रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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पीला पड़ गया, है पर आपके मुख पर आंच भी नहीं—ऐसी नागरी से आप
कैसे बुरे ढंग से प्रेम को निबाह रहे हैं ! ) ।
अलंकार—व्याजर्निंदा ।
पटइनि को वचन राधिका सों, यथा—( सवैया )
(४३८) याही कों मेरी गुसाइँनि मैं मिलई पहिलेँ बतियाँ छलि छैलो ।
बातैं मिलै अँखियाँ मिलई सखियान की आँखिनि पारि कै ऐलो ।
आँखि मिले मुँह लागि रहै मन लेहु मिलै ब गहैं हम गैलो ।
मिले मन माई कहा करिहौ मुहुँ ही के मिलैं तौ कियो मन मैलो ।२७।
शब्दार्थ—याही को = इसीलिए। छलि छैलो = छैल ( नायक ), को
छलकर । बातैं मिलै = बात हो जाने पर । अँखियाँ मिलई = साक्षात्कार
कराया । पारिकै = डालकर । ऐलों = धूल । मुँह लागि रहै = मुँह मिला,
बातें करने का अवसर मिला । मन लेहु मिलै ब = अब उनके मन मिला न
लो । गहैं हम गैलो = हम अपनी गली पकड़ें । माई = हे सखी ।
भावार्थ—क्या इसी अवसर के लिए मैंने वे सब बातें की थीं ? मैंने
नायक को छलकर तुम्हारी बातें मिलाईं ( बातचीत पक्की की ) । बातें मिल
जाने पर सखियों की आँखों में धूल डालकर आँखें मिलाईं ( साक्षात्कार
कराया ) । आँखें मिलने पर मुँह मिला ( बातचीत का अवसर मिला ) ।
अच्छा अब मन भी मिला लो, हम अपने रास्ते जाएँ। जब तुमने मुँह के
मिलने पर ही मन इतना मैला कर लिया तब मन के मिल जाने पर न जाने
क्या करोगी ( जिसने इतना उपकार किया उसके साथ यह व्यवहार ! ) ।
सूचना—( १ ) मानमोचन कराना चाहती है ।
( २ ) 'मिलाने' का तारतम्य होने से पटइन भासित होती है ।
पुनः—( सवैया )
(४३६) गेह को नेह की देह की दीबें की भूषन की जिन भूख भगाई ।
मोहिं हँसी-दुख दोऊ दई तिनहीं सों जनावति है चतुराई ।
केसवदास बड़ाई दई तौ कहा भयो जाति-सुभाव न जाई ।
सोने सिंगारहु सोंधे चढ़ावहु पीतर की पिवराई न जाई ।२८।
शब्दार्थ—दीबे की = देने की, धन दे सकने की शक्ति । भूषन = आभू-
षण । हंसी = आनंद । दई = हे दैव । सोंधे = सुगंध ।
२७—लागि०-सों मिलिहै । लेहु-नेहु । मिले०-माई मिले मन का ।
तौ-तें, जो । २८—की-के । की-के । की-के । दीबे-दीखै । को-कें । भगाई-
भराई । केसवदास-केसवराइ । तो-सो । जाति-जान । चढ़ावहु-बिमायन ।