Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages
Page 58Permalink

प्राण ४५.

जगत् भावराशि की समष्टि मात्र है।' कुछ समय के लिए सारे स्थूल कम्पन (gross vibrations) चले गए थे और केवल सूक्ष्म कम्पन, जिनको उन्होने भावराशि कहा था, बच रहे थे। उन्होने चारो ओर केवल सूक्ष्म कम्पन देखे थे। सम्पूर्ण जगत् उनकी आँखो मे मानो एक महान् भाव-समुद्र मे परिणत हो गया था। उस महासमुद्र मे वे और जगत् की प्रत्येक व्यष्टि मानो एक-एक छोटा भाव-भँवर बन गई थी।

इस प्रकार हम देखते है कि अन्तर्जगत् मे भी एक अखण्ड भाव विद्यमान है। और अन्त मे जब हम वाह्य, अन्तर—सम्पूर्ण जगत् को छोडकर उस आत्मा के समीप जाते है तब वहाँ एक अखण्ड के अतिरिक्त और कुछ नही अनुभव करते। स्थूल और सूक्ष्म सब प्रकार की गतियो के पीछे वही एक अखण्ड सत्ता अपनी महिमा में विराजमान है। यहाँ तक कि इन परिदृश्यमान गतियो के भीतर भी—शक्ति की स्थूल अभिव्यक्तियो के भीतर भी—केवल एक अखण्ड भाव विद्यमान है। इन सत्यो को अब अस्वीकार नही किया जा सकता, क्योकि ये सब विज्ञान द्वारा प्रमाणित हो चुके है। आधुनिक पदार्थविज्ञान ने यह प्रमाणित कर दिया है कि शक्ति-समष्टि सर्वत्र समान है और यह भी सिद्ध हो चुका है कि यह शक्ति-समष्टि दो तरह से अवस्थित है—कभी स्तिमित या अव्यक्त अवस्था मे और कभी व्यक्त अवस्था मे। व्यक्त अवस्था में वह इन नानाविध शक्तियो के रूप धारण करती है। इस प्रकार वह अनन्त काल से कभी व्यक्त और कभी अव्यक्त भाव धारण करती आ रही है। इस शक्तिरूपी प्राण के सयम का नाम ही प्राणायाम है।

इस प्राणायाम के साथ श्वास-प्रश्वास की क्रिया का सम्बन्ध

Page 59Permalink

४६ राजयोग

बहुत थोडा है। यथार्थ प्राणायाम का अधिकारी होने मे यह श्वास प्रश्वास की क्रिया एक उपाय मात्र है। मनुष्य-देह मे प्राण का सबसे स्पष्ट प्रकाश है—फेफडे की गति। यदि यह गति रुक जाय, तो देह की सारी क्रियाएँ तुरन्त बन्द हो जायेंगी, शरीर के भीतर जो अन्यान्य शक्तियाँ कार्य कर रही थी, वे भी शान्त भाव धारण कर लेगी। पर ऐसे भी व्यक्ति हैं, जो अपने को इस प्रकार शिक्षित कर लेते हैं कि उनके फेफडे की गति रुक जाने पर भी उनका शरीर नही जाता। ऐसे बहुत से व्यक्ति हैं, जो बिना सांस लिए कई महीने तक जमीन के अन्दर गडे रह सकते हैं, पर तो भी उनका देह-नाश नही होता। सूक्ष्मतर शक्ति के पास जाने के लिए हमें स्थूलतर शक्ति की सहायता लेनी पडती है। इस प्रकार क्रमश सूक्ष्म से सूक्ष्मतर शक्ति मे जाते हुए अन्त में हम चरम लक्ष्य पर पहुँच जाते है। शरीर मे जितने प्रकार की क्रियाएँ है, उनमे फेफडे की क्रिया ही सबसे सहज रूप से प्रत्यक्ष है। वह मानो देह के भीतर गतिनियामक चक्र के रूप मे अन्य सब शक्तियो को चला रही है। प्राणायाम का यथार्थ अर्थ है—फेफड़े की इस गति का रोध करना। इस गति के साथ श्वास का निकट सम्बन्ध है। यह गति श्वास-प्रश्वास द्वारा उत्पन्न नहीं होती, वरन् वही श्वास-प्रश्वास की गति को उत्पन्न कर रही है। यह गति ही, पम्प की भाँति, वायु को भीतर खीचती है। प्राण इस फेफडे को चलाता है और फेफडे की यह गति फिर वायु को खींचती है। इस तरह यह स्पष्ट है कि प्राणायाम श्वास-प्रश्वास की क्रिया नही है। पेशियो की जो शक्ति फेफड़े को चलाती है, उसको वश मे लाना ही प्राणायाम है। जो शक्ति स्नायुओं के भीतर से मांसपेशियो के पास जाती है और जो फेफड़े का

Page 60Permalink

प्राण ४७

संचालन करती है, वही प्राण है। प्राणायाम की साधना मे हमे उसी को वश मे लाना है। जब प्राण पर विजय प्राप्त हो जायगी, तब हम देखेंगे कि शरीरस्थ प्राण की अन्यान्य सभी क्रियाएँ हमारे अधिकार मे आ गई है। मैने स्वय ऐसे व्यक्ति देखे है, जिन्होने अपने शरीर की सारी पेशियो को वंशीभूत कर लिया है अर्थात् वे उनको इच्छानुसार चला सकते है। और वे ऐसा कर भी क्यो न सकेगे ? यदि कुछ पेशियाँ हमारी इच्छा के अनुसार चलाई जा सकती हो, तो दूसरी सब पेशियो और स्नायुओ को हम इच्छानुसार क्यो न चला सकेगे ? इसमे असम्भव क्या है ? कभी हमारी इस सयम-शक्ति का लोप हो गया है, और वे पेशियाँ इच्छानुग न हो स्वैर हो गई हैं। हम इच्छानुसार कानो को नही हिला सकते, परन्तु हम जानते है कि पशुओ मे यह शक्ति है। हममे यह शक्ति इसलिए नही है कि हम इसे काम मे नही लाते। इसी को क्रम-अवनति अथवा पूर्वावस्था की ओर पुनरावर्तन (atavism) कहते है।

