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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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-१४० राजयोग

व्याख्या—यह संयम एक दिन में नही आता, इसके लिए तो दीर्घकाल तक निरन्तर अभ्यास करना पडता है।

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥१५॥

सूत्रार्थ—देखे और सुने हुए विषयों के प्रति तृष्णा का सर्वथा त्याग कर देनेवाले के पास जो एक अपूर्व भाव आता है, जिससे वह समस्त विषय-वासनाओं का दमन करने में समर्थ होता है, उसे वैराग्य या अनासक्ति कहते हैं। (उसके चार प्रकार हैं--यतमान, व्यतिरेक, एकेन्द्रिय और वशीकार।)

व्याख्या—दो शक्तियाँ हमारी सारी कार्य-प्रवृत्तियो की नियामक हैं। एक है हमारी अपनी अभिज्ञता और दूसरी है, दूसरो की अनुभूति। ये दो शक्तियाँ हमारे मानस-सरोवर में नाना प्रकार की तरंगे पैदा करती रहती हैं। इन दोनो शक्तियो के विरुद्ध लडाई ठानने और मन को वश मे रखने के लिए हमें वैराग्यरूपी शक्ति की सहायता लेनी पडती है। इन दोनो का त्याग ही हमारा अभीष्ट है। मान लो, मैं एक सडक से जा रहा हूँ। एक मनुष्य आता है और मेरी घडी छीन लेता है। यह मेरा निजी अनुभव हुआ। यह मैं स्वय देखता हूँ। वह तुरन्त मेरे चित्त मे एक तरग उत्पन्न कर देता है, जो क्रोध का आकार ले लेती है। अब मुझे चाहिए कि मैं उस भाव को न आने दूँ। यदि मैं उसे न रोक सकूँ, तो फिर मुझमें है ही क्या ? कुछ भी नही। यदि मैं रोक सका, तभी समझा जायगा कि मुझमे वैराग्य है। फिर, ससारी लोगो का अनुभव हमें सिखाता है कि विषय-भोग ही जीवन का चरम लक्ष्य है। ये सब हमारे लिए भयानक प्रलोभन हैं। उन सबके प्रति पूर्णतया उदासीन हो जाना और उन सबसे प्रभावित होकर मन को तद्रूप,

पातंजल-योगसूत्र १४१

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पातंजल-योगसूत्र १४१

वृत्ति के आकार मे परिणत न होने देना ही वैराग्य है। स्वय अपने अनुभव किए हुए और दूसरो के अनुभव किए हुए विषयों से हममे जो दो प्रकार की कार्य-प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हे दबाना और इस प्रकार चित्त को उनके वश मे नही आने देना ही वैराग्य कहलाता है। वे सब मेरे अधीन रहे, मै उनके अधीन न होऊँ—इस प्रकार के मनोबल को वैराग्य कहते है, और यह वैराग्य ही मुक्ति का एकमात्र उपाय है।

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥१६॥

सूत्रार्थ—जो (वैराग्य) पुरुष के (असल स्वरूप के) ज्ञान से आता है और जो गुणों का भी सर्वथा त्याग कर देता है, वह पर-वैराग्य है।

व्याख्या—वैराग्य की शक्ति का उच्चतम विकास तो तब होता है, जब वह गुणो के प्रति हमारी आसक्ति को भी दूर हटा देता है। पहले हमे समझ लेना होगा कि यह पुरुष या आत्मा क्या है, ये गुण क्या है। योगशास्त्र के मत से, यह सारी प्रकृति त्रिगुणात्मिका है। ये गुण हैं—तम, रज और सत्त्व। ये तीनो गुण बाह्य जगत् मे क्रमश तम (अन्धकार) या जड़ता, आकर्षण या विकर्षण और उन दोनो का सामजस्य, इन तीन प्रकार के भावो मे प्रकाशित होते हैं। प्रकृति की सारी वस्तुएँ, यह सारा-का-सारा प्रपच ही इन तीनो शक्तियो के विभिन्न मेल से उत्पन्न हुआ है। सांख्य मतवालो ने प्रकृति को नाना प्रकार के तत्त्वो में विभक्त किया है, मनुष्य की आत्मा इन सबके बाहर है, प्रकृति के बाहर है, वह स्वयंप्रकाश, शुद्ध और पूर्णस्वरूप है। प्रकृति में हम जो कुछ चैतन्य का प्रकाश देख पाते है, वह सभी प्रकृति में आत्मा का प्रतिबिम्ब मात्र है। प्रकृति स्वयं जड़-

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है। यह स्मरण रखना चाहिए कि मन भी प्रकृति शब्द के अन्तर्भूत है, वह प्रकृति के भीतर की वस्तु है। हमारे जो कुछ विचार है, वे सब-के-सब प्रकृति के ही अन्तर्गत हैं। विचार से लेकर सबसे स्थूलतम जड पदार्थ तक सभी प्रकृति के अन्तर्गत हैं—प्रकृति की विभिन्न अभिव्यक्ति मात्र हैं। इस प्रकृति ने मनुष्य की आत्मा को आवृत कर रखा है, और जब वह अपने इस आवरण को हटा लेती है, तब आत्मा आवरण-मुक्त हो अपनी महिमा में प्रकाशित हो जाती है। पन्द्रहवे सूत्र में जिस वैराग्य की बात बतलाई गई है, जिसके द्वारा समस्त विषयो को अर्थात् प्रकृति को वश में लाया जाता है, वह आत्मा के प्रकाशित होने में सबसे बड़ा सहायक है। अगले सूत्र में समाधि या पूर्ण एकाग्रता के लक्षण का वर्णन किया गया है। यह समाधि ही योगी का चरम लक्ष्य है।

वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात् सम्प्रज्ञातः ॥१७॥

सूत्रार्थ—वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता—इन चारों के सम्बन्ध से युक्त (जो समाधि है, वह) सम्प्रज्ञात या सम्यक् ज्ञानपूर्वक समाधि कहलाती है।

व्याख्या—समाधि दो प्रकार की है। एक है सम्प्रज्ञात और दूसरी, असम्प्रज्ञात। इस सम्प्रज्ञात समाधि में प्रकृति को वश में करने की समस्त शक्तियाँ आती है। सम्प्रज्ञात समाधि के चार प्रकार है। इसके प्रथम प्रकार को सवितर्क समाधि कहते हैं। सब समाधियो में ही मन को अन्य सब विषयो से हटाकर विशिष्ट विषय के ध्यान मे पुन-पुन नियुक्त करना पड़ता है। इस तरह के विचार या ध्यान के विषय दो प्रकार के है। एक तो, चौबीस जड तत्त्व और दूसरा, चेतन पुरुष।

पातंजल-योगसूत्र १४३

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पातंजल-योगसूत्र १४३

योग का यह अंश सम्पूर्णतया सांख्यदर्शन पर स्थापित है। इस सांख्यदर्शन के बारे मे मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ। तुम्हें शायद याद होगा कि मन, बुद्धि और अहंकार की एक साधारण आधारभूमि है। उसे चित्त कहते हैं, चित्त से ही उनकी उत्पत्ति है। यह चित्त प्रकृति की विभिन्न शक्तियो को लेकर उन्हे विचार के रूप मे परिणत करता है। फिर यह भी अवश्य स्वीकार करना होगा कि शक्ति और जड पदार्थ दोनों का कारणस्वरूप एक पदार्थ है, जहाँ पर वे दोनों एक हैं। यह पदार्थ अव्यक्त कहलाता है—वह सृष्टि के पूर्व प्रकृति की अप्रकाशित अवस्था है। उसमे एक कल्प के बाद सारी प्रकृति लौट आती है, फिर दूसरे कल्प में उससे पुन सब प्रादुर्भूत होते हैं। इन सबके अतीत चैतन्यघन पुरुष विद्यमान है। ज्ञान ही वास्तविक शक्ति है। किसी वस्तु का ज्ञान प्राप्त होने पर ही हम उस पर अपना अधिकार चलाने में समर्थ होते है। इसी प्रकार, जब हमारा मन इन सब विभिन्न तत्त्वो पर ध्यान करने लगता है, तो उन पर अधिकार प्राप्त करता जाता है। जिस प्रकार की समाधि में बाह्य स्थूल भूत ही ध्यान के विषय होते हैं, उसे सवितर्क कहते हैं। वितर्क का अर्थ है प्रश्न, और सवितर्क का अर्थ है प्रश्न के साथ—मानो उन स्थूल भूतो से पूछना, जिससे वे अपने अन्तर्गत सत्य और अपनी सारी शक्ति अपने ऊपर ध्यान करनेवाले पुरुष को दे दे—इसी को सवितर्क कहते है। किन्तु सिद्धियाँ प्राप्त करने से ही मुक्ति नही हो जाती। वह तो भोग के लिए साधन मात्र है। पर यहाँ, इस जीवन में, यथार्थ भोग-सुख है ही नही। ससार मे यही सबसे पुराना उपदेश है कि यहाँ भोग-सुख का अन्वेषण वृथा है; पर मनुष्य के लिए इसे समझना अत्यन्त कठिन है। किन्तु जब वह

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इसकी धारणा कर लेता है, तब इस जगत्-प्रपञ्च से अतीत होकर मुक्त हो जाता है। जिन्हें साधारणत सिद्धियां कहते हैं, उनको प्राप्त करने का अर्थ है दुनियादारी तथा संसार के जञ्जाल को और भी बढ़ाना। अन्त मे उनसे क्लेश की ही वृद्धि होती है। यह सत्य है कि विज्ञान की दृष्टि को अपनाते हुए पतञ्जलि ने इन सिद्धियों के लाभ की सम्भावना को स्वीकार किया है, पर साथ ही वे इन सब सिद्धियों के प्रलोभन से हमें सावधान करते रहने मे भी कभी नहीं चूके।

फिर, उसी ध्यान मे जब उन भूतों को देश और काल से अलग करके उनके स्वरूप का चिन्तन किया जाता है, तब उस समाधि को निर्वितर्क समाधि कहते हैं। जब और एक कदम आगे बढ़कर तन्मात्राओं को ध्यान का विषय बनाया जाता है और उन्हें देश-काल के अन्तर्गत समझकर उन पर ध्यान किया जाता है, तब उसे सविचार समाधि कहते हैं। फिर जब इसी समाधि में देश-काल के अतीत जाकर उन सूक्ष्म भूतों के स्वरूप का चिन्तन किया जाता है, तब उसे निर्विचार समाधि कहते हैं। इसके बाद का कदम वह है, जिसमे सूक्ष्म और स्थूल दोनों प्रकार के भूतों का चिन्तन छोड़कर अन्त करण को ध्यान का विषय बनाया जाता है। जब अन्त करण को रज और तम इन दोनों गुणों से रहित सोचा जाता है, तब उसे आनन्द समाधि कहते हैं। जब स्वयं मन ध्यान का विषय होता है, जब ध्यान बिलकुल परिपक्व और एकाग्र हो जाता है, जब स्थूल और सूक्ष्म भूतों की समस्त भावनाएँ त्याग दी जाती हैं और जब अन्य सब विषयों से पृथक् होकर अहंकार की केवल सत्त्वावस्था ही शेष रहती है, तब उसे अस्मिता समाधि कहते हैं। इस अवस्था में भी पूर्णतया मन के अतीत होना सम्भव

