Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages
Page 118Permalink

ध्यान और समाधि १०१

सभी इस अवस्था की प्राप्ति कर लेगे। इस अवस्था को प्राप्त करना ही धर्म है। केवल प्रत्यक्ष अनुभूति के द्वारा यथार्थ शिक्षा-लाभ होता है। हम लोग भले ही सारे जीवनभर तर्क-विचार करते रहे, पर स्वयं प्रत्यक्ष अनुभव किए बिना हम सत्य का कण मात्र भी न समझ सकेंगे। कुछ पुस्तके पढ़ाकर तुम किसी मनुष्य से अस्त्र-चिकित्सक बनने की आशा नहीं कर सकते। तुम केवल एक नक्शा दिखाकर देश देखने का मेरा कौतूहल पूरा नहीं कर सकते। स्वयं वहाँ जाकर उस देश को प्रत्यक्ष देखने पर ही मेरा कौतूहल पूरा होगा। नक्शा केवल इतना कर सकता है कि वह देश के बारे में और भी अधिक अच्छी तरह से जानने की इच्छा उत्पन्न कर देगा। बस इसके अतिरिक्त उसका और कोई मूल्य नहीं। सिर्फ पुस्तको पर निर्भर रहने से मानव-मन केवल अवनति की ओर जाता है। यह कहने से और घोर नास्तिकता क्या हो सकती है कि ईश्वरीय ज्ञान केवल इस पुस्तक में या उस शास्त्र में आबद्ध है ? मनुष्य इधर तो भगवान को अनन्त कहता है, और उधर एक छोटेसे ग्रन्थ में उन्हें आबद्ध कर रखना चाहता है !" क्या गर्व ! पोथी पर विश्वास नहीं किया इसलिए लाखो आदमी मार डाले गए ! एक ही ग्रन्थ में सारा ईश्वरीय ज्ञान निबद्ध है, इस पर विश्वास न करने से सहस्रो लोग मौत के घाट उतार दिए गए ! भले ही आज उस हत्या आदि का समय नहीं रहा, पर फिर भी अभी तक जगत् इस ग्रन्थ-विश्वास मे ही आबद्ध है।

ठीक वैज्ञानिक उपाय से ज्ञानातीत अवस्था को प्राप्त करने के लिए, मैं तुम्हें राजयोग के बारे में जो उपदेश दे रहा हूँ, उनमे से प्रत्येक की साधना मे से तुम्हे जाना पड़ेगा। पहले के

१०२ राजयोग

Page 119Permalink

१०२ राजयोग

भाषण में प्रत्याहार और धारणा के सम्बन्ध में बताया गया है। अब ध्यान के बारे में चर्चा करूँगा।

देह के भीतर या उसके बाहर किसी स्थान में मन को कुछ समय तक स्थिर रखने की पुन-पुन चेष्टा करते रहने से, उसको उस दिशा में अविच्छिन्न गति से प्रवाहित होने की शक्ति प्राप्त होगी। इस अवस्था का नाम है ध्यान। जब ध्यानशक्ति इतनी तीव्र हो जाती है कि मन अनुभूति के बाहरी भाग को छोड़कर केवल उसके अन्तर्भाग या अर्थ की ही ओर सम्पूर्ण रूप से जाता है, तब उस अवस्था का नाम है समाधि। धारणा, ध्यान और समाधि इन तीनों को एक साथ लेने से संयम कहते हैं। अर्थात् यदि किसी का मन पहले किसी वस्तु में एकाग्र हो सकता है, फिर उस एकाग्रता की अवस्था में कुछ समय तक रह सकता है और उसके बाद ऐसी दीर्घ एकाग्रता की अवस्था में वह अनुभूति के केवल आभ्यन्तरिक भाग पर, जिसका कि वह वस्तु बाह्य प्रकाश है, अपने आपको लगाए रख सकता है, तो सभी कुछ ऐसे शक्तिसम्पन्न मन के वशीभूत हो जाता है।

Page 120Permalink

ध्यान और समाधि १०३

पास प्रकृति के ये विभिन्न परिवर्तन एक महासौन्दर्य और उदात्त भाव की छवि मात्र हैं।

इन तत्त्वो को ध्यान मे जान लेना आवश्यक है। मान लो, मैने एक शब्द सुना। पहले बाहर से एक कम्पन आया, उसके बाद स्नायविक गति उस कम्पन को मन के पास ले गई, फिर मन से एक प्रतिक्रिया हुई और उसके साथ ही साथ मुझे बाह्य वस्तु का ज्ञान हुआ। यह बाह्य वस्तु ही आकाशीय कम्पन से लेकर मानसिक प्रतिक्रिया तक सब भिन्न-भिन्न परिवर्तनो का कारण है। योगशास्त्र मे इन तीनो को क्रमशः शब्द, अर्थ और ज्ञान कहते हैं। शरीरविधानशास्त्र की भाषा मे उन्हे आकाशीय कम्पन, स्नायु और मस्तिष्क मे की गति तथा मानसिक प्रतिक्रिया कहते है। ये तीनो प्रतिक्रियाएँ सम्पूर्ण अलग होने पर भी इस समय इस तरह मिली हुई हैं कि उनका भेद समझा नही जाता। हम यथार्थ मे अभी उन तीनो मे से किसी का भी अनुभव नही कर सकते, अभी तो उनके सम्मिलन के फलस्वरूप केवल बाह्य वस्तु का अनुभव करते है। प्रत्येक अनुभव-क्रिया में ये तीन व्यापार होते हैं। हम भला उन्हे अलग क्यो न कर सकेंगे ?