फिर, हम यह भी जानते है कि जिस शक्ति ने अभी अव्यक्त भाव धारण किया है, उसे हम फिर से व्यक्तावस्था में ला सकते हैं। दृढ अभ्यास के द्वारा शरीर की अनेक क्रियाएँ, जो अभी हमारी इच्छा के अधीन नही, फिर से पूरी तरह वश मे लाई जा सकती है। इस प्रकार विचार करने पर दीख पडता है कि शरीर का प्रत्येक अश हम पूरी तरह अपनी इच्छा के अधीन कर सकते हैं, इसमें कुछ भी असम्भव नही, बल्कि यह तो पूर्णरूपेण सम्भव है। योगी प्राणायाम द्वारा इसमे कृतकार्य होते हैं। तुम लोगो ने योगशास्त्र के बहुत से ग्रन्थो मे लिखा देखा होगा कि श्वास लेने के समय सम्पूर्ण शरीर को प्राण से पूर्ण

Page 61Permalink

४८ राजयोग

कर लो। अँगरेजी अनुवाद मे प्राण शब्द का अर्थ किया गया है श्वास। इससे तुम्हे सहज ही सन्देह हो सकता है कि श्वास से सम्पूर्ण शरीर को कैसे पूरा किया जाय। वास्तव मे यह अनुवादक का दोष है। देह के सारे अगो को प्राण अर्थात् इस जीवनी-शक्ति द्वारा भरा जा सकता है, और जब तुम इससे कृतकार्य होगे, तो सम्पूर्ण शरीर तुम्हारे वश हो जायगा, देह की समस्त व्याधियां, सारे दुख तुम्हारी इच्छा के अधीन हो जायेंगे। इतना ही नही, दूसरे के शरीर पर भी अधिकार जमाने मे तुम कृतकार्य हो जाओगे। ससार मे भला-बुरा जो कुछ है, सभी सक्रामक है। यदि तुम्हारा शरीर किसी विशेष अवस्था में हो, तो उसकी प्रवृत्ति दूसरो में भी वही अवस्था उत्पन्न करने की होगी। यदि तुम सबल और स्वस्थकाय रहो, तो तुम्हारे समीपवर्ती व्यक्तियों में भी मानो कुछ स्वस्थ भाव, कुछ सबल भाव आयगा। और यदि तुम रुग्ण और दुर्बल रहो, तो देखोगे, तुम्हारे निकटवर्ती दूसरे व्यक्ति भी मानो कुछ रुग्ण और दुर्बल हो रहे है। तुम्हारी देह का कम्पन मानो दूसरे के भीतर सचारित हो जायगा। जब एक व्यक्ति दूसरे को रोगमुक्त करने की चेष्टा करता है, तब उसका पहला प्रयत्न यह होता है कि उसका स्वास्थ्य दूसरे में सचारित हो जाय। यही आदिम चिकित्साप्रणाली है। ज्ञातभाव से हो या अज्ञातभाव से, एक व्यक्ति दूसरे की देह में स्वास्थ्य सचार कर दे सकता है। यदि एक बहुत बलवान व्यक्ति किसी दुर्बल व्यक्ति के साथ सदैव रहे, तो वह दुर्बल व्यक्ति कुछ अंशों में अवश्य सबल हो जायगा। यह बल-सचारण-क्रिया ज्ञातभाव से हो सकती है तथा अज्ञातभाव मे भी। जब यह क्रिया ज्ञात-भाव से की जाती है, तब इसका कार्य और भी शीघ्र तथा

Page 62Permalink

प्राण ४९

उत्तम रूप से होता है। एक और दूसरे प्रकार की भी आरोग्य-प्रणाली है, जिसमें आरोग्यकारी स्वयं बहुत स्वस्थकाय न होने पर भी दूसरे के शरीर मे स्वास्थ्य का संचार कर दे सकता है। इन स्थलो में उस आरोग्यकारी व्यक्ति को कुछ परिमाण में प्राणजयी समझना चाहिए। वह कुछ समय के लिए अपने प्राण मे मानो एक विशेष कम्पन उत्पन्न करके दूसरे के शरीर में उसका सञ्चार कर देता है।

अनेक स्थलो मे यह कार्य बहुत दूरसे भी साधित हुआ है। यदि सचमुच में दूरत्व का अर्थ क्रमविच्छेद ( Break ) हो, तो दूरत्व नामक कोई चीज नही। ऐसा दूरत्व कहाँ है, जहाँ परस्पर कुछ भी सम्बन्ध, कुछ भी योग नही ? सूर्य मे और तुममें क्या वास्तविक कोई क्रमविच्छेद है ? नही, यह तो समस्त एक अविच्छिन्न अखण्ड वस्तु है, तुम उसके एक अश हो और सूर्य उसका एक दूसरा अश। नदी के एक भाग और दूसरे भाग मे क्या क्रम-विच्छेद है ? तो फिर शक्ति भी एक जगह से दूसरी जगह क्यों न भ्रमण कर सकेगी ? इसके विरोध मे तो कोई युक्ति नही दी जा सकती। दूर से आरोग्य करने की घटनाएँ बिलकुल सत्य हैं। इस प्राण को बहुत दूर तक सचालित किया जा सकता है। पर हाँ, इसमे धोखेबाजी बहुत है। यदि इसमे एक घटना सत्य हो, तो अन्य सैकड़ो असत्य और छल-कपट के अतिरिक्त और कुछ नही। लोग इसे जितना सहज समझते है, यह उतना सहज नही। अधिकतर स्थलो में तो देखोगे कि आरोग्य करनेवाले चगा करने के लिए मानव-देह की स्वाभाविक स्वस्थता की ही सहायता लेते हैं। एक ऐलोपैथ चिकित्सक आता है, हैजे के रोगियो की चिकित्सा करता है और उन्हे दवा देता है; एक होमियोपैथ चिकित्सक

