रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
DevanagariHindipublished286 pages
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२४६ रसिकप्रिया
दई निरदई दई याहि काहे ऐसी मति,
जारति जु रैनदिन दाह ऐसे गात की।
कैसेहूँ न मानै हौं मनाइ हारी केसौराय;
बोलि हारी कोकिला बुलाइ हारी चातकी।१२।
शब्दार्थ—कादंबिनी=मेघावली, बादलों की घटा । झुकि=क्रोध करके ।
बात =वायु ।
भावार्थ—सखियाँ उसे शिक्षा देकर हार मान बैठीं। मेघों की घटा
छाकर उसे डरवाकर हार गई। दिगंत में आधी रात के समय चमकनेवाली
बिजली अपनी दमक दिखाकर हार गई। रति कुपित हो होकर हार गई,
कामदेव अपनी मार मारकर थक गया। त्रिविध ( शीतल, मंद, सुगंध )
वायु की गति भी उसे झिंझोड़कर शांत हो बैठी। न जाने उस निर्दय दैव ने
उसे कैसी बुद्धि दी है कि वह रातदिन कोमल शरीर को ऐसी जलन से जला
रही है। यह तो किसी प्रकार भी मानती ही नहीं। कोयल बोलते बोलते चुप
हो गई। चातकी भी 'पी पी' करके उसे बुला न सकी। यहाँ तक कि उसकी
सखी होकर भी मैं मनाते मनाते ऊब गई, पर उसने न माना, न माना (अब
यदि आप चलकर मनाएँ तो कदाचित् मान जाय )।
राधिका को श्रृंगार—( सवैया )
(४५४) दीनो मैं पाइ झँवाइ महावर आँज्यो मैं आँजन आँखि सुहाई ।
भूषन भूषित कीने मैं केसव माल मनोहर मैं पहिराई ।
दर्पन लै अब दीपति देखि सखी, सब अंग सिँगारि सिधाई ।
बंक बिलोकनि, अंक लै पान खवावै को कान्ह-कुमार की नाई ।१३।
शब्दार्थ—दीनो मैं०=मैंने पैरों को झाँवें से रगड़कर महावर लगा दिया ।
आँज्यो=( आँखों ) में अंजन लगाया । आँज्यो मैं० = मैंने सुंदर आँखों में
अंजन भी लगा दिया । हू = भी । कर = हाथ में । देखि = देखो । सिधाई =
भोले भाले ढंग से ( मैंने )। बंक बिलोकनि० =अब तिरछी दृष्टि करके तुझे
गोद में लेकर श्रीकृष्ण की तरह भला पान कौन खिलाए (मुझ सीधी सादी से
तो वैसी मुद्रा हो नहीं सकती, तू उन्हीं के पास चल । वे ही तुझे इस प्रकार
से पान खिलाएँगे )।
कृष्ण को शृंगार—( सवैया )
(४५५) पाग बनी अरु बागो बन्यो पटुआ पटुका कटि राजत नीको ।
सोंधो बन्यो अति चारु चढ़ावत हार बन्यो उर भावतो जीको ।
१२—दिसि-निसि । झुकि झुकि-झकी झुकि । याहि-वाहि । र्काह-काहे ।
निरदई०-निरदई वाहि ऐसी कहि मति दई । दिन-ऐन । ऐसे-ऐसो । हौं-
ही । केसौराय-केसोदास । १३-आँज्यो-आँजो । मैं-हू, ही पै । अब-कर ।