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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

१८० राजयोग

Page 197Permalink

१८० राजयोग

को निगल लेती है, उसी प्रकार एक लहर को इतनी प्रवल बनाना होगा, जिससे अन्य सब लहरे बिलकुल लुप्त हो जायें। जब केवल एक ही लहर बच रहेगी, तब उसका भी निरोध कर देना सहज हो जायगा। और जब वह भी चली जाती है, तब उस समाधि को निर्बीज समाधि कहते हैं। तब और कुछ भी नही बच रहता और आत्मा अपने स्वरूप मे, अपनी महिमा मे प्रकाशित हो जाती है। तभी हम जान पाते हैं कि आत्मा मिश्र पदार्थ नही है, ससार मे एकमात्र वही नित्य अमिश्र पदार्थ है, अतएव उसका जन्म भी नही है और मृत्यु भी नही—वह अमर है, अविनश्वर है, नित्य चैतन्यघन सत्तास्वरूप है।