४

Page 63Permalink

५० राजयोग

आता है, वह भी रोगियो को अपनी दवा देता है और शायद लोपैथ की अपेक्षा अधिक रोगियो को चगा कर देता है। ऐसा क्यो? इसलिए कि वह रोगी के शरीर मे किसी तरह का विपर्यय न लाकर प्रकृति को अपनी चाल से काम करने देता है। और विश्वास के बल से आरोग्य करनेवाला तो और भी अधिक रोगियो को चगा कर देता है, क्योकि वह अपनी इच्छाशक्ति द्वारा कार्य करके विश्वास-बल से रोगी की प्रसुप्त प्राण-शक्ति को प्रबुद्ध कर देता है।

परन्तु विश्वास-बल से रोगो को अच्छा करनेवालो को सदा एक भ्रम हुआ करता है, वे सोचते है कि साक्षात् विश्वास ही लोगो को रोगमुक्त करता है। वास्तव मे यह नही कहा जा सकता कि केवल विश्वास इसका कारण है। ऐसे भी रोग है, जिसमें रोगी स्वय नही समझ पाता कि उसके कोई रोग है। रोगी का अपनी नीरोगता पर अतीव विश्वास ही रोग का एक प्रधान लक्षण है, और इससे आसन्नमृत्यु की सूचना होती है। इन सब स्थलो मे केवल विश्वास से रोग नही टलता। यदि विश्वास ही रोग की जड काटता हो, तो वे रोगी मौत के मुँह न गए होते। वास्तव में रोग तो इस प्राण की शक्ति से ही दूर होता है। प्राण-जित् पवित्रात्मा पुरुष अपने प्राण को एक निर्दिष्ट कम्पन मे ले जा सकते है और उसे दूसरे मे सञ्चारित करके, उसके भीतर भी उसी प्रकार का कम्पन पैदा कर सकते हैं। तुम प्रतिदिन की घटना से यह प्रमाण ले सकते हो। मै वक्तृता दे रहा हूँ। वक्तृता देते समय मै क्या कर रहा हूँ? मै अपने मन के भीतर मानो एक विशिष्ट कम्पन पैदा कर रहा हूँ। और मै इस विषय में जितना ही कृतकार्य होऊँगा, तुम मेरी बात सुनकर उतने ही प्रभावित

Page 64Permalink

५० राजयोग

आता है, वह भी रोगियों को अपनी दवा देता है और शायद लोगों की अपेक्षा अधिक रोगियों को चंगा कर देता है। ऐसा क्यों? इसलिए कि वह रोगी के शरीर में किसी तरह का विपर्यय ऐन लाकर प्रकृति को अपनी चाल से काम करने देता है। और विश्वास के बल से आरोग्य करनेवाला तो और भी अधिक रोगियों को चंगा कर देता है, क्योंकि वह अपनी इच्छाशक्ति द्वारा कार्य करके विश्वास-बल से रोगी की प्रसुप्त प्राण-शक्ति को प्रबुद्ध कर देता है।

परन्तु विश्वास-बल से रोगों को अच्छा करनेवालों को सदा एक भ्रम हुआ करता है, वे सोचते हैं कि साक्षात् विश्वास ही लोगों को रोगमुक्त करता है। वास्तव में यह नहीं कहा जा सकता कि केवल विश्वास इसका कारण है। ऐसे भी रोग हैं, जिसमें रोगी स्वयं नहीं समझ पाता कि उसके कोई रोग है। रोगी का अपनी नीरोगता पर अतीव विश्वास ही रोग का एक प्रधान लक्षण है, और इससे आसन्नमृत्यु की सूचना होती है। इन सब स्थलों में केवल विश्वास से रोग नहीं टलता। यदि विश्वास ही रोग की जड़ काटता हो, तो वे रोगी मौत के मुँह न गए होते। वास्तव में रोग तो इस प्राण की शक्ति से ही दूर होता है। प्राण-जित् पवित्रात्मा पुरुष अपने प्राण को एक निर्दिष्ट कम्पन में ले जा सकते हैं और उसे दूसरे में संचारित करके, उसके भीतर भी उसी प्रकार का कम्पन पैदा कर सकते हैं। तुम प्रतिदिन की घटना से यह प्रमाण ले सकते हो। मैं वक्तृता दे रहा हूँ। वक्तृता देते समय मैं क्या कर रहा हूँ? मैं अपने मन के भीतर मानो एक विशिष्ट कम्पन पैदा कर रहा हूँ। और मैं इस विषय में जितना ही कृतकार्य होऊँगा, तुम मेरी बात सुनकर उतने ही प्रभावित

५० राजयोग

Page 65Permalink

५० राजयोग

आता है, यह भी रोगियों को अपनी दवा देता है और शायद लोपैथ की अपेक्षा अधिक रोगियों को चंगा कर देता है। ऐसा क्यो ? इसलिए कि वह रोगी के शरीर मे किसी तरह का विपर्यय ऐन लाकर प्रकृति को अपनी चाल से काम करने देता है। और विश्वास के बल से आरोग्य करनेवाला तो और भी अधिक रोगियों को चंगा कर देता है, क्योकि वह अपनी इच्छाशक्ति द्वारा कार्य करके विश्वास-बल से रोगी की प्रसुप्त प्राण-शक्ति को प्रबुद्ध कर देता है।