प्रथमोक्त योगांगो के अभ्यास से मन जब दृढ और संयत हो जाता है तथा सूक्ष्मतर अनुभव की शक्ति प्राप्त करता है, तब उसे ध्यान मे लगाना चाहिए। पहले-पहल स्थूल वस्तु को लेकर ध्यान करना चाहिए। फिर क्रमश सूक्ष्म से सूक्ष्मतर ध्यान में हमारा अधिकार होगा, और अन्त में हम विषयशून्य अर्थात् निर्विकल्प ध्यान मे सफल हो जायंगे। मन को पहले अनुभूति के बाह्य कारण अर्थात् विषय का, फिर स्नायुओ में होनेवाली

'१०४ राजयोग

Page 121Permalink

'१०४ राजयोग

गति का और उसके बाद उसकी अपनी प्रतिक्रियाओ का अनुभव करने के लिए नियुक्त करना होगा। जब मन अनुभूति के बाह्य उपकरणो अर्थात् विषयो को पृथक् रूप से जान सकेगा, तब उसमे समस्त सूक्ष्म भौतिक पदार्थों, सारे सूक्ष्म शरीरो और सूक्ष्म रूपो को जानने की शक्ति आ जायगी। जब वह भीतर मे होनेवाली गतियो को दूसरे सभी विषयो से अलग करके, उनके अपने स्वरूप में, जानने मे समर्थ होगा, तब वह सारी चित्त-वृत्तियो पर उनके भौतिक शक्ति के रूप मे परिणत होने से पूर्व ही अधिकार चला सकेगा,—फिर वे चित्तवृत्तियाँ चाहे स्वय अपनी हो, चाहे दूसरो की। और जब योगी केवल मानसिक प्रतिक्रिया का उसके अपने स्वरूप में अनुभव करने मे समर्थ होगे, तब वे सर्व पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कर लेगे, क्योकि इन्द्रिय-गोचर प्रत्येक वस्तु, यहाँ तक कि प्रत्येक विचार भी, इस मानसिक प्रतिक्रिया का ही फल है। ऐसी अवस्था प्राप्त होने पर योगी अपने मन की मानो नींव तक का अनुभव कर लेते हैं, और तब मन उनके सम्पूर्ण वश में आ जाता है। योगी के पास तब नाना प्रकार की अलौकिक शक्तियाँ (सिद्धियाँ) आने लगती है, पर यदि वे इन सब शक्तियो को प्राप्त करने के लिए लालायित हो उठे, तो उनकी भविष्य उन्नति का रास्ता रुक जाता है। भोग के पीछे दौडने से इतना अनर्थ होता है ! किन्तु यदि वे इन सब अलौकिक शक्तियो को भी छोड सके, तो वे मनरूप समुद्र-मे उठनेवाले समस्त वृत्ति-प्रवाहो को पूर्णतया रोकने में समर्थ हो सकेगे। और यही योग का चरम लक्ष्य है। तभी, मन के नाना प्रकार के विक्षेप एव नाना प्रकार की दैहिक गतियो से विचलित न होकर आत्मा की महिमा अपनी पूर्ण ज्योति से

Page 122Permalink

ध्यान और समाधि १०५

प्रकाशित होगी। तब योगी ज्ञानघन, अविनाशी और सर्वव्यापी रूप से अपने स्वरूप को उपलब्धि करेंगे, और जान लेंगे कि वे अनादि काल से ऐसे ही हैं।

इस समाधि मे प्रत्येक मनुष्य का, यही नहीं, प्रत्येक प्राणी का अधिकार है। सबसे निम्नतर प्राणी से लेकर अत्यन्त उन्नत देवता तक सभी, कभी-न-कभी, इस अवस्था को अवश्य प्राप्त करेंगे, और जब किसी को यह अवस्था प्राप्त हो जायगी, तभी हम कहेगे कि उसने यथार्थ धर्म की प्राप्ति की है। तो फिर हम इस समय जो कर रहे हैं, ये सब क्या है ? इनके सहारे हम उस अवस्था की ओर लगातार अग्रसर हो रहे हैं। जो धर्म नहीं मानता, उसमें और हममें अभी कोई विशेष अन्तर नहीं। कारण, अतीन्द्रिय तत्त्वो के बारे में हमारी कोई प्रत्यक्ष अनुभूति नही है। इस एकाग्रता की साधना का उद्देश्य है प्रत्यक्षानुभूति प्राप्त करना। इस समाधि को प्राप्त करने के प्रत्येक अंग पर गम्भीर रूप से विचार किया गया है, उसे विशेष रूप से नियमित, श्रेणी-बद्ध और वैज्ञानिक प्रणाली मे सम्बद्ध किया गया है। यदि साधना ठीक-ठीक हो और पूर्ण निष्ठा के साथ की जाय, तो वह अवश्य हमे यथार्थ लक्ष्यस्थल पर पहुँचा देगी। और तब सारे दुःख-कष्ट नष्ट हो जायेंगे, कर्म का बीज दग्ध हो जायगा और आत्मा चिरकाल के लिए मुक्त हो जायगी।