पातजल-योगसूत्र १४५

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पातजल-योगसूत्र १४५

नही होता। जिस मनुष्य ने इस अवस्था की प्राप्ति कर ली है, उसे वेदो मे 'विदेह' कहा गया है। ऐसा व्यक्ति स्वयं का स्थूल देह से रहित रूप में चिन्तन कर सकता है, पर तो भी उसे स्वयं को एक सूक्ष्मशरीरधारी के रूप मे सोचना ही पडता है। जो लोग इस अवस्था मे रहते हुए, उस परमपद की प्राप्ति बिना किए, प्रकृति मे लीन हो जाते है, उन्हे प्रकृतिलय कहते है, पर जो लोग इस प्रकार के सूक्ष्म भोग-सुख से भी सन्तुष्ट नही होते, वे ही चरम लक्ष्य—मुक्ति— प्राप्त करते है।

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥१८॥

सूत्रार्थ—दूसरे प्रकार की समाधि में समस्त मानसिक क्रियाओ के विराम का सतत अभ्यास किया जाता है, (उसमें व्युत्थान-प्रत्ययहीन) संस्कार-मात्र ही शेष रहता है।

व्याख्या—यही वह पूर्ण ज्ञानातीत असम्प्रज्ञात समाधि है, जो हमें मुक्त कर देती है। पहले जिस समाधि की बात कही गई है, वह हमे मुक्ति नही दे सकती—आत्मा को मुक्त नही कर सकती। भले ही कोई मनुष्य समस्त शक्तियां प्राप्त कर ले, पर तो भी उसका पतन हो सकता है। जब तक आत्मा प्रकृति के अतीत होकर सम्प्रज्ञात समाधि के भी बाहर नही चली जाती, तब तक पतन का भय बना ही रहता है। यद्यपि इसकी साधन-प्रणाली बहुत सरल मालूम होती है, पर इसे प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। यह साधन-प्रणाली ऐसी है कि इसमें स्वयं मन पर ध्यान करना पडता है, और जब कभी कोई विचार उठता है, तो तत्क्षण उसे दबा देना पडता है; मन के अन्दर किसी प्रकार के विचार को स्थान न देकर उसे सम्पूर्णतया शून्य कर देना पड़ता है। जब हम सचमुच यह करने मे समर्थ हो जायेंगे,

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तो बस उसी क्षण हम मुक्त हो जायेंगे। जो लोग पूर्व-साधन या पूर्व-तैयारियाँ किए बिना ही मन को शून्य करने का प्रयत्न करते हैं, उनका मन अज्ञानात्मक तमोगुण से आवृत हो जाता है, और वह उनके मन को आलसी एव अकर्मण्य कर देता है, यद्यपि वे सोचते हैं कि वे मन को शून्य कर रहे हैं। इसके साधन में सचमुच समर्थ होना उच्चतम शक्ति का प्रकाश है—मन को शून्य करने में समर्थ होना यानी सयम की चरमावस्था प्राप्त कर लेना है। जब इस असम्प्रज्ञात या ज्ञानातीत अवस्था की प्राप्ति हो जाती है, तब यह समाधि निर्बीज हो जाती है। समाधि के निर्बीज होने का तात्पर्य क्या है ? सम्प्रज्ञात समाधि मे चित्त-वृत्तियो का केवल दमन भर होता है, पर तब भी वे सस्कार या वीजाकार मे विद्यमान रहती हैं। अवसर पाते ही वे पुन तरगा-कार मे प्रकट हो जाती हैं। पर जब सस्कारो को भी निर्मूल कर दिया जाता है, जब मन को भी लगभग नष्ट कर दिया जाता है, तब समाधि निर्बीज हो जाती है, तब मन मे ऐसा कोई सस्कार-बीज नही रह जाता, जिससे यह जीवन-लता फिर से लहलहा सके, जिससे यह अविराम जन्म-मृत्यु का चक्र और भी घूम सके।

तुम लोग पूछ सकते हो कि वह फिर ऐसी कौनसी अवस्था है, जहाँ मन नही, जिसमें कोई ज्ञान नही ? जिसे हम ज्ञान कहते हैं, वह तो उस ज्ञानातीत अवस्था की तुलना मे एक निम्नतर अवस्था मात्र है। यह हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि किसी विषय की सर्वोच्च और सर्वनिम्न अवस्थाएँ प्राय एक ही प्रकार की मालूम होती हैं। ईथर (आकाश-तत्त्व) का कम्पन मृदुतम होने से उसे अन्धकार कहते हैं, फिर उसका उच्चतम कम्पन भी

पातंजल-योगसूत्र १४७

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पातंजल-योगसूत्र १४७

अन्धकार के समान दिखता है। तो क्या ये दोनो प्रकार के अन्धकार एक ही हैं? नही, उनमे से एक सचमुच अन्धकार है, और दूसरा अत्यन्त तीव्र आलोक, यद्यपि दोनो देखने मे एक ही समान प्रतीत होते है। इसी प्रकार, अज्ञान सबसे निम्नावस्था है और ज्ञान मध्यावस्था। और इस ज्ञान के भी अतीत एक उच्च अवस्था है। पर अज्ञानावस्था और ज्ञानातीत अवस्था दोनों देखने में एक ही समान है। हम जिसे ज्ञान कहते हैं, वह एक उत्पन्न द्रव्य है—एक मिश्र पदार्थ है, वह प्रकृत सत्य नही है।