परन्तु विश्वास-बल से रोगो को अच्छा करनेवालो को सदा एक भ्रम हुआ करता है, वे सोचते है कि साक्षात् विश्वास ही लोगो को रोगमुक्त करता है। वास्तव मे यह नही कहा जा सकता कि केवल विश्वास इसका कारण है। ऐसे भी रोग है, जिसमे रोगी स्वय नही समझ पाता कि उसके कोई रोग है। रोगी का अपनी नीरोगता पर अतीव विश्वास ही रोग का एक प्रधान लक्षण है, और इससे आसन्नमृत्यु की सूचना होती है। इन सब स्थलो मे केवल विश्वास से रोग नही टलता। यदि विश्वास ही रोग की जड काटता हो, तो वे रोगी मौत के मुँह न गए होते। वास्तव में रोग तो इस प्राण की शक्ति से ही दूर होता है। प्राण-जित् पवित्रात्मा पुरुष अपने प्राण को एक निर्दिष्ट कम्पन मे ले जा सकते है और उसे दूसरे में सचारित करके, उसके भीतर भी उसी प्रकार का कम्पन पैदा कर सकते है। तुम प्रतिदिन की घटना से यह प्रमाण ले सकते हो। मै वक्तृता दे रहा हूँ। वक्तृता देते समय मै क्या कर रहा हूँ? मैं अपने मन के भीतर मानो एक विशिष्ट कम्पन पैदा कर रहा हूँ। और मै इस विषय मे जितना ही कृतकार्य होऊँगा, तुम मेरी बात सुनकर उतने ही प्रभावित

Page 66Permalink

प्राण ५१

होगे। तुम लोगो को मालूम है, वक्तृता देते-देते मे जिस दिन मस्त हो जाता हूँ, उस दिन मेरी वक्तृता तुमको बहुत अच्छी लगती है, पर जब कभी मेरी उत्तेजना घट जाती है, तो तुम्हें मेरी वक्तृता मे उतना आनन्द नही मिलता।

जगत् को हिला-डुला देनेवाले तीव्र इच्छाशक्तिसम्पन्न महापुरुष अपने प्राण मे बहुत ऊँचा कम्पन उत्पन्न करके उस प्राण के वेग को इतना अधिक कर सकते है और उसको इतनी शक्ति से युक्त कर सकते है कि वह दूसरे को पल भर मे लपेट लेती है, हजारो मनुष्य उनकी ओर खिच जाते है और ससार के आधे लोग उनके भाव से परिचालित हो जाते है। जगत् मे जितने महापुरुष हुए है, सभी प्राणजित् थे। इस प्राण-सयम के बल से वे प्रबल इच्छाशक्तिसम्पन्न हो गए थे। वे अपने प्राण के भीतर अति उच्च कम्पन पैदा कर सकते थे, और उसी से उन्हे समस्त ससार पर प्रभाव विस्तार करने की क्षमता प्राप्त हुई थी। ससार मे तेज या शक्ति के जितने विकास देखे जाते है, सभी प्राण के संयम से उत्पन्न होते है। मनुष्य को यह तथ्य भले ही मालूम न हो, पर और किसी तरह इसकी व्याख्या नही हो सकती। तुम्हारे शरीर मे यह प्राण कभी एक ओर अधिक और दूसरी ओर कम हो जाता है। प्राण के इस प्रकार असामजस्य से ही रोग की उत्पत्ति होती है। अतिरिक्त प्राण को हटाकर, जहाँ प्राण का अभाव है, वहाँ का अभाव भर सकने से ही रोग अच्छा हो जाता है। प्राण कहाँ अधिक है और कहाँ अल्प, इसका ज्ञान प्राप्त करना भी प्राणायाम का अग है। अनुभव-शक्ति इतनी सूक्ष्म हो जायगी कि मन समझ जायगा, पैर के अँगूठे मे या हाथ की उँगली मे जितना प्राण आवश्यक है, उतना वहाँ नही है, और मन उस

Page 67Permalink

५२ राजयोग

प्राण के अभाव को पूरा करने मे भी समर्थ हो जायगा । इस प्रकार प्राणायाम के अनेक अग हैं। इनको धीरे-धीरे, एक के बाद एक, सीखना होगा । अतएव यह स्पष्ट है कि विभिन्न रूपो में प्रकाशित प्राण का सयम करना और उसको विभिन्न प्रकार से चलाना ही राजयोग का एकमात्र लक्ष्य है। जब कोई अपनी समुदय शक्तियो का सयम करता है, तब वह अपनी देह के भीतर के प्राण का ही सयम करता है। जब कोई ध्यान करता है, तो भी समझना चाहिए कि वह प्राण का ही सयम कर रहा है।'

महासागर की ओर यदि देखो, तो प्रतीत होगा कि वहाँ पर्वतकाय बडी-बडी तरगें हैं, फिर छोटी-छोटी तरगें भी हैं, और छोटे-छोटे बुलबुले भी। पर इन सबके पीछे वही अनन्त महा-समुद्र है। एक ओर वह छोटा बुलबुला अनन्त समुद्र से युक्त है, फिर दूसरी ओर वह बडी तरंग भी उसी महासमुद्र से युक्त है। इसी प्रकार, ससार मे कोई महापुरुष हो सकता है, और कोई छोटा बुलबुला-जैसा सामान्य व्यक्ति, परन्तु सभी उसी अनन्त महाशक्ति-समुद्र से युक्त हैं। इस महाशक्ति से जीव का जन्मगत सम्बन्ध है। जहाँ भी जीवनी-शक्ति का प्रकाश देखो, वहाँ समझना कि उसके पीछे अनन्त शक्ति का भण्डार है। एक छोटासा फफूँदी (कुकुरमुत्ता) है, वह, सम्भव है, इतना छोटा, इतना सूक्ष्म हो कि उसे अनुवीक्षण यन्त्र द्वारा देखना पडे, उससे आरम्भ करो। देखोगे कि वह अनन्त शक्ति के भण्डार से क्रमश शक्ति सग्रह करके एक अन्य रूप धारण कर रहा है। कालान्तर में वह उद्भिद् के रूप मे परिणत होता है, वही फिर एक पशु का आकार ग्रहण करता है, फिर मनुष्य का रूप लेकर वही अन्त में ईश्वर-रूप में परिणत हो जाता है। हाँ, इतना अवश्य है कि