अष्टम अध्याय

Page 123Permalink

अष्टम अध्याय

संक्षेप में राजयोग

( कूर्मपुराण, एकादश अध्याय से उद्धृत । )

योगाग्नि मनुष्य के पाप-पिंजर को दग्ध कर देती है। तब सत्त्वशुद्धि होती है और साक्षात् निर्वाण की प्राप्ति होती है। योग से ज्ञानलाभ होता है, ज्ञान फिर योगी की मुक्ति के पथ का सहायक है। जिनमें योग और ज्ञान दोनों ही वर्तमान हैं, ईश्वर उनके प्रति प्रसन्न होते हैं। जो लोग प्रतिदिन एक बार, दो बार, तीन बार या सारे समय महायोग का अभ्यास करते हैं, उन्हें देवता समझना चाहिए। योग दो प्रकार के हैं, जैसे — अभावयोग और महायोग। जब शून्य तथा सब प्रकार के गुण से रहित रूप से अपना चिन्तन किया जाता है, तब उसे अभावयोग कहते हैं। और जिस योग के द्वारा आत्मा का आनन्दपूर्ण, पवित्र और ब्रह्म के साथ अभिन्न रूप से चिन्तन किया जाता है, उसे महायोग कहते हैं। योगी इनमें से प्रत्येक के द्वारा ही आत्म-साक्षात्कार कर लेते हैं। हम दूसरे जिन योगों के बारे में शास्त्रों में पढ़ते या सुनते हैं, वे सब योग इस ब्रह्मयोग के — जिस ब्रह्मयोग में योगी अपने को तथा सारे जगत् को साक्षात् भगवत्-स्वरूप देखते हैं — एक अंश के बराबर भी नहीं हो सकते। यही सारे योगों में श्रेष्ठ है।

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि — ये राजयोग के विभिन्न अंग या सोपान हैं। यम का अर्थ है — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। इस यम से चित्तशुद्धि होती है। शरीर, मन और वचन के द्वारा

संक्षेप में राजयोग [१०७]

Page 124Permalink

संक्षेप में राजयोग [१०७]

कभी किसी प्राणी की हिंसा न करना या उन्हे क्लेश न देना—यह अहिंसा कहलाता है। अहिंसा से बढकर और धर्म नही। मनुष्य के लिए जीव के प्रति यह अहिंसा-भाव रखने से अधिक और कोई उच्चतर सुख नही है। सत्य से सब कुछ मिलता है, सत्य में सब कुछ प्रतिष्ठित है। यथार्थ कथन को ही सत्य कहते है। चोरी से या बलपूर्वक दूसरे की चीज को न लेने का नाम है अस्तेय। तन-मन-वचन से सर्वदा सब अवस्थाओ मे मैथुन का त्याग ही ब्रह्मचर्य है। अत्यन्त कष्ट के समय मे भी किसी मनुष्य से कोई उपहार ग्रहण न करने को अपरिग्रह कहते है। अपरिग्रह-साधना का उद्देश्य यह है कि किसी से कुछ लेने से हृदय अपवित्र हो जाता है, लेनेवाला हीन हो जाता है, वह अपनी स्वतंत्रता खो बैठता है और बद्ध एव आसक्त हो जाता है।

तप, स्वाध्याय, सन्तोष, शौच और ईश्वरप्रणिधान—इन्हे नियम कहते हैं। नियम शब्द का अर्थ है नियमित अभ्यास और व्रत-परिपालन। व्रतोपवास या अन्य उपायो से देह-सयम करना शारीरिक तपस्या कहलाता है। वेद-पाठ या दूसरे किसी मन्त्रोच्चारण को सत्त्वशुद्धिकर स्वाध्याय कहते है। मन्त्र जपने के लिए तीन प्रकार के नियम है—वाचिक, उपांशु और मानस। वाचिक से उपांशु जप श्रेष्ठ है और उपांशु से मानस जप। जो जप इतने ऊँचे स्वर से किया जाता है कि सभी सुन सकते हैं, उसे वाचिक जप कहते हैं। जिस जप मे ओठो का स्पन्दन मात्र होता है, पर पास रहनेवाला कोई मनुष्य सुन नही सकता, उसे उपांशु कहते है। और जिसमें किसी शब्द का उच्चारण नही होता, केवल मन-ही-मन जप किया जाता है और उसके साथ उस मन्त्र का अर्थ स्मरण किया जाता है, उसे मानसिक जप कहते