प्रश्न उठ सकता है, इस उच्चतर समाधि के लगातार अभ्यास का फल क्या होगा? इस अभ्यास के पहले अस्थिरता और जडत्व की ओर हमारे मन की जो एक गति थी, इस अभ्यास से वह तो नष्ट होगी ही, साथ ही सत्प्रवृत्ति का भी नाश हो जायगा। बिना साफ किए हुए सोने मे, मल निकालने के लिए कोई रासायनिक वस्तु मिलाने पर जो कुछ होता है, यहाँ भी ठीक वैसा ही होता है। जब खदान से निकाली हुई अपरिष्कृत धातु को गलाया जाता है, तब जो रासायनिक पदार्थ उसके साथ मिलाए जाते है, वे भी उसके मैल के साथ गल जाते हैं। इसी प्रकार, पूर्वोक्त समाधि के सतत अभ्यास से जो सयम-शक्ति प्राप्त होती है, उससे पहले की असत्-प्रवृत्तियाँ नष्ट हो जाती है और अन्त मे सत्-प्रवृत्तियाँ भी। इस तरह सत् और असत् दोनो प्रकार की वृत्तियो के निरोध से आत्मा सब प्रकार के बन्धनो से विमुक्त हो जाती है और अपनी महिमा मे, सर्व-व्यापी, सर्वशक्तिमान एव सर्वज्ञ रूप से अवस्थित रहती है। तब मनुष्य जान पाता है कि न कभी उसका जन्म था, न मृत्यु; न उसे कभी इहलोक की जरूरत थी, न परलोक की। तब वह

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१४८ राजयोग

जान पाता है कि न वह कहीं से आया था, न कही गया, वह तो प्रकृति थी, जो यहाँ-वहाँ आना-जाना कर रही थी, और प्रकृति की यह हलचल ही आत्मा मे प्रतिबिम्बित हो रही थी। काच मे से प्रतिबिम्बित होकर प्रकाश दीवाल पर पडता है और हिलता-डुलता है। दीवाल मूर्ख के समान शायद सोचती हो कि मै ही हिल-डुल रही हूँ। ठीक ऐसा ही हम सबो के बारे मे भी है, चित्त ही लगातार इधर-उधर जा रहा है, अपने को नाना रूपो मे परिणत कर रहा है, पर हम लोग सोचते हैं कि हमी ये विभिन्न रूप धारण कर रहे है। असम्प्रज्ञात समाधि के अभ्यास से यह सारा अज्ञान दूर हो जायगा। जब वह मुक्त आत्मा कोई आदेश देगी—भिखारी की भाँति प्रार्थना करेगी या माँगेगी नही, वरन् आदेश देगी—तब वह जो कुछ चाहेगी, सब तुरन्त पूर्ण हो जायगा, वह जो कुछ इच्छा करेगी, वही करने मे समर्थ होगी। साख्यदर्शन के मतानुसार ईश्वर का अस्तित्व नही है। यह दर्शन कहता है कि जगत् का कोई ईश्वर नही रह सकता, क्योकि यदि वह रहे, तो अवश्य वह एक आत्मा ही होना चाहिए, और आत्मा या तो बद्ध होगी या मुक्त। जो आत्मा प्रकृति के अधीन है, प्रकृति ने जिस पर अपना आधिपत्य जमा लिया है, वह भला कैसे सृष्टि कर सकेगी ? वह तो स्वय एक दास है। और दूसरी ओर, यदि आत्मा मुक्त हो, तो वह क्योकर इस जगत्-प्रपञ्च की रचना करेगी, क्यो इस पूरे ससार की क्रिया आदि का सचालन करेगी ? उसकी तो कोई अभिलाषा नही रह सकती, अत उसके सृष्टि या जगत्-शासन आदि करने का कोई प्रयोजन नही रह जाता। द्वितीयत, यह साख्यदर्शन कहता है कि ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार करने की

पातंजल-योगसूत्र १४९

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पातंजल-योगसूत्र १४९

कोई आवश्यकता नही है। प्रकृति को मानने से ही जब सभी का स्पष्टीकरण हो जाता है, तो फिर किसी ईश्वर को लाने की आवश्यकता क्या ? कपिल मुनि कहते है कि बहुतसे व्यक्ति ऐसे हैं, जो सिद्धावस्था के नजदीक जाकर भी विभूति-लाभ की वासना पूर्णतया छोडने मे समर्थ न होने के कारण योगभ्रष्ट हो जाते है। उनका मन कुछ काल तक प्रकृति मे लीन होकर रहता है, जब वे पुन पैदा होते है, तब प्रकृति के मालिक होकर आते है। यदि इन्हे ईश्वर कहो, तो ऐसे ईश्वर अवश्य हैं। हम सभी एक समय ऐसा ईश्वरत्व प्राप्त करेगे। साख्यदर्शन के मतानुसार, वेद मे जिस ईश्वर की बात कही गई है, वह ऐसी ही एक मुक्तात्मा का वर्णन मात्र है। इसके अतिरिक्त जगत् का अन्य कोई नित्यमुक्त, आनन्दमय सृष्टिकर्ता नही है। दूसरी ओर, योगीगण कहते है, "नही, ईश्वर है, अन्य सभी आत्माओ से—सभी पुरुषो से अलग एक विशेष पुरुष है, वे समग्र सृष्टि के नित्य प्रभु है, वे नित्यमुक्त हैं और सभी गुरुओ के गुरुस्वरूप है।" साख्यमतवाले जिन्हे प्रकृतिलय कहते है, योगीगण उनका भी अस्तित्व स्वीकार करते हैं। वे कहते है कि ये योगभ्रष्ट योगी है। कुछ समय तक के लिए उनकी चरम लक्ष्य की ओर गति मे बाधा होती है, और उस समय वे जगत के अंशविशेष के अधिपति-रूप से अवस्थान करते है।

भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥१९॥

सूत्रार्थ—( यह समाधि यदि परवैराग्य के साथ अनुष्ठित न हो, तो ) वही देवताओं और प्रकृतिलीनों की पुनरुत्पत्ति का कारण है।

व्याख्या—भारतीय धर्मप्रणालियो में देवता का तात्पर्य है—कुछ उच्चपदस्थ व्यक्ति। भिन्न-भिन्न जीवात्मा एक के बाद

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एक इन पदो की पूर्ति करते है। पर इनमें से कोई भी पूर्ण नही है।

श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥२०॥

सूत्रार्थ—दूसरों को श्रद्धा अर्थात् विश्वास, वीर्य अर्थात् मन का तेज, स्मृति, समाधि अर्थात् एकाग्रता और प्रज्ञा अर्थात् सत्य वस्तु के विवेक से (यह समाधि) प्राप्त होती है।

व्याख्या—जो लोग देवतापद या किसी कल्प के शासन-कर्ता होने की भी कामना नही करते, उन्ही की बात कही जा रही है। वे मुक्ति प्राप्त करते है।

तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥२१॥

सूत्रार्थ--जिनके साधन की गति तीव्र है, उनके लिए (यह योग) शीघ्र (सिद्ध) हो जाता है।

मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः ॥२२॥

सूत्रार्थ—साधन की हल्की, मध्यम और उच्च मात्रा के अनुसार योगियों की सिद्धि में भी भेद हो जाता है।

ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥२३॥

सूत्रार्थ—अथवा ईश्वर के प्रति भक्ति से भी (समाधि सिद्ध होती है)।

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥२४॥

सूत्रार्थ---दुःख, कर्म, कर्मफल और वासना के सम्बन्ध से रहित पुरुषविशेष ईश्वर (परम नियन्ता) है।

व्याख्या—हमे यहाँ फिर से स्मरण करना होगा कि पातञ्जल योगदर्शन सांख्यदर्शन पर स्थापित है। भेद केवल इतना है कि सांख्यदर्शन में ईश्वर का स्थान नही है, जब कि योगीगण ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार करते हैं। ईश्वर को मानने पर भी

पातंजल-योगसूत्र १५१

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पातंजल-योगसूत्र १५१

योगीगण ईश्वर सम्बन्धी सृष्टि-कर्तृत्व आदि विविध भावो की कोई बात नही उठाते। योगियो के ईश्वर से जगत् के सृष्टि-कर्ता ईश्वर का बोध नही होता। वेद के मतानुसार ईश्वर जगत्-स्रष्टा है। वेद का अभिप्राय यह है कि जगत् में जब सामंजस्य देखा जाता है, तो जगत् अवश्य एक इच्छा-शक्ति का ही प्रकाश होगा।

योगीगण ईश्वर का अस्तित्व स्थापित करने के लिए एक नए प्रकार की युक्ति काम मे लाते हैं। वे कहते हैं —

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञत्वबीजम् ॥२५॥

सूत्रार्थ—औरो में जिस सर्वज्ञत्व का बीज मात्र रहता है, वही उनमें निरतिशय अर्थात् अनन्त भाव धारण करता है।

व्याख्या—मन को सदैव अति वृहत् और अति क्षुद्र, इन दो चरम भावो के भीतर ही घूमना पड़ता है। तुम एक ससीम देश की बात भले ही सोचो, पर वही भावना तुम्हारे भीतर असीम देश का भाव भी जगा देगी। यदि आँखे बन्द करके तुम एक छोटेसे देश के बारे मे सोचो, तो देखोगे, उस छोटेसे देशरूप वृत्त के साथ ही उसके चारो ओर अमर्यादित विस्तारवाला एक दूसरा वृत्त भी है। काल के बारे मे भी ठीक यही बात है। मान लो, तुम एक सेकण्ड समय के बारे मे सोच रहे हो। तो उसके साथ-ही-साथ तुमको अनन्त काल की भी बात सोचनी पड़ेगी। ज्ञान के बारे मे भी ठीक ऐसा ही समझना चाहिए। मनुष्य मे ज्ञान का केवल बीज-भाव है; पर इस क्षुद्र ज्ञान की बात मन मे लाने के साथ ही अनन्त ज्ञान के बारे मे भी सोचना पड़ेगा। इस प्रकार, हमारे मन की गठन से ही यह बिलकुल स्पष्ट है कि एक अनन्त ज्ञान है। इस अनन्त ज्ञान को ही योगीगण ईश्वर कहते हैं।