Page 68Permalink

प्राण ५३

प्राकृतिक नियम से इस व्यापार के घटते-घटते लाखो साल पार हो जाते है। परन्तु यह समय है क्या ? वेग—साधना का वेग बढा देकर समय काफी घटाया जा सकता है। योगियो का कहना है कि साधारण प्रयत्न से जिस काम को अधिक समय लगता है, वही, वेग वढा देने पर, बहुत थोडे समय में सध सकता है। हो सकता है, कोई मनुष्य इस ससार की अनन्त शक्तिराशि में से बहुत थोडी-थोडी शक्ति लेकर चले। इस प्रकार चलने पर उसे देव-जन्म प्राप्त करते, सम्भव है, एक लाख वर्ष लग जायें, फिर और भी ऊँची अवस्था प्राप्त करते शायद पाँच लाख वर्ष लगे। फिर पूर्ण सिद्ध होते और भी पाँच लाख साल लगे। पर उन्नति का वेग वढा देने पर यह समय कम हो जाता है। पर्याप्त प्रयत्न करने पर छ वर्ष या छ महीने मे ही यह सिद्धिलाभ क्यो न हो सकेगा ? युक्ति तो बताती है कि इसमे कोई निर्दिष्ट सीमाबद्ध समय नही है। सोचो, कोई वाष्पीय यन्त्र, निर्दिष्ट परिमाण में कोयला देने पर, प्रति घण्टा दो मील चल सकता है, तो अधिक कोयला देने पर वह और भी शीघ्र चलेगा। इसी प्रकार, यदि हम भी तीव्र वेगसम्पन्न (योगसूत्र—१।२१) हो, तो इसी जन्म में मुक्तिलाभ क्यो न कर सकेगे ? हाँ, हम यह जानते अवश्य हैं कि अन्त मे सभी मुक्ति पाएँगे। पर इस प्रकार युग-युग तक हम प्रतीक्षा क्यो करे ? इसी क्षण, इस शरीर में ही, इस मनुष्य-देह में ही हम मुक्ति-लाभ करने मे समर्थ क्यो न होगे ? हम इसी समय वह अनन्त ज्ञान, वह अनन्त शक्ति क्यों न प्राप्त कर सकेगे ?

आत्मा की उन्नति का वेग वढाकर किस प्रकार थोड़े समय मे मुक्ति पाई जा सकती है, यही सारी योग-विद्या का लक्ष्य और उद्देश्य है। जब तक सारे मनुष्य मुक्त नही हो जाते, तब तक

Page 69Permalink

५४ राजयोग

प्रतीक्षा करते हुए थोडा-थोडा करके अग्रसर न होकर, प्रकृति के अनन्त शक्ति-भाण्डार मे से शक्ति ग्रहण करने की शक्ति बढाकर किस प्रकार शीघ्र मुक्ति-लाभ किया जा सकता है, योगियो ने इसका उपाय खोज निकाला है। ससार के सभी महापुरुष, साधु और सिद्ध पुरुषो ने क्या किया है ? उन्होने एक जन्म मे ही, समय को कम करके, उन सब अवस्थाओ का भोग कर लिया है, जिनमे से होते हुए साधारण मानव करोडो जन्मो मे मुक्त होता है। एक जन्म मे ही वे अपनी मुक्ति का मार्ग तय कर लेते है। वे दूसरी कोई चिन्ता नही करते, दूसरी बात के लिए एक निमिषमात्र भी समय नही देते। उनका पल भर भी व्यर्थ नही जाता। इस प्रकार उनकी मुक्ति का समय घट जाता है। एकाग्रता का यही अर्थ है कि शक्ति-सचय की क्षमता को बढाकर समय को घटा लेना। राजयोग इसी एकाग्रता की शक्ति को प्राप्त करने का विज्ञान है।

इस प्राणायाम के साथ प्रेततत्त्व (spiritualism) का क्या सम्बन्ध है ? वह भी एक तरह का प्राणायाम है। यदि यह सत्य हो कि परलोकगत आत्मा का अस्तित्व है और उसे हम देख भर नही पाते, तो यह भी बहुत सम्भव है कि यही पर शायद लाखो आत्माएँ है, जिन्हे हम न देख पाते है, न अनुभव कर पाते है, न छू पाते है। सम्भव है, हम सदा उनके शरीर के भीतर से आ-जा रहे हो। और यह भी बहुत सम्भव है कि वे भी हमे देखने या किसी प्रकार से अनुभव करने मे असमर्थ हो। यह मानो एक वृत्त के भीतर एक और वृत्त है, एक जगत् के भीतर एक और जगत्। जो एक ही भूमि (plane) पर रहते है, वे ही एक दूसरे को देख सकते है। हम पचेन्द्रियविशिष्ट प्राणी

Page 70Permalink

प्राण ५५

हैं। हमारे प्राण का कम्पन एक विशेष प्रकार का है। जिनके प्राण का कम्पन हमारी तरह का है, उन्ही को हम देख सकेगे। परन्तु यदि कोई ऐसा प्राणी हो, जिसका प्राण अपेक्षाकृत उच्च कम्पन-शील है, तो उसे हम न देख पाएंगे। प्रकाश की उज्ज्वलता अत्यन्त अधिक बढ़ जाने पर हम उसे नही देख पाते, किन्तु बहुत से प्राणियो की आँखे ऐसी शक्तियुक्त है कि वे उस तरह का प्रकाश देख सकती है। इसके विपरीत, यदि आलोक के परमाणुओ का कम्पन अत्यन्त मृदु या हल्का हो, तो भी उसे हम नही देख पाते, परन्तु उल्लू और बिल्ली आदि प्राणी उसे देख लेते है। हमारी दृष्टि इस प्राण-कम्पन के एक विशेष प्रकार को ही देखने मे समर्थ है। इसी प्रकार वायुराशि की बात लो। वायु मानो स्तर-पर-स्तर रची हुई है। पृथ्वी का निकटवर्ती स्तर अपने से ऊँचे-वाले स्तर से अधिक घना है, और इस तरह हम जितने ऊँचे उठते जायेंगे, हमे यही दिखेगा कि वायु क्रमश तरल होती जा रही है। इसी प्रकार समुद्र की बात लो, समुद्र के जितने ही गहरे प्रदेश मे जाओगे, पानी का दबाव उतना ही बढेगा। जो प्राणी समुद्र के नीचे रहते हैं, वे कभी ऊपर नही आ सकते, क्योकि यदि वे आयें, तो उसी समय उनका शरीर टुकड़े-टुकड़े हो जाय।