Page 125Permalink

१०८ | राजयोग

है। यह मानसिक जप ही सबसे श्रेष्ठ है। ऋषियों ने कहा है—शौच दो प्रकार के हैं, बाह्य और आभ्यन्तर। मिट्टी, जल या दूसरी वस्तुओं से शरीर को शुद्ध करना बाह्य शौच कहलाता है, जैसे—स्नानादि। सत्य एवं अन्यान्य धर्मों के पालन से मन की शुद्धि को आभ्यन्तर शौच कहते हैं। बाह्य और आभ्यन्तर दोनों ही शुद्धि आवश्यक है। केवल भीतर में पवित्र रहकर बाहर में अशुचि रहने से शौच पूरा नहीं हुआ। जब कभी दोनों प्रकार के शौच का अनुष्ठान करना सम्भव न हो, तब आभ्यन्तर शौच का अवलम्बन ही श्रेयस्कर है। पर ये दोनों शौच हुए बिना कोई भी योगी नहीं बन सकता। ईश्वर की स्तुति, स्मरण और पूजा-अर्चनारूप भक्ति का नाम ईश्वरप्रणिधान है।

यह तो यम और नियम के बारे में हुआ। उसके बाद है आसन। आसन के बारे में इतना ही समझ लेना चाहिए कि वक्ष स्थल, ग्रीवा और सिर को सीधे रखकर शरीर को स्वच्छन्द भाव से रखना होगा। अब प्राणायाम के बारे में कहा जायगा। प्राण का अर्थ है अपने शरीर के भीतर रहनेवाली जीवनी-शक्ति, और आयाम का अर्थ है उसका संयम। प्राणायाम तीन प्रकार के हैं—अधम, मध्यम और उत्तम। वह तीन भागों में विभक्त हैं, जैसे—पूरक, कुम्भक और रेचक। जिस प्राणायाम में १२ सेकण्ड तक वायु का पूरण किया जाता है, उसे अधम प्राणायाम कहते हैं। २४ सेकण्ड तक वायु का पूरण करने से मध्यम प्राणायाम, और ३६ सेकण्ड तक वायु का पूरण करने से उत्तम प्राणायाम कहते हैं। अधम प्राणायाम से पसीना, मध्यम प्राणायाम से कम्पन और उत्तम प्राणायाम से उच्छ्वास अर्थात् शरीर का हल्कापन एवं चित्त की प्रसन्नता होती है। गायत्री वेद का पवित्रतम मन्त्र

संक्षेप में राजयोग १०९

Page 126Permalink

संक्षेप में राजयोग १०९

है। उसका अर्थ है, "हम इस जगत् के जन्मदाता परम देवता के तेज का ध्यान करते हैं, वे हमारी बुद्धि मे ज्ञान का विकास कर दे।" इस मन्त्र के आदि और अन्त मे प्रणव लगा हुआ है। एक प्राणायाम मे गायत्री का तीन बार मन-ही-मन उच्चारण करना पड़ता है। प्रत्येक शास्त्र मे कहा गया है कि प्राणायाम तीन अंशो मे विभक्त है—जैसे, रेचक अर्थात् श्वास-त्याग, पूरक अर्थात् श्वास-ग्रहण और कुम्भक अर्थात् स्थिति—भीतर मे धारण करना। अनुभवशक्तियुक्त इन्द्रियाँ लगातार बहिर्मुखी होकर काम कर रही हैं और बाहर की वस्तुओं के सम्पर्क मे आ रही हैं। उनको अपने वश मे लाने को प्रत्याहार कहते हैं। अपनी ओर खींचना या आहरण करना—यही प्रत्याहार शब्द का प्रकृत अर्थ है।

हृत्कमल मे या सिर के ठीक मध्य देश में या शरीर के अन्य किसी स्थान मे मन को धारण करने का नाम है धारणा। मन को एक स्थान मे संलग्न करके, फिर उस एकमात्र स्थान को अवलम्बनस्वरूप मानकर एक विशिष्ट प्रकार के वृत्ति-प्रवाह उठाए जाते हैं, दूसरे प्रकार के वृत्ति-प्रवाहों से उनको बचाने का प्रयत्न करते-करते वे प्रथमोक्त वृत्ति-प्रवाह क्रमश प्रबल आकार धारण कर लेते हैं, और ये दूसरे वृत्ति-प्रवाह कम होते-होते अन्त मे बिलकुल चले जाते हैं। फिर बाद मे उन प्रथमोक्त वृत्तियों का भी नाश हो जाता है और केवल एक वृत्ति वर्तमान रह जाती है। इसे 'ध्यान' कहते हैं। और जब इस अवलम्बन की भी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, सम्पूर्ण मन जब एक तरंग के रूप मे परिणत हो जाता है, तब मन की इस एकरूपता का नाम है समाधि। तब किसी विशेष प्रदेश या चक्रविशेष का

