रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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पाइनि लागत सोंधो चढ़ावत पान खवावतहीं निसि जागे।
कान्ह चलौ उठि बैठे कहा ? मन मूसि परायो ब रूसन लागे ।८।
शब्दार्थ—भूषन-भेद = विविध प्रकार के गहने । बनाइकै = सजाकर ।
बागे = वस्त्र । राग = प्रेम । सोंधो = सुगंध । मूसि = चुराकर । रूसन लागे =
रूठने लगे ।
भावार्थ—उस समय का तो ध्यान कीजिए जब विविध प्रकार के गहनों,
पुष्पों और वस्त्रों से सजकर उसे आकृष्ट करने के लिए आया करते थे । भाग्य,
सोहाग और प्रेम को बढ़ाकर हृदय से उस पर अनुरक्त हुए । पैरों पड़ते, सुगंध-
द्रव्य लगाते और पान खिलाते हुए ही तुम रात रात भर जागते रह जाते
थे । अतः हे कृष्ण, उठकर चलिए । यहाँ क्या बैठे हैं, दूसरे का मन चुराकर
अब रूठने चले हैं ?
· राधा को मिलैबो—( सवैया )
(४५०) दुर्लभ देवनिहूँ कौं सु तौ हरि को मन हाँसिन ही हरि लीनौ ।
टारहु जैं हिय तैं कबहुँ अब ज्यों गुरु को दियो मंत्र प्रबीनौ ।
लेत लियो तौ न देत दियो अब मानहु ता दिन दुक्ख नवीनौ ।
माँगन आवै तौ दीजै भटू अपनो मन, जौ वह जाइ न दीनौ ।६।
शब्दार्थ—जै = ( जिन ) मत । लेति० = लेते समय तो बड़े आनंद से
उसे ले लिया, पर अब वह दिया नहीं जाता, प्रत्युत देने में एक नया दुःख ही
खड़ा हो जाता है । अतः यदि माँगने आएँ तो श्रीकृष्ण को चाहे उनका मन
मत लौटाना पर अपना मन दे देना ।
सूचना—यह छंद सरदार की टीका में तो है, पर उन्होंने लिखा है—
‘यह कबित्त केशव को नाहीं तातें नारायण कवि नाहीं लिखो' । हस्तलिखित
प्रतियों में भी यह छंद है। लीथोवाली प्रति में नहीं है। इसमें केशव की
छाप नहीं है।
पुनः—( सवैया )
(४५१) आजु देवारि की राति जौ कीजै तौ आजु के द्योस लौं है है सभागी ।
बात सुनी जननी पै जबै तब हा मति मान का नींद न जागी ।
अंग सिँगारि निहारि निसा तिन चित्तबिहारनि सों अनुरागी ।
दीप दै देवनि जाइ ---- मिसि केसवराय भा खेलन लागी ॥१०॥
....-बागे । चढ़ावत-लगावत । निसि०-रसपागे । परायो ब-परायौ
सु । ६—मन-पुत्र । ही-इ । हरि-हठि । जैं-जो । तौन देत०-तौन मानहु
सों मानिहौ तादिन । दुख्ख-दुस्ट । १०-पुनः-मध्य को मिलैबो । तौ-सु ।
जबै-जबहीं । केसवराय-केसवदास ।