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१५२ राजयोग

स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥२६॥

सूत्रार्थ—वे प्राचीन गुरुगणों के भी गुरु हैं, क्योकि वे काल से सीमित नहीं हैं।

व्याख्या—यह सत्य है कि समस्त ज्ञान हमारे भीतर ही निहित है, पर उसे एक दूसरे ज्ञान के द्वारा जागृत करना पडता है। यद्यपि जानने की शक्ति हमारे अन्दर ही विद्यमान है, फिर भी हमे उसे जगाना पडता है। और योगियो के मतानुसार, ज्ञान को इस प्रकार जगाना अर्थात् ज्ञान का उन्मेष एक दूसरे ज्ञान के सहारे ही हो सकता है। अचेतन जड पदार्थ ज्ञान का विकास कभी नही करा सकता—केवल ज्ञान की शक्ति से ही ज्ञान का विकास होता है। हमारे अन्दर जो ज्ञान है, उसको जगाने के लिए ज्ञानी पुरुषो का हमारे पास रहना सदैव आवश्यक है। यही कारण है कि इन गुरुओ की आवश्यकता सदा ही बनी रही है। जगत् कभी भी इन आचार्यों से रहित नही हुआ। उनकी सहायता बिना कोई भी ज्ञान नही आ सकता। ईश्वर सारे गुरुओ के भी गुरु हैं, क्योकि ये सब गुरु कितने ही उन्नत क्यो न रहे हो, वे देवता या स्वर्गदूत ही क्यो न रहे हो, पर वे सब-के-सब बद्ध थे और काल से सीमित थे, किन्तु ईश्वर काल से आबद्ध नही है। योगियो के दो विशेष सिद्धान्त हैं। एक तो यह कि सान्त वस्तु की भावना करते ही मन बाध्य होकर अनन्त की भी बात सोचेगा, और यदि उस मानसिक अनुभूति का एक भाग सत्य हो, तो उसका दूसरा भाग भी अवश्यमेव सत्य होगा। क्यो ? इसलिए कि जब दोनो उस एक ही मन की अनुभूतियाँ है, तो दोनो अनुभूतियो का मूल्य समान ही होगा। मनुष्य का ज्ञान अल्प है अर्थात् मनुष्य अल्पज्ञ है—

पातंजल-योगसूत्र १५३

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पातंजल-योगसूत्र १५३

इसी से जाना जाता है कि ईश्वर का ज्ञान अनन्त है, ईश्वर अनन्तज्ञानसम्पन्न है। यदि हम इन दोनो अनुभूतियो मे से एक को ग्रहण करे, तो दूसरे को भी क्यो न ग्रहण करेगे? युक्ति तो कहती है—या तो दोनो को मान लो, या फिर दोनो को ही छोड़ दो। यदि में विश्वास करूँ कि मनुष्य अल्पज्ञानसम्पन्न है, तो मुझे यह भी अवश्य मानना पडेगा कि उसके पीछे कोई असीमज्ञानसम्पन्न पुरुष है। दूसरा सिद्धान्त यह है कि गुरु बिना कोई भी ज्ञान नही हो सकता। आजकल के दार्शनिको का जो कथन है कि मनुष्य का ज्ञान उसके स्वय के भीतर से उत्पन्न होता है, यह सच है, सारा ज्ञान मनुष्य के भीतर ही विद्यमान है, पर उस ज्ञान के विकास के लिए कुछ अनुकूल परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। हम गुरु बिना कोई ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। अब बात यह है कि यदि मनुष्य, देवता अथवा कोई स्वर्गदूत हमारे गुरु हो, तो वे भी तो ससीम हैं, फिर उनसे पहले उनके गुरु कौन थे? हमे मजबूर होकर यह चरम सिद्धान्त स्थिर करना ही होगा कि एक ऐसे गुरु है, जो काल के द्वारा सीमाबद्ध या अवच्छिन्न नही हैं। उन्ही अनन्त ज्ञानसम्पन्न गुरु को, जिनका आदि भी नही और अन्त भी नही, ईश्वर कहते है।

तस्य वाचकः प्रणवः ॥२७॥

सूत्रार्थ—प्रणव अर्थात् ओकार उनका वाचक (प्रकाशक) है।

व्याख्या—तुम्हारे मन में जो भी भाव उठता है, उसका एक प्रतिरूप शब्द भी रहता है, इस शब्द और भाव को अलग नही किया जा सकता। एक ही वस्तु के बाहरी भाग को शब्द और अन्तर्भाग को विचार या भाव कहते हैं। कोई भी व्यक्ति

१५४ राजयोग

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विश्लेषण के बल से विचार को शब्द से अलग नहीं कर सकता। बहुतो का मत है कि कुछ लोग एक साथ बैठकर यह स्थिर करने लगे कि किस भाव के लिए कौनसे शब्द का प्रयोग किया जाय, और इस प्रकार भाषा की उत्पत्ति हो गई। किन्तु यह प्रमाणित हो चुका है कि यह मत भ्रमात्मक है। जब से मनुष्य विद्यमान है, तब से शब्द और भाषाएँ रही हैं। अब बात यह है कि एक भाव और एक शब्द मे परस्पर क्या सम्बन्ध है। यद्यपि हम देखते है कि एक भाव के साथ एक शब्द का रहना अनिवार्य है, तथापि ऐसा नहीं कि एक भाव एक ही शब्द द्वारा प्रकाशित हो। बीस विभिन्न देशो मे भाव एक ही होने पर भी भाषाएँ बिलकुल भिन्न-भिन्न हो सकती है। प्रत्येक भाव को प्रकट करने के लिए एक-न-एक शब्द की आवश्यकता अवश्य होगी, किन्तु इस एक भाव के प्रकाशक शब्दो का एक ही उच्चारण-विशिष्ट होना कोई आवश्यक नहीं। विभिन्न देशो मे भिन्न-भिन्न उच्चारण-विशिष्ट शब्दो का व्यवहार होगा। इसीलिए टीकाकार ने कहा है, "यद्यपि भाव और शब्द का परस्पर सम्बन्ध स्वाभाविक है तथापि एक शब्द और एक भाव के बीच एक नितान्त अलङ्घनीय सम्बन्ध ही रहे, ऐसी कोई बात नही।" * यद्यपि ये सब शब्द भिन्न-भिन्न होते है, तो भी शब्द और भाव का परस्पर सम्बन्ध स्वाभाविक है। यदि वाच्य और वाचक के बीच प्रकृत सम्बन्ध रहे, तभी यह कहा जा सकता है कि भाव और शब्द के बीच परस्पर सम्बन्ध है। यदि ऐसा न हो, तो वह वाचक शब्द कभी


* 'सर्वे एव शब्दा सर्वाकारार्थाभिधानसमर्था—इति स्थित एतैषा सर्वकारितैः स्वाभाविक. सम्बन्ध ।'—व्यासभाष्य की वाचस्पतिमिश्र-कृत टीका।