Page 127Permalink

११० राजयोग

अवलम्बन करके ध्यान-प्रवाह उत्थापित नही होता, केवल ध्येय वस्तु का भाव (अर्थ) मात्र अवशिष्ट रहता है। यदि मन को किसी स्थान मे १२ सेकण्ड धारण किया जाय, तो उससे एक धारणा होगी, यह धारणा द्वादश गुणित होने पर एक ध्यान, और यह ध्यान द्वादश गुणित होने पर एक समाधि होगी।

सूखे पत्तो से ढकी हुई जमीन पर, चौराहे पर, अत्यन्त कोलाहलपूर्ण या डरावने स्थान मे, दीमक के ढेर के समीप, अथवा जहाँ अग्नि या जल से किसी भय की आशङ्का हो, जहाँ जंगली जानवर हो, जो स्थान दुष्ट लोगो से भरा हो—ऐसे स्थानो मे योग की साधना करना उचित नही। यह व्यवस्था ‘विशेषकर भारत के बारे मे लागू होती है। जब शरीर अत्यन्त आलसी या बीमार मालूम होता हो अथवा जब मन अत्यन्त दुःखपूर्ण रहता हो, तब भी साधना नही करनी चाहिए। किसी गुप्त और निर्जन स्थान मे जाकर साधना करो, जहाँ लोग तुम्हे वाधा पहुँचाने न आ सके। अपवित्र जगह मे बैठकर साधना मत करना, वरन् सुन्दर दृश्यवाले स्थान मे या अपने घर की एक सुन्दर कोठरी में बैठकर साधना करना। साधना मे प्रवृत्त होने के पहले समस्त प्राचीन योगियो, अपने गुरुदेव तथा भगवान को प्रणाम करना और फिर साधना मे प्रवृत्त होना।

ध्यान का विषय पहले ही कहा जा चुका है। अब ध्यान की कुछ प्रणालियाँ वर्णित की जाती हैं। सीधे बैठकर अपनी नाक के ऊपरी भाग पर दृष्टि रखो। तुम देखोगे ‘कि उससे मन की स्थिरता में विशेष रूप से सहायता मिलती है। आँख के दो स्नायुओ को वश में लाने से प्रतिक्रिया के केन्द्रस्थल को काफी वश में लाया जा सकता है,

संक्षेप में राजयोग १११

Page 128Permalink

संक्षेप में राजयोग १११

अतः उससे इच्छाशक्ति भी बहुत अधीन हो जाती है। अब ध्यान के कुछ प्रकार कहे जाते हैं। सोचो, सिर के ऊर्ध्व देश मे एक कमल है, धर्म उसका मूलदेश है, ज्ञान उसकी नाल है, योगी की अष्टसिद्धियाँ उस कमल के आठ दलो के समान हैं और वैराग्य उसके अन्दर की कर्णिका है। जो योगी अष्टसिद्धियाँ आने पर भी उनको छोड़ सकते है, वे ही मुक्ति प्राप्त करते हैं,। इसीलिए अष्टसिद्धियो का बाहर के आठ दलों के रूप मे, तथा अन्दर की कर्णिका का परवैराग्य अर्थात् अष्टसिद्धियाँ आने पर भी उनके प्रति वैराग्य के रूप मे वर्णन किया गया है। इस कमल के अन्दर हिरण्मय, सर्वशक्तिमान्, अस्पर्श्य, ओकारवाच्य, अव्यक्त, किरणो से परिव्याप्त परमज्योति का चिन्तन करो। उस पर ध्यान करो।

और एक प्रकार के ध्यान का विषय बताया जाता है— सोचो कि तुम्हारे हृदय में एक आकाश है, और उस आकाश के अन्दर अग्निशिखा के समान एक ज्योति उद्भासित हो रही है— उस ज्योतिशिखा का अपनी आत्मा के रूप में चिन्तन करो, फिर उस ज्योति के अन्दर और एक ज्योतिर्मय आकाश की भावना करो; वही तुम्हारी आत्मा की आत्मा है— परमात्म-स्वरूप ईश्वर है। हृदय में उसका ध्यान करो। ब्रह्मचर्य, अहिंसा, महाशत्रु को भी क्षमा कर देना, सत्य, आस्तिक्य— ये सब विभिन्न व्रत हैं। यदि इन सबमें तुम सिद्ध न रहो, तो भी दुखित या भयभीत मत होना। प्रयत्न करो, धीरे-धीरे सब हो जायगा। विषय की लालसा, भय और क्रोध छोड़कर जो भगवान के शरणागत हुए हैं, उनमें तन्मय हो गए हैं, जिनका हृदय पवित्र हो गया है, वे भगवान के पास जो कुछ चाहते हैं, भगवान उसी

