रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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मिलता जाय । इस प्रकार चाहे करोड़ों उपाय करो, पर मिलने का सुख तब
तक मिल ही नहीं सकता ( जब तक मिला न जाय ) । थोड़ा दर्पण लेकर
अपने अंगों को तो देख ले ( दुबली होती जा रही है ) । इस प्रकार प्रिय से
मन ही मन कब तक मिलती रहेगी ?
कृष्ण सों विनय—( कबित्त )
(४४६) कंज कैसे फूले नैन दारचौं से दसन ऐन,
बिंब से अधर, हास सुधा सो सुधारचो है ।
बेनी पिकबैनी की त्रिबेनी सी बनाइ गुही,
बार कै सेवार करिहाँ कों करि हारचो है ।
कीने कुच अमल कलपतरु के से फल,
केसौदास यातें बिधि मुगध बिचारचो है ।
देखौ न गुपाल सखी मेरी को सरीर सब,
सोने सों सँवारि सब सोंधे सों सँवारचो है ।५।
शब्दार्थ—दा०यों = (दाड़िम) अनार । ऐन = ठीक । बिंब = बिंबाफल,
कूँदरू । सुधारचो = बनाया हुआ ( आनंददायक ) । बेनी = वेणी, चोटी ।
पिकबैनी = कोयल के से कंठ ( वाणी ) वाली । कै = करके ।
भावार्थ—उसके नेत्र कमल के से हैं, दाँत ठीक अनार ( के दाने ) की
भाँति हैं, ओठ बिंबाफल से हैं और हँसी अमृत के समान आनंददायक है ।
उस कोकिल के से कंठ वाली की चोटी त्रिवेणी ( गंगा, यमुना, सरस्वती के
संगम ) की भाँति, केश सेवार के से करके ब्रह्मा कमर बनाते बनाते अंत.में
हार ही बैठा । उसने कल्पवृक्ष के सुंदर फलों के से उसके कुच बनाए हैं,
इसलिए ब्रह्मा ( अपनी ) उस सृष्टि पर स्वयम् मुग्ध है । इसलिए हे गोपाल
आप मेरी सखी का शरीर देखिए न ! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि वह
(शरीर) सोने से बनाया गया है और सुगंध से सँवारा गया है (सोने में सुगंध
नहीं होती, पर उसका शरीर देखकर ऐसा जान पड़ता है कि सोना और सुगंध
दोनों एकत्र हैं ) ।
राधा को मनाइबो—( सवैया )
(४४७) 'नाहीं'सिखौबति नाहीं भली सखि पावक सों तिनको मुँह डाहौ ।
भौंहनि के भुलबौ भद्दू भावनि नैननि के मत सों हित बाढ़ौ ।
५—कंज-मुख । बिंब-लाल । गुही-बीर । बार० बार सी बारीक, धार
सो बारीक, बार ज्यों सिवार । अमल०-अमल धमलका के फल के से । सब
सोंधे-मनौं मैन, मनु सैन, मानो मैन । सँवारचो-सुधारचो ।