सम्पूर्ण जगत् को 'ईथर' (आकाश-तत्त्व) के एक समुद्र के रूप में सोचो। प्राण की शक्ति से वह मानो स्पन्दित हो रहा है और विभिन्न मात्रा मे स्पन्दनशील स्तरो मे बँटा हुआ है। तो देखोगे, जिस स्थान से स्पन्दन शुरू हुआ है, उससे तुम जितनी दूर जाओगे, उतना ही वह स्पन्दन मृदु रूप से अनुभूत होगा, केन्द्र के पास स्पन्दन बहुत द्रुत होता है। और भी सोचो, भिन्न-भिन्न प्रकार के स्पन्दन एक-एक स्तर हैं। इस सम्पूर्ण

Page 71Permalink

५६ राजयोग

स्पन्दन-क्षेत्र को एक वृत्त के रूप मे सोचो, सिद्धि उसका केन्द्र है, इस केन्द्र से हम जितनी दूर जायेंगे, स्पन्दन उतना ही मृदु होता जायगा। भूत सबसे बाहरी स्तर है, मन उससे निकटवर्ती, और आत्मा मानो केन्द्रस्वरूप है। इस प्रकार विचार करने से हम देखेंगे कि जो प्राणी एक स्तर पर वास करते है, वे एक दूसरे को पहिचान सकेगे, परन्तु अपने से नीचे या ऊँचे स्तरवाले जीवों को न पहिचान सकेंगे। फिर भी, जैसे हम अणुवीक्षण यंत्र और दूरवीन की सहायता से अपनी दृष्टि का क्षेत्र वढा सकते है, उसी प्रकार मन को विभिन्न प्रकार के स्पन्दनों से युक्त करके हम दूसरे स्तर का समाचार अर्थात् वहाँ क्या हो रहा है यह जान सकते है। समझो, इसी कमरे मे ऐसे बहुत से प्राणी हैं, जिन्हे हम नही देख पाते। वे सब प्राण के एक प्रकार के स्पन्दन के फल हैं, और हम एक दूसरे प्रकार के। मान लो कि वे प्राण के अधिक स्पन्दन से युक्त हैं और हम उनकी तुलना मे कम स्पन्दन से। हम भी प्राणरूप मूल वस्तु से गढे हुए है, और वे भी वही है। सभी एक ही समुद्र के भिन्न-भिन्न अंश मात्र हैं। विभिन्नता है केवल स्पन्दन की मात्रा मे। यदि मन को मैं अधिक स्पन्दन-विशिष्ट कर सका, तो मै फिर इस स्तर पर न रहूँगा, मैं फिर तुम लोगो को न देख पाऊँगा। तुम मेरी दृष्टि से अन्तर्हित हो जाओगे और वे मेरी आँखो के सामने आ जायेंगे। तुममें से शायद बहुतो को मालूम है कि यह व्यापार सत्य है। मन को इस प्रकार उच्च से उच्चतर स्पन्दन-विशिष्ट करने को योगशास्त्र में एकमात्र 'समाधि' शब्द द्वारा अभिहित किया गया है। समाधि की निम्नतर अवस्थाओ मे इन अदृश्य प्राणियो को प्रत्यक्ष किया जाता है। और समाधि की सर्वोच्च

Page 72Permalink

प्राण ५७

अवस्या तो वह है, जब हमे सत्यस्वरूप ब्रह्म के दर्शन होते है। तब हम उस उपादान को जान लेते है, जिससे इन सब बहुविध जीवों की उत्पत्ति हुई है। जैसे एक मृत्पिण्ड को जान लेने पर समस्त मृत्पिण्ड ज्ञात हो जाता है, उसी प्रकार ब्रह्म-दर्शन से सम्पूर्ण जगत् भी जाना जा सकता है।

इस प्रकार हम देखते है कि प्रेततत्त्व-विद्या में जो कुछ सत्य है, वह भी प्राणायाम के ही अन्तर्भूत है। इसी-प्रकार, जब कभी तुम देखो कि कोई दल या सम्प्रदाय किसी रहस्यात्मक या गुप्त तत्त्व के आविष्कार की चेष्टा कर रहा है, तो समझना, वह यथार्थत. किसी परिमाण मे इस राजयोग की ही साधना कर रहा है, प्राण-सयम की ही चेष्टा कर रहा है। जहाँ कही किसी प्रकार की असाधारण शक्ति का विकास हुआ है, वहाँ प्राण की ही शक्ति का विकास समझना चाहिए। यहाँ तक कि भौतिक विज्ञान भी प्राणायाम के अन्तर्गत किए जा सकते हैं। वाष्पीय यन्त्र को कौन संचालित करता है ? प्राण ही वाष्प के भीतर से उसको चलाता है। ये जो विद्युत् की अद्भुत क्रियाएँ दीख पडती है, ये सब प्राण के छोड भला और क्या हो सकती है ? पदार्थ-विज्ञान है क्या ? वह बाहरी उपायों द्वारा प्राणायाम है। प्राण जब मानसिक शक्ति के रूप से प्रकाशित होता है, तब मानसिक उपायो द्वारा ही उसका सयम किया जा सकता है। जिस प्राणायाम मे प्राण के स्थूल रूपो को बाह्य उपायो द्वारा जीतने की चेष्टा की जाती है, उसे पदार्थ-विज्ञान या भौतिक विज्ञान कहते है, और जिस प्राणायाम मे प्राण के मानसिक विकासो को मानसिक उपायो द्वारा सयत करने की चेष्टा की जाती है, उसी को राजयोग कहते हैं।