११२ राजयोग

Page 129Permalink

११२ राजयोग

समय उसकी पूर्ति कर देते है। अत ज्ञान, भक्ति या वैराग्य योग से उनकी उपासना करो।

"जो किसी की हिंसा नही करते, जो सबके मित्र हैं, जो सबके प्रति करुणासम्पन्न है, जिनका अहकार चला गया है, जो सदैव सन्तुष्ट है, जो सर्वदा योगयुक्त, यतात्मा और दृढ निश्चय-वाले हैं, जिनका मन और बुद्धि मुझमे अर्पित हो गई है, वे ही मेरे प्रिय भक्त हैं। जिनसे लोग उद्विग्न नही होते, जो लोगो से उद्विग्न नही होते, जिन्होने अतिरिक्त हर्ष, दुख, भय और उद्वेग त्याग दिया है, ऐसे भक्त ही मेरे प्रिय हैं। जो किसी का भरोसा नही करते, जो शुचि और दक्ष है, सुख और दुख मे उदासीन है, जिनका दुख चला गया है, जो निन्दा और स्तुति मे समभावपन्न हैं, मौनी है, जो कुछ पाते हैं, उसी मे सन्तुष्ट रहते है, जिनका कोई निर्दिष्ट घर-बार नही, सारा जगत् ही जिनका घर है,-जिनकी बुद्धि स्थिर है, ऐसे व्यक्ति ही मेरे प्रिय भक्त है।"† ऐसे व्यक्ति ही योगी हो सकते हैं।

* * * *

नारद नाम के एक पहुँचे हुए ऋषि थे। जैसे मनुष्यो में ऋषि या बडे-बडे योगी रहते हैं, वैसे ही देवताओ में भी बडे-बडे योगी है। नारद भी वैसे ही एक महायोगी थे। वे सर्वत्र भ्रमण किया करते थे। एक दिन एक वन मे से जाते हुए उन्होने देखा कि एक मनुष्य ध्यान कर रहा है। वह ध्यान में इतना मग्न है और इतने दिनो से एक ही आसन पर बैठा है कि उसके चारों ओर दीमक का ढेर लग गया है। उसने नारद से पूछा, "प्रभो, आप कहाँ जा रहे है?" नारदजी ने उत्तर दिया, "मै वैकुण्ठ-


† गीता, १२।१३-१९

Page 130Permalink

संक्षेप में राजयोग

११३

जा रहा हूँ।” तब उसने कहा, “अच्छा, आप भगवानसे पूछते आएँ, वे मुझ पर कब कृपा करेंगे, मैं कब मुक्ति प्राप्त करूँगा।” फिर कुछ दूर और जाने पर नारदजी ने एक दूसरे मनुष्य को देखा। वह कूद-फाँद रहा था, कभी नाचता था तो कभी गाता था। उसने भी नारदजी से वही प्रश्न किया। उस व्यक्ति का कण्ठस्वर, वाग्भंगी आदि सभी उन्मत्त के समान थे। नारदजी ने उसे भी पहले के समान उत्तर दिया। वह बोला, “अच्छा, तो भगवान से पूछते आएँ, मैं कब मुक्त होऊँगा।” लौटते समय नारदजी ने दीमक के ढेर के अन्दर रहनेवाले उस ध्यानस्थ योगी को देखा। उस योगी ने पूछा, “देवर्षे, क्या आपने मेरी बात पूछी थी?” नारदजी बोले, “हाँ, पूछी थी।” योगी ने पूछा, “तो उन्होंने क्या कहा?” नारदजी ने उत्तर दिया, “भगवान ने कहा, ‘मुझको पाने के लिए उसे और चार जन्म लगेंगे।’” तब तो वह योगी घोर विलाप करते हुए कहने लगा, “मैंने इतना ध्यान किया है कि मेरे चारो ओर दीमक का ढेर लग गया, फिर भी मुझे और चार जन्म लेने पडेंगे।” नारदजी तब दूसरे व्यक्ति के पास गए। उसने भी पूछा, “क्या आपने मेरी बात भगवान से पूछी थी?” नारदजी बोले, “हाँ, भगवान ने कहा है, ‘उसके सामने जो इमली का पेड है, उसके जितने पत्ते हैं, उतनी बार उसको जन्म ग्रहण करना पडेगा।’” यह बात सुनकर वह व्यक्ति आनन्द से नृत्य करने लगा और बोला, “मैं इतने कम समय में मुक्ति प्राप्त करूँगा!” तब एक दैववाणी हुई “वत्स, तुम इसी क्षण मुक्ति प्राप्त करोगे।” वह दूसरा व्यक्ति इतना अध्यवसायसम्पन्न था! इसीलिए उसे वह पुरस्कार मिला। वह इतने जन्म साधना करने के लिए तैयार था। कुछ

