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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages
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सन्दिग्धेषु च कार्येषु द्वयोर्विवदमानयोः।
श्रुतदृष्टानुभूतार्थान् साक्षिभ्यो व्यक्तिदर्शनम्॥ 147 ॥
वादी-प्रतिवादी के मध्य किसी विषय पर मतभेद हो जाने पर दोनों में लेन
देन होने के समय उपस्थित प्रत्यक्षदर्शी अथवा दोनों में बातचीत कराने वाले अथवा
इस विषय से परिचित साक्षियों को सब कुछ यथावत् बताकर संशय अथवा सन्देह
का निराकरण कर देना चाहिए।
समक्षदर्शनात्साक्षी विज्ञेयः श्रोत्रचक्षुषोः।
श्रोत्रस्य यत् परो ब्रूते चक्षुषोर्दर्शनं स्वयंम्॥ 148॥
दो पक्षों में किये जाने वाले किसी समझौते की चर्चा कानों से सुनी जाती है
और चर्चा करने वालों को आंखों से देखा जाता है। इस प्रकार अपने कानों से सुनने
वाला तथा अपने नेत्रों से देखने वाला साक्षी कहलाता है। ऐसे साक्षी का साक्ष्य भी
प्रमाण होता है।
एकादशविधः साक्षी शास्त्रदृष्टो मनीषिभिः।
कृतः पञ्चविधस्तेषां षड्विधोऽकृत उच्यते॥ 149॥
विधिशास्त्र के तत्त्ववेत्ता मनीषियों ने साक्षियों के ग्यारह भेद स्वीकार किये हैं
और उन ग्यारह में से पांच भेदों को 'कृत,' अर्थात् स्वयं स्वीकृत (मनोनीत) तथा
छह भेदों को 'अकृत' माना है।
लिखितः स्मारितश्चैव यदृच्छाभिज्ञ एव च।
गूढश्चोत्तरसाक्षी च साक्षी पञ्चविधः कृतः॥ 150॥
पांच 'कृत' साक्षी निम्नोक्त रूप से हैं-

  1. लिखित- लिखित ऋण पत्र पर हस्ताक्षर करने वाला।
  2. स्मारित- अपने कानों से सुने वचनों को उद्धृत करने वाला।
  3. यदृच्छाभिज्ञ- व्यवहार के समय बिना बुलाये अपनी इच्छा से आने
    और सारी घटना की जानकारी रखने वाला।
  4. गूढ़- छिपकर सारी बातचीत को सुनने देखने वाला तथा
  5. उत्तरसाक्षी- कानों में भनक पड़ने की (Over hear) कहने वाला।
    षडेते पुनरुद्दिष्टाः साक्षिणस्त्वकृताः स्वयम्।
    ग्रामश्च प्राड्विवाकश्च राजा च व्यवहारिणाम्॥ 151॥
    कार्येष्वभ्यन्तरो यः स्यादर्थिना प्रहितश्च यः।
    कुल्याः कुलविवादेषु भवेयुस्तेऽपि साक्षिणः॥ 152॥
    छह अकृत साक्षी निम्नोक्त रूप से हैं-
  6. ग्राम- ग्राम के मध्य घटित घटना का सारा ग्राम ही साक्षी रहता है, ग्राम
    से अभिप्राय है ग्रामीण व्यक्ति।
    नारदस्मृति / 103
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  1. प्राङ्-विवाक — धर्म से सम्बन्धित विवाद में शास्त्र के साक्ष्य को उद्धृत
    करने वाला धर्माधिकारी।
  2. राजा — न्यायाधिकारियों अथवा प्रशासकों की उपस्थिति में घटित घटना
    का साक्ष्य प्रशासन ही होता है।
  3. सम्बद्ध व्यक्ति — कार्य-विशेष के लिए नियुक्त अथवा प्रेरित व्यक्ति,
    दास, मित्र, बन्धु अथवा अन्य कोई परिचित-अपरिचित व्यक्ति।
  4. भीतरी व्यक्ति — घर का कोई मूकदर्शक व्यक्ति तथा
  5. वंश का व्यक्ति — विवाद की जानकारी रखने वाला। उपर्युक्त छह
    व्यक्ति साक्षी के रूप में मनोनीत तो नहीं किये जाते, फिर भी साक्षी बन सकते हैं।
    कुलीना ऋजवः शुद्धा जन्मतः कर्मतोऽर्थतः।
    त्र्यवराः साक्षिणोऽनिन्द्याः शुचयः शुद्धबुद्धयः ॥ 153 ॥
    निम्नोक्त गुणों से सम्पन्न एक, दो अथवा तीन व्यक्तियों को साक्षी बनाना
    चाहिए—1. कुलीन, अर्थात् उच्च कुलोत्पन्न, 2. ऋजु, अर्थात् स्वभाव से सरल,
    छल कपट रहित, 3. जन्म से पवित्र आचरण वाले, उत्तम आजीविका वाले तथा
    कर्म से नितान्त शुद्ध-पवित्र, अर्थात् लोभरहित। 4. अनिन्दित, अर्थात् लोक में
    प्रतिष्ठित एवं कीर्तिमान्, 5. शुद्ध बुद्धि, अर्थात् विचारों की उच्चता के साथ शुद्ध
    आचरण वाले।
    ब्राह्मणाः क्षत्रियाः वैश्याः शूद्रा ये चाप्यनिन्दिताः ।
    प्रतिवर्णं भवेयुस्ते सर्वे सर्वेषु वास्मृताः ॥ 154 ॥
    अनिन्दित चरित्र एवं शुद्ध आचरण वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र
    अपने-अपने वर्ण और अपनी-अपनी जाति के लोगों के साक्षी बन जाते हैं।
    वस्तुतः अपने वर्ण-जाति के लोगों को ही साक्षी बनाना अच्छा रहता है।
    श्रेणीषु श्रेणीपुरुषाः स्वेषु वर्गेषु वर्गिणः।
    बहिर्वासिषु बाह्याः स्युः स्त्रियः स्त्रीषु च साक्षिणः ॥ 155 ॥
    श्रेणियों के विवादों में श्रेणी पुरुषों का, वर्गों के विवादों में वर्ग के पुरुषों का
    बाह्य क्षेत्रों के विवादों में बाहरी लोगों का तथा स्त्रियों के विवादों में स्त्रियों का
    साक्षी होना ही वाञ्छनीय रहता है; क्योंकि अपनी जाति वालों में एक प्रकार से
    प्रकृतिगत एकात्मकता रहती है।
    श्रेण्यादिषु च सर्वेषु कश्चिच्चेद् द्वेष्यतामियात्।
    तेभ्य एव न साक्ष्यं स्याद् द्वेष्टारः सर्व एव ते ॥ 156 ॥
    श्रेणी अथवा वर्ग आदि के विवादों में साक्षी रहने वाले व्यक्ति के द्वेषग्रस्त,
    अथवा पूर्वाग्रह से युक्त हो जाने पर उसकी साक्षी बनने की पात्रता समाप्त हो जाती
    है। साक्षी का तटस्थ होना उसकी अनिवार्य योग्यता है। उसे तो अपने कानों से सुने
    104 / नारदस्मृति
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का तथा आंखों से देखे का यथावत् वर्णन करना है, परिणाम की चिन्ता नहीं करनी
है। व्यक्ति-विशेष के प्रति द्वेष भाव रखने वाला व्यक्ति साक्षि-धर्म का निर्वाह कर
