रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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सूधे साधु सुद्ध वे तौ कुटिल प्रसिद्ध ये तौ,
केसव मरम-चोर परम किरात हैं।
पाइहैं पकरि तब पाइहै न कैसैंहू तूँ,
थोरो इठलाति ये तौ अति इठलात हैं।
बरजति क्यों न तो सों कब की कहति, मेरे
मोहन के मनै तेरे नैन छूवै छूवै जात हैं ।२३।
शब्दार्थ—अमल = स्वच्छ । तिक्ष = तीक्ष्ण । चल = चंचल । नलिन =
कमल । पात = पत्र, दल । सूधे = सीधे । साधु = सज्जन । सुद्ध = पवित्र ।
किरात = भील, दुर्जन ।
भावार्थ—( श्रीकृष्ण के मन की शुद्धता और राधिका के नेत्रों की अस्पृ-
श्यता का वर्णन है ) श्रीकृष्ण का मन तो कमल की तरह कोमल और स्वच्छ
है, पर ये तेरे नेत्र तीक्ष्ण, चंचल, मलिन और नए नीले कमल के पत्र के ऐसे
हैं । वे (श्रीकृष्ण मन से) तो सीधे, सज्जन और पवित्र हैं और ये कुटिल, मर्म
(चित्त) को चुरानेवाले एवम् निरे किरात ( अत्यंत अपवित्र, दुष्ट ) हैं। पर
जब वे इसे पकड़ लेंगे ( तेरे नेत्र उनके मन में धँस जाएँगे ) तब तू इन्हें किसी
प्रकार पा न सकेगी ( फिर वहाँ से निकलेंगे नहीं ) तू तो थोड़ा इठलाती है,
पर ये तेरे ये नेत्र अधिक इठला रहे हैं। मैं न जाने कब से तुझे मना कर रही
हूँ (पर मना करने पर भी) तेरे ये (कुटिल सिरचढ़े) नेत्र मेरे मोहन के मन
को बार बार छू छू जाते हैं ( तूने नेत्र तो लगाना आरंभ कर दिया, पर ये
लगने पर फिर वश में न रह जाएँगे ।
रामजनी को वचन कृष्ण सों, यथा--( सवैया )
(४३५) कौनहूँ तोष कहा भयो केसव कामिनि कोटिक सों हित ठाटैं ।
रंच न साध सधै सुख की बिनराधिकै अधिक लोचन डाटैं ।
क्यों खरी सीतल बास करै मुख जौ भखियै घनसार के साटैं ।
लालच हाथ रहै ब्रजनाथ पै प्यास बुझाइ न ओस के चाटैं ।२४।
शब्दार्थ—तोष = तृप्ति । हित = प्रेम । ठाटें = करने से । रंच = किंचित्
भी । साध = इच्छा । सधै = पूरी हो । अधिक = आधे । डाटें = देखने से ।
खरी = खड़िया । घनसार = कपूर । साटें = बदले में ।
भावार्थ—क्या करोड़ों कामिनियों से प्रेम का ठाट ठटने से आपकी कोई
२३-अमल-श्रमल । प्रसिद्ध-करम । मरम-परम । मरम-चोर-चितचोर।
इठलाति-इतराति । तो सों-तू ही । मनै-नैन । २४—रंचन-रंचक । सधै-
सुधै । जो०-जो रे भक्षी ।