Page 131Permalink

११४ राजयोग

भी उसे उद्योगशून्य न कर सका। परन्तु वह प्रथमोक्त व्यक्ति चार जन्मो की ही बात सुनकर घबड़ा गया। जो व्यक्ति मुक्ति के लिए सैकड़ो युग तक बाट जोहने को तैयार था, उसके समान अध्यवसायसम्पन्न होने पर ही उच्चतम फल प्राप्तं होता है।


Page 132Permalink

पातंजल-योगसूत्र

(मूल संस्कृत सूत्र, सूत्रार्थ और व्याख्या सहित)

व्याख्याकार

स्वामी विवेकानन्द

Page 133Permalink
<!-- Blank or illustration plate: Page 133 -->
Page 134Permalink

पातंजल-योगसूत्र

उपक्रमणिका

योगसूत्रों को हाथ में लेने से पहले मैं एक ऐसे प्रश्न की मीमांसा करने का प्रयत्न करूँगा, जिस पर योगियों के सारे धार्मिक मत प्रतिष्ठित हैं। ऐसा मालूम पड़ता है कि संसार के सभी श्रेष्ठ मनीषियों का इस बात में एकमत है— और यह बात भौतिक प्रकृति के अनुसन्धान से भी एक प्रकार से प्रमाणित ही हो गई है— कि हम लोग अपने वर्तमान सविशेष (सापेक्ष) भाव के पीछे विद्यमान एक निर्विशेष (निरपेक्ष) भाव के बाहरी प्रकाश एवं व्यक्त रूप हैं, और हम फिर से उसी निर्विशेष भाव मे लौटने के लिए लगातार अग्रसर हो रहे हैं। यदि यह बात स्वीकार कर ली जाय, तो प्रश्न यह उठता है कि वह निर्विशेष अवस्था श्रेष्ठतर है अथवा यह वर्तमान अवस्था ? संसार में ऐसे लोगो की कमी नहीं, जो समझते हैं कि यह व्यक्त अवस्था ही मनुष्य की सबसे ऊँची अवस्था है। कई चिन्तन-शील मनीषियों का मत है कि हम एक निर्विशेष सत्ता के व्यक्त रूप हैं, और यह सविशेष अवस्था निर्विशेष अवस्था से श्रेष्ठ है। वे सोचते हैं कि निर्विशेष सत्ता मे कोई गुण नहीं रह सकता, अतः वह अवश्य अचेतन है, जड़ है, प्राणशून्य है, और यह सोचकर वे धारणा कर लेते हैं कि केवल इस जीवन मे ही सुख-भोग सम्भव है, अतएव इस जीवन के सुख में ही हमें आसक्त रहना चाहिए। अब हम पहले देखें, इस जीवन-समस्या के और कौन-कौन से समाधान हैं, पहले उनके बारे मे चर्चा की जाय। इस सम्बन्ध में एक प्राचीन सिद्धान्त यह था कि मनुष्य मरने के

Page 135Permalink

११८ राजयोग

वाद, जैसा पहले था वैसा ही रहता है, केवल उसके सारे अशुभ चले जाते हैं और उनके स्थान पर उसका जो कुछ अच्छा है, वही अनन्त काल के लिए बच रहता है। यदि तर्कसंगत भाषा में इस सत्य को रखा जाय, तो वह ऐसा रूप लेता है—यह जगत् ही मनुष्य की चरम गति है और इस जगत् की ही कुछ उच्चावस्था को, जहाँ उसके सारे अशुभ निकल जाते हैं और केवल शुभ-ही-शुभ बच रहता है, स्वर्ग कहते हैं। यही पूर्वोक्त मतावलम्बियों का चरम लक्ष्य है। यह बड़ी आसानी से समझा जा सकता है कि यह मत नितान्त असंगत और बच्चों की बात के समान है, क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि भला है, पर बुरा नहीं है, अथवा बुरा है, पर भला नहीं। जहाँ कुछ भी बुरा नहीं है, सब भला-ही-भला है, ऐसे जगत् में वास करने की कल्पना, भारतीय नैयायिकों के अनुसार, दिवा-स्वप्न देखना है। फिर, एक और मतवाद आजकल के बहुत से सम्प्रदायों से सुना जाता है, वह यह कि मनुष्य लगातार उन्नति कर रहा है, चरम लक्ष्य तक पहुँचने की सतत कोशिश कर रहा है, किन्तु कभी भी वहाँ तक पहुँच न सकेगा। यह मत ऊपर से सुनने में तो बड़ा युक्तिसंगत मालूम होता है, पर यह भी वस्तुतः बिलकुल असंगत ही है, क्योंकि कोई भी गति एक सरल रेखा में नहीं होती। प्रत्येक गति वर्तुलाकार में ही होती है। यदि तुम एक पत्थर लेकर आकाश में फेंको, उसके बाद यदि तुम्हारा जीवन काफी हो और पत्थर के मार्ग में कोई बाधा न आए, तो घूमकर वह ठीक तुम्हारे हाथ में वापस आ जायगा। यदि एक सरल रेखा अनन्त दूरी तक फैला दी जाय, तो वह अन्त में एक वृत्त का रूप धारण कर लेगी। अतएव यह मत कि

