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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

१२० राजयोग

Page 137Permalink

१२० राजयोग

इन सबका आखिर परिणाम क्या है ? मृत्यु ही हम सबकी चरम गति है। इससे अधिक ठहरी हुई बात और कुछ भी नही हो सकती। तब फिर यह सरल रेखा मे गति कहाँ रही ? यह अनन्त उन्नति कहाँ रही ? यह तो केवल थोडी दूर जाना है और फिर से उस केन्द्र मे लौट आना है, जहाँ से गति शुरु होती है। देखो, नीहारिका (nebulae) से किस प्रकार सूर्य्य, चन्द्रमा और तारे पैदा होते हैं, और फिर से उसी मे समा जाते हैं। ऐसा ही सर्वत्र हो रहा है। पेड-पौधे मिट्टी से ही सार ग्रहण करते हैं और सड-गलकर फिर से मिट्टी मे ही मिल जाते है। इस ससार में जितने भी रूपवान पदार्थ है, सब अपने चारो ओर वर्तमान परमाणुओ से पैदा होकर फिर से उन परमाणुओ मे ही मिल जाते हैं।

यह कभी हो नही सकता कि एक ही नियम अलग-अलग स्थानो में अलग-अलग रूप से कार्य करे। नियम सर्वत्र ही समान है। इससे अधिक निश्चित बात और कुछ नही हो सकती। यदि यही प्रकृति का नियम हो, तो वह अन्तर्जगत् पर क्यो नही लागू होगा ? मन भी अपने उत्पत्ति-स्थान में जाकर लय को प्राप्त करेगा। हम चाहे या न चाहे, हमे अपने उस आदि कारण में लौट ही जाना पडेगा, जिसे ईश्वर या निरपेक्ष सत्ता कहते हैं। हम ईश्वर से आए हैं, और पुन ईश्वर में ही लौट जायेंगे। इस ईश्वर को फिर किसी भी नाम से क्यो न पुकारो—गॉड (God) कहो, निरपेक्ष सत्ता कहो, प्रकृति कहो अथवा अन्य किसी भी नाम से क्यो न सम्बोधित करो—सब एक ही बात है। 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्यभि-संविशन्ति'*—'जिनसे सब पैदा हुए हैं, जिनमें उत्पन्न हुए


* तैत्तिरीय उपनिषद् ३।१