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पातंजल-योगसूत्र १५५:

सर्वसाधारण के उपयोग मे नही आ सकता। वाचक वाच्यपदार्थ का प्रकाशक होता है। यदि वह वाच्य वस्तु पहले से अस्तित्व में रहे, और हम यदि पुन-पुन परीक्षा द्वारा यह देखे कि उस वाचक शब्द ने उस वस्तु को अनेक बार सूचित किया है, तो हम निश्चित रूप से यह मान सकते है कि उस वाच्य और वाचक के बीच एक यथार्थ सम्बन्ध है। यदि ये वाच्यपदार्थ न भी रहे, तो भी हजारो मनुष्य उनके वाचको के द्वारा ही उनका ज्ञान प्राप्त करेंगे। पर हां, वाच्य और वाचक के बीच एक स्वाभाविक सम्बन्ध रहना अनिवार्य है। ऐसा होने पर, ज्योही उस वाचक-शब्द का उच्चारण किया जायगा, त्योही वह उस वाच्यपदार्थ की बात मन में ला देगा। सूत्रकार कहते है, ओकार ईश्वर का वाचक है। सूत्रकार ने विशेष रूप से 'ॐ' शब्द का ही उल्लेख क्यो किया है ? 'ईश्वर'—इस भाव को व्यक्त करने के लिए तो सैकडो शब्द है। एक भाव के साथ हजारो शब्दो का सम्बन्ध रहता है। 'ईश्वर'—इस भाव का सैकडो शब्दो के साथ सम्बन्ध है और उनमे से प्रत्येक ही तो ईश्वर का वाचक है। फिर उन्होने 'ॐ' को ही क्यो चुना ? हां, ठीक है, पर वैसा होने पर भी उन शब्दो मे से एक सामान्य शब्द चुन लेना चाहिए। उन सारे वाचको का एक सामान्य आधार निकालना होगा, और जो वाचक-शब्द सबका सामान्य वाचक होगा, वही सर्वश्रेष्ठ समझा जायगा, और वास्तव में वही उसका यथार्थ वाचक होगा। किसी शब्द के उच्चारण के लिए हम कण्ठ नली और तालु का शब्द-उच्चारण के आधार-रूप मे व्यवहार करते हैं। क्या ऐसा कोई भौतिक शब्द है, जिसकी कि अन्य सब शब्द अभिव्यक्ति हैं, जो स्वभावत ही दूसरे सब शब्दो को समझा-

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३५६ राजयोग

सकता है? हाँ, 'ओम्' (अउम्) ही वह शब्द है, वही सारे शब्दो की भित्तिस्वरूप है। उसका प्रथम अक्षर 'अ' सभी शब्दो का मूल है—वह सारे शब्दो की कुजी के समान है, वह जिह्वा या तालु के किसी अंश को स्पर्श किए बिना ही उच्चारित होता है। 'म' समस्त शब्दो का अन्तिम शब्द है, उसका उच्चारण करने में दोनो ओठो को बन्द करना पडता है। और 'उ' शब्द जिह्वा के मूल से लेकर मुख के मध्यवर्ती शब्दाधार की अन्तिम सीमा तक मानो ढुलकता आता है। इस प्रकार 'ॐ' शब्द के द्वारा शब्दोच्चारण की सम्पूर्ण क्रिया प्रकट हो जाती है। अतएव वही स्वाभाविक वाचक-शब्द है, वही सब विभिन्न शब्दो की जननीस्वरूप है। जितने प्रकार के शब्द उच्चारित हो सकते है—हमारी ताकत मे जितने प्रकार के शब्द-उच्चारण की सम्भावना है, 'ओम्' उन सभी का सूचक है। यह सब तात्त्विक चर्चा छोड देने पर भी, हम देखते है कि भारतवर्ष में जितने सारे विभिन्न धर्मभाव है, यह ओंकार उन सबका केन्द्रस्वरूप है, वेद के सब विभिन्न धर्मभाव इस ओंकार का ही अवलम्बन किए हुए हैं। अब प्रश्न यह है कि इसके साथ अमेरिका, इगलैण्ड और अन्यान्य देशो का क्या सम्बन्ध है ? उत्तर यह है कि सब देशों मे इस ओंकार का व्यवहार हो सकता है। कारण, भारतवर्ष में धर्म के विकास की प्रत्येक अवस्था मे—उसके प्रत्येक सोपान में ओंकार को अपनाया गया है, उसका आश्रय लिया गया है और वह ईश्वर सम्बन्धी सारे विभिन्न भावो को व्यक्त करने के लिए व्यवहृत हुआ है। अद्वैतवादी, द्वैतवादी, द्वैताद्वैतवादी, भेद-वादी, यहाँ तक कि नास्तिको ने भी अपने उच्चतम आदर्श को प्रकट करने के लिए इस ओंकार का अवलम्बन किया था।

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पातंजल-योगसूत्र १५७

मानव-जाति के अधिकांश के लिए यह ओंकार उनकी अपनी धार्मिक स्पृहा का एक प्रतीक बन गया है। अतएव अन्य सब देशो की विभिन्न जातियां भी इसका अवलम्बन कर सकती है। अँगरेजी गॉड (God) शब्द को लो। वह जिस भाव को प्रकट करता है, वह कोई अधिक दूर तक नही जा सकता। यदि तुम उसके अतिरिक्त अन्य कोई भाव उस शब्द से व्यक्त करने की इच्छा करो, तो तुम्हे उसमे विशेषण लगाना पडेगा—जैसे Personal (सगुण), Impersonal (निर्गुण), Absolute (निर्विशेष) आदि-आदि। अन्य दूसरी भाषाओ मे ईश्वर-वाचक जो सब शब्द हैं, उनके बारे मे भी यही बात घटती है, उनमे बहुत कम भाव प्रकट करने की शक्ति है, किन्तु 'ॐ' शब्द मे ये सभी प्रकार के भाव विद्यमान है। अतएव सर्वसाधारण को उसका ग्रहण करना चाहिए।

तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥२८॥

**सूत्रार्थ—**इस (ओंकार) का जप और उसके अर्थ का ध्यान (समाधि-लाभ का उपाय है)।

**व्याख्या—**जप अर्थात् बारम्बार उच्चारण की आवश्यकता क्या है? हम सस्कार-विषयक मतवाद को न भूले होगे, हमे स्मरण होगा कि समस्त सस्कारो की समष्टि हमारे मन में विद्यमान है। ये सस्कार क्रमश सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होकर अव्यक्त भाव धारण करते है। पर वे बिलकुल लुप्त नही हो जाते, वे मन के अन्दर ही रहते है, और ज्योही उन्हे यथोचित स्फूर्ति मिलती है, बस त्योही वे मानस-सरोवर की सतह पर उठ आते हैं। परमाणु-कम्पन कभी बन्द नही होता। जब यह सारा ससार नाश को प्राप्त होता है, तब सब बड़े-बड़े कम्पन या प्रवाह लुप्त

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हो जाते हैं, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पृथ्वी, सभी लय को प्राप्त हो जाते है, पर परमाणुओं मे का कम्पन बच रहता है। इन बड़े बड़े ब्रह्माण्डो मे जो कार्य होता है, प्रत्येक परमाणु वही कार्य करता है। ठीक ऐसा ही चित्त के बारे मे भी है। चित्त में होनेवाले सब कम्पन अदृश्य अवश्य हो जाते हैं, फिर भी परमाणु के कम्पन के समान उनकी सूक्ष्म गति अक्षुण्ण बनी रहती है, और ज्योही उन्हे कोई स्फूर्ति मिलती है, बस त्योही वे पुन बाहर आ जाते है। अब हम समझ सकेगे कि जप अर्थात् वारम्वार उच्चारण का तात्पर्य क्या है। हम लोगो के अन्दर जो धर्म के सस्कार हैं, उन्हे विशेष रूप से बल देने मे यह प्रधान सहायक है।

"क्षणमिह सज्जनसंगतिरेका। भवति भवार्णवतरणे नौका।"*

—साधुओं की एक क्षण की भी संगति भवसागर पार होने के लिए नौका-स्वरूप है। सत्संग की ऐसी जबरदस्त शक्ति है! बाह्य सत्संग की जैसी शक्ति बतलाई गई है, वैसी ही आन्तरिक सत्संग की भी है। इस ओंकार का बारम्बार जप करना और उसके अर्थ का मनन करना ही आन्तरिक सत्संग है। जप करो और उसके साथ उस शब्द के अर्थ का ध्यान करो। ऐसा करने से, देखोगे, हृदय मे ज्ञानालोक आयगा और आत्मा प्रकाशित हो जायगी।

'ॐ' शब्द पर मनन तो करोगे ही, पर साथ ही उसके अर्थ पर भी मनन करो। कुसंगति छोड़ दो, क्योकि पुराने घाव के चिह्न अभी भी बने हुए है, उन पर कुसंगति की गर्मी लगने भर की देर है कि बस वे फिर से ताजे हो उठेंगे। ठीक इसी प्रकार हम लोगो मे जो उत्तम सस्कार है, वे भले ही अभी अव्यक्त हो, पर


* शंकराचार्यकृत मोहमुद्गर, ५।

पातंजल-योगसूत्र १५९

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पातंजल-योगसूत्र १५९

सत्संग से वे फिर से जागरित हो जायँगे—व्यवत भाव धारण कर लेगे। संसार मे सत्सग से पवित्र और कुछ भी नहीं है, क्योकि सन्सग से ही शुभ संस्कारो के जागरित होने का सुयोग उपस्थित होता है—वे सब शुभ सस्कार चित्तरूपी सरोवर की तली से ऊपरी सतह पर उठ आते हैं।

ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥२९॥

सूत्रार्थ—उससे अन्तर्दृष्टि प्राप्त होती है और (योग के) विघ्नों का नाश होता है।

व्याख्या—इस ओंकार के जप और चिन्तन का पहला फल यह देखोगे कि क्रमश अन्तर्दृष्टि विकसित होने लगेगी और योग के मानसिक एव शारीरिक विघ्नसमूह दूर होते जायँगे। योग के ये विघ्न कौन-कौनसे हैं ?

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥३०॥

सूत्रार्थ—रोग, मानसिक जडता, सन्देह, उद्यमशून्यता, आलस्य, विषय-तृष्णा, मिथ्या अनुभव, एकाग्रता न पाना, और उसे पाने पर भी उसका न ठहरना—ये जो चित्त के विक्षेप हैं, वे ही विघ्न हैं।

व्याख्या—व्याधि—इस जीवन-समुद्र के उस पार जाने के लिए यह शरीर ही एकमात्र नाव है। इसे स्वस्थ रखने के लिए विशेष यत्न करना चाहिए। जिसका शरीर अस्वस्थ है, वह योगी नही हो सकता। मानसिक जडता आने पर हमारा योगविषयक सारा अनुराग जाता रहता है। और इस अनुराग के अभाव मे, साधन करने के लिए जिस दृढ सकल्प एव शक्ति का रहना आवश्यक है, उसका कुछ भी शेष नही रह जाता। हमारा इस विषय मे विचारजनित विश्वास कितना भी क्यों