पातंजल-योगसूत्र १११९

Page 136Permalink

पातंजल-योगसूत्र १११९

मनुष्य की गति सदैव अनन्त उन्नति की ओर है—उसका कही भी अन्त नही, सर्वथा असगत है। प्रसग के थोडा बाहर होने पर भी में अब इस पूर्वोक्त मत के वारे में दो-एक बाते कहूँगा। नीतिशास्त्र कहते है, किसी के भी प्रति घृणा मत करो—सबको प्यार करो। नीतिशास्त्र के इस सत्य का स्पष्टीकरण पूर्वोक्त मत से हो जाता है। जैसे विद्युत्-शक्ति के वारे मे आधुनिक मत यह है कि वह विद्युदाधार (dynamo) से बाहर निकल, घूमकर फिर से उसी यन्त्र मे लौट आती है, यहाँ भी ठीक वैसा ही है। प्रकृति की समस्त शक्तियो के वारे मे यह नियम लागू होता है। सभी शक्तियां, घूम-फिरकर, जिस स्थान से निकली थी ठीक वही वापस आ जायँगी। अतएव किसी से घृणा करना उचित नही, क्योकि यह शक्ति—यह घृणा, जो तुममे से वहिर्गत होगी, घूमकर कालान्तर मे फिर तुम्हारे ही पास वापस आ जायगी। यदि तुम मनुष्यो को प्यार करो, तो वह प्यार घूम-फिरकर तुम्हारे पास ही लौट आयगा। यह सोलहो आने सत्य है कि मनुष्य के मन से घृणा की जो कुछ मात्रा बाहर निकलती है, वह अन्त में उसी के पास लौट आकर अपनी पूरी शक्ति से उस पर आक्रमण करती है। कोई भी इसकी गति रोक नही सकता। प्यार के वारे मे भी ऐसा ही है। हम और भी अन्यान्य प्रत्यक्ष बातो पर आधारित बहुतसी युक्तियों से यह प्रमाणित कर सकते है कि यह अनन्त उन्नति सम्बन्धी मत ठहर नही सकता। हम तो यह प्रत्यक्ष देखते हैं कि सारी भौतिक वस्तुओ की एक ही अन्तिम गति है, और वह है विनाश। अतएव अनन्त उन्नतिवाला मत किसी भी प्रकार टिक नही सकता। हमारे ये सारे सघर्ष, सारी आशाएँ, भय और सुख—

१२० राजयोग

Page 137Permalink

१२० राजयोग

इन सबका आखिर परिणाम क्या है ? मृत्यु ही हम सबकी चरम गति है। इससे अधिक ठहरी हुई बात और कुछ भी नही हो सकती। तब फिर यह सरल रेखा मे गति कहाँ रही ? यह अनन्त उन्नति कहाँ रही ? यह तो केवल थोडी दूर जाना है और फिर से उस केन्द्र मे लौट आना है, जहाँ से गति शुरु होती है। देखो, नीहारिका (nebulae) से किस प्रकार सूर्य्य, चन्द्रमा और तारे पैदा होते हैं, और फिर से उसी मे समा जाते हैं। ऐसा ही सर्वत्र हो रहा है। पेड-पौधे मिट्टी से ही सार ग्रहण करते हैं और सड-गलकर फिर से मिट्टी मे ही मिल जाते है। इस ससार में जितने भी रूपवान पदार्थ है, सब अपने चारो ओर वर्तमान परमाणुओ से पैदा होकर फिर से उन परमाणुओ मे ही मिल जाते हैं।

यह कभी हो नही सकता कि एक ही नियम अलग-अलग स्थानो में अलग-अलग रूप से कार्य करे। नियम सर्वत्र ही समान है। इससे अधिक निश्चित बात और कुछ नही हो सकती। यदि यही प्रकृति का नियम हो, तो वह अन्तर्जगत् पर क्यो नही लागू होगा ? मन भी अपने उत्पत्ति-स्थान में जाकर लय को प्राप्त करेगा। हम चाहे या न चाहे, हमे अपने उस आदि कारण में लौट ही जाना पडेगा, जिसे ईश्वर या निरपेक्ष सत्ता कहते हैं। हम ईश्वर से आए हैं, और पुन ईश्वर में ही लौट जायेंगे। इस ईश्वर को फिर किसी भी नाम से क्यो न पुकारो—गॉड (God) कहो, निरपेक्ष सत्ता कहो, प्रकृति कहो अथवा अन्य किसी भी नाम से क्यो न सम्बोधित करो—सब एक ही बात है। 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्यभि-संविशन्ति'*—'जिनसे सब पैदा हुए हैं, जिनमें उत्पन्न हुए


* तैत्तिरीय उपनिषद् ३।१