चतुर्थ अध्याय

Page 73Permalink

चतुर्थ अध्याय

प्राण का आध्यात्मिक रूप

योगियों के मतानुसार मेरुदण्ड के भीतर इड़ा और पिंगला नाम के दो स्नायविक शक्तिप्रवाह, और मेरुदण्डस्थ मज्जा के बीच सुषुम्ना नाम की एक शून्य नाली है। इस शून्य नाली के सबसे नीचे कुण्डलिनी का आधारभूत पद्म अवस्थित है। योगियों का कहना है कि वह त्रिकोणाकार है। योगियों की रूपक भाषा में कुण्डलिनी शक्ति उस स्थान पर कुण्डलाकार हो विराज रही है। जब यह कुण्डलिनी शक्ति जगती है, तब वह इस शून्य नाली के भीतर से मार्ग बनाकर ऊपर उठने का प्रयत्न करती है, और ज्यो-ज्यो वह एक-एक सोपान ऊपर उठती जाती है, त्यो-त्यों मन के स्तर-पर-स्तर मानो खुलते जाते हैं और योगी को अनेक प्रकार के अलौकिक दर्शन होने लगते हैं तथा अद्भुत शक्तियाँ प्राप्त होने लगती हैं। जब वह कुण्डलिनी मस्तक पर चढ़ जाती है, तब योगी सम्पूर्ण रूप से शरीर और मन से पृथक हो जाते हैं और उनकी आत्मा अपने मुक्त स्वभाव की उपलब्धि करती है। हमें मालूम है कि मेरुमज्जा एक विशेष प्रकार से गठित है। अँगरेजी के आठ अंक (8) को यदि इस तरह (∞) लम्बा कर लिया जाय, तो देखेंगे कि उसके दो अंश हैं और वे दोनों अंश बीच से जुड़े हुए हैं। इस तरह के अनेक अंकों को एक-पर-एक रखने पर जैसा दीख पड़ता है, मेरुमज्जा बहुत-कुछ वैसी ही है। उसके बाईं ओर इड़ा है और दाहिनी ओर पिंगला, और जो शून्य नाली मेरुमज्जा के ठीक बीच में से गई है, वही सुषुम्ना है। कटिप्रदेशस्थ मेरुदण्ड की कुछ अस्थियों के बाद ही मेरुमज्जा

Page 74Permalink

प्राण का आध्यात्मिक रूप ५९

समाप्त हो गई है, परन्तु वहाँ से भी तागे के समान एक बहुत ही सूक्ष्म पदार्थ बराबर नीचे उतरता गया है। सुपुम्ना नाली वहाँ भी अवस्थित है, परन्तु वहाँ बहुत सूक्ष्म हो गई है। नीचे की ओर उस नाली का मुँह बन्द रहता है। उसके निकट ही कटिप्रदेशस्थ नाडी-जाल (Sacral Plexus) अवस्थित है। आजकल के शरीरविधानशास्त्र (Physiology) के मत से वह त्रिकोणाकार है। इन विभिन्न नाडी-जालो के केन्द्र मेरुमज्जा के भीतर अवस्थित है, वे नाडी-जाल योगियो के भिन्न-भिन्न पद्मो या चक्रो के तौर पर लिए जा सकते है।

योगियो का कहना है कि सबसे नीचे मूलाधार से लेकर मस्तिष्क मे स्थित सहस्रार या सहस्रदल पद्म तक कुछ केन्द्र है। यदि हम उन पद्मो को पूर्वोक्त नाडी-जाल (plexus) समझें, तो आजकल के शरीरविधानशास्त्र के द्वारा बहुत सहज ही योगियों की बात का मर्म समझ मे आ जायगा। हमे मालूम है कि हमारे स्नायुओ के भीतर दो प्रकार के प्रवाह हैं, उनमे से एक को अन्तर्मुखी और दूसरे को बहिर्मुखी, एक को ज्ञानात्मक और दूसरे को गति-आत्मक, एक को केन्द्र की ओर जानेवाला और दूसरे को केन्द्र से दूर जानेवाला कहा जा सकता है। उनमे से एक मस्तिष्क की ओर सवाद ले जाता है, और दूसरा मस्तिष्क से बाहर, समुदाय अगो मे। परन्तु अन्त मे ये प्रवाह मस्तिष्क से सयुक्त हो जाते हैं। आगे आनेवाले विषय को स्पष्ट रूप से समझने के लिए हमे कुछ और बाते ध्यान मे रखनी होगी। यह मेरुमज्जा मस्तिष्क मे जाकर एक प्रकार के 'बल्व' मे—medulla नामक एक अडाकार पदार्थ मे अन्त हो जाती है, जो मस्तिष्क के साथ संयुक्त नहीं है, वरन् मस्तिष्क मे जो एक

Page 75Permalink

६० राजयोग

तरल पदार्थ है, उसमे तैरता रहता है। अत यदि सिर पर कोई आघात लगे, तो उस आघात की शक्ति उस तरल पदार्थ मे बिखर जाती है, और इससे उस बल्ब को कोई चोट नही पहुँचती। यह एक महत्त्वपूर्ण बात है, जो हमे स्मरण रखनी चाहिए। दूसरे, हमे यह भी जान लेना होगा कि इन सब चक्रो मे से सबसे नीचे स्थित मूलाधार, मस्तिष्क मे स्थित सहस्रार और नाभिदेश मे स्थित मणिपूर—इन तीन चक्रो की बात हमे विशेष रूप से ध्यान में रखनी होगी।

