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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

DevanagariHindipublished286 pages

Page 232 of 286

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Page 232

द्वादश प्रभाव २३७
सूचना—'नजर' लगने और दृष्टि लगने ( प्रेम करने ) की एक सी ही
अवस्था मानी गई है ।
संन्यासिनि को वचन कृष्ण सों, यथा—( कबित्त )
(४३७) सीतलहू हीतल तिहारें न बसति वह,
तुम न तजत तिल ताको उर ताप-गेहु ।
आपनो ज्यौ हीरा सो पराएँ हाथ ब्रजनाथ,
दैहै तौ अकाथ हाथ मैन ऐसो मन लेहु ।
एते पर केसोदास तुम्हैं न प्रवाह वाहि,
वहै जक लागी भागी भूख सुख भूल्यो देहु ।
माड़ौ मुख छाड़ौ छिन छल न छबीले लाल,
ऐसी तौ गँवारिन सों तुमहूँ निबाहौ नेहु ।२६।
शब्दार्थ—हीतल = हृदय । तिल = थोड़ा भी । ताप गेहु = ताप का
घर, उत्तप्त । ज्यौ = जी, चित्त । अकाथ = व्यर्थ । मैन = मोम । प्रवाह =
(परवाह) चिंता । वाहि = उसे । जक = रट, धुन । माड़ौ = केसर आदि
से सुशोभित करते हो ।
भावार्थ—छबीले लाल, तुम भी कैसी गँवारिन से प्रेम का निर्वाह कर
रहे हो । वह तो तुम्हारे शीतल हृदय में बसती नहीं और तुम उसके उत्तप्त
हृदय को क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़ते (कितना कष्ट सहते हो)।
(आप ऐसे उदार हैं कि) अपना हीरे के ऐसा (मूल्यवान्) मन दूसरे के
हाथ देकर व्यर्थ ही उसका मोम के ऐसा (तुच्छ) मन लिये हुए हैं। इतने
पर भी आपको तो अपने मन की परवा नहीं, पर उसे अपने मन की धुन
लगी है। उसी धुन में उसकी भूख भाग गई है, देह की सुध नहीं, सुख
भूला हुआ है। फिर भी तुम (केसर से) उसका मुख सुशोभित करते हो
और वह क्षण भर के लिए छल नहीं छोड़ती। (व्यंग्य यह है कि आपका
हृदय उसके वियोग से उत्तप्त नहीं, उसे आप भूले हुए हैं, पर वह विरह से
जलती हुई भी क्षण भर के लिए आपको नहीं भुलाती । आपने अपना हीरे
सा कठोर मन दूसरों को सौंप दिया है और उसका मोम सा कोमल हृदय
आपके वश में है। आपको तो अपनी कोई चिंता नहीं • पर वह अपने मन
की बराबर चिंता करती है, इसी मन की दुर्दशा में भूख मारी गई है, देह
की सुधबुध नहीं रह गई है। आपके वियोग में उसका मुँह केसर की तरह
२६—तजत-तजहु । आपनो-आपने । ज्यो-जो । सो-को । अकाथ हाथ-
अकाथ साथ । मैन०-माखन सो । केसोदास-केसोराइ । देहु-गेहु : माड़ौ०-
मांजौ मुख छाड़ौ ।