबे बिन तोहि तऊ मिलियै मिलियै दिन जौ लौं ।
केसव कोरि करौ उपचार मिलै को कहा मिलिहै सुख तौ लौं ।
देखि धौं अंगनि आरसी लै मिलिहै पिय सों मन ही मन कौ लौं ।४।
शब्दार्थ—सतराहट = झिड़की । सौ लौं = सौ तक (अनेक) । सरिहै =
( काम ) चलेगा । मिलियै दिन जौ लौं = जब तक मिलने का दिन मिले ।
उपचार = उपाय ।
भावार्थ—मैं इस प्रकार कैसे चुप रहूँगी । मैं तो तेरी सैकड़ों तक
झिड़कियाँ सहूँगी और वही बारवार कहूँगी ) । बिना मिले तेरा काम कैसे
चलेगा । तब तक मिलते रहना चाहिए जब तक मिलने का दिन ( मौका )
३—कुँकुव०-कुंकुम जवादिसेंद । कुमकुमा०-कुमकुमा के नहवाइ, कुंकु-
मान अन्हवाइ । फूलमाल-फूलि फूल, फूले फूल, पुनि फूल । आँजि-आज । जौ
पै०-मन जो मगन है जू । ऐसेंही-ऐसोई, वेसेई । ४—हौं सहिहौं=होत कहा ।
तऊ०-तऊ मिलिहै । देखि०-देखियै । मिलिहै-मिलिहौ ।