अब पदार्थ-विज्ञान का एक तत्त्व हमे समझना है। हम लोगो ने विद्युत् और उससे सयुक्त अन्य बहुविध शक्तियो की बाते सुनी हैं। विद्युत् क्या है, यह किसी को मालूम नही। हम लोग इतना ही जानते है कि विद्युत् एक प्रकार की गति है। जगत् मे और भी अनेक प्रकार की गतियां हैं, विद्युत् से उनका भेद क्या है? मान लो, यह टेबुल चल रहा है और उसके परमाणु विभिन्न दिशाओ मे जा रहे हैं। अब यदि उनको अनवरत एक ही दिशा मे चलाया जाय, तो वही गति विद्युत् की शक्ति मे परिणत हो जायगी। समस्त परमाणु यदि एक ओर गतिशील हो, तो उसी को वैद्युत-गति कहते हैं। इस कमरे मे जो वायु है, उसके सारे परमाणुओं को यदि लगातार एक ओर चलाया जाय, तो यह कमरा एक महान् विद्युदाधार-यन्त्र (battery) के रूप मे परिणत हो जायगा।

शारीरविधानशास्त्र की एक और बात हमें स्मरण करनी होगी। वह यह कि जो स्नायु-केन्द्र श्वास-प्रश्वास-यन्त्रो को नियमित करता है, उसका सारे स्नायु-प्रवाहो पर भी कुछ अधिकार है। यह केन्द्र वक्ष के ठीक दूसरी ओर मेरुदण्ड में अवस्थित है। यह

Page 76Permalink

प्राण का आध्यात्मिक रूप ६१

श्वास-प्रश्वास-यंत्रों को नियमित करता है और दूसरे जो स्नायु-चक्र हैं, उन पर भी कुछ प्रभाव डालता है।

अब हम प्राणायाम-क्रिया के साधन का कारण समझ सकेंगे। पहले तो, यदि श्वास-प्रश्वास की गति नियमित की जाय, तो शरीर के सारे परमाणु एक ही दिशा मे गतिशील होने का प्रयत्न करेंगे। जब विभिन्न दिशाओ मे दौड़नेवाला मन एकमुखी होकर एक दृढ इच्छाशक्ति के रूप मे परिणत होता है, तब सारे स्नायु-प्रवाह भी परिवर्तित होकर एक प्रकार की विद्युद्वत् गति प्राप्त करते हैं, क्योकि स्नायुओ पर विद्युत्-क्रिया करने पर देखा गया है कि उनके दोनो प्रान्तो मे धनात्मक और ऋणात्मक इन विपरीत शक्तिद्वय का उद्भव होता है। इसी से यह स्पष्ट है कि जब इच्छाशक्ति स्नायु-प्रवाह के रूप मे परिणत होती है, तब वह एक प्रकार के विद्युत् का आकार धारण कर लेती है। जब शरीर की सारी गतियां सम्पूर्ण रूप से एकाभिमुखी होती है, तब वह शरीर मानो इच्छाशक्ति का एक प्रबल विद्युदाधार बन जाता है। यह प्रबल इच्छाशक्ति प्राप्त करना ही योगी का उद्देश है। इस तरह, शरीरविधानशास्त्र की सहायता से प्राणायाम-क्रिया की व्याख्या की जा सकती है। वह शरीर के भीतर एक प्रकार की एकमुखी गति पैदा कर देती है और श्वास-प्रश्वास-केन्द्र पर आधिपत्य करके शरीर के अन्यान्य केन्द्रों को भी वश में लाने मे सहायता पहुँचाती हैं। यहाँ पर प्राणायाम का लक्ष्य मूलाधार में कुण्डलाकार मे अवस्थित कुण्डलिनी शक्ति को उद्बुद्ध-करना है।

हम जो कुछ देखते हैं, कल्पना करते है या जो कोई स्वप्न देखते हैं, सारे अनुभव हमे आकाश मे करने पडते हैं। हम

Page 77Permalink

६२ राजयोग

साधारणत जिस परिदृश्यमान आकाश को देखते हैं, उसका नाम है महाकाश । योगी जब दूसरो का मनोभाव समझने लगते है या अलौकिक वस्तुएँ देखने लगते हे, तब वे सब दर्शन चित्ताकाश में होते है । और जब अनुभूति विषयशून्य हो जाती है, जब आत्मा अपने स्वरूप मे प्रकाशित होती है, तब उसका नाम है चिदाकाश । जब कुण्डलिनी शक्ति जागकर सुषम्ना नाडी मे प्रवेश करती है, तब जो सब विषय अनुभूत होते हैं, वे चित्ताकाश मे ही होते है । जब वह उस नाडी की अन्तिम सीमा मस्तक मे पहुँचती है, तब चिदाकाश मे एक विषयशून्य ज्ञान अनुभूत होता है ।

अब विद्युत् की उपमा फिर से ली जाय । हम देखते हैं कि मनुष्य केवल तार के योग से एक जगह से दूसरी जगह विद्युत्-प्रवाह चला सकता है, परन्तु प्रकृति अपने महान् शक्ति-प्रवाहो को भेजने के लिए किसी तार का सहारा नही लेती । इसी से अच्छी तरह समझ मे आ जाता है कि किसी प्रवाह को चलाने के लिए वास्तव में तार की कोई आवश्यकता नही । हम तार के बिना काम नही कर सकते, इसीलिए हमे उसकी आवश्यकता पडती है । जैसे विद्युत्-प्रवाह तार की सहायता से विभिन्न दिशाओ मे प्रवाहित होता है, ठीक उसी तरह बाहर के विषय से जो ज्ञान-प्रवाह मस्तिष्क में अथवा मस्तिष्क से जो कर्मप्रवाह बहिर्देश मे प्रवाहित होता है, वह स्नायू-तन्तुरूप तार की ही सहायता से होता है । मेरुमज्जा-मध्यस्थ ज्ञानात्मक और कर्मात्मक-स्नायुगच्छ-स्तम्भ ही योगियो की इडा और पिंगला नाडियाँ हैं। प्रधानत उन दोनो नाडियो के भीतर से ही पूर्वोक्त अन्तर्मुखी


* पाठक यह ध्यान रखें कि यह बात बेतार-का-तार के आविष्कार के पूर्व ही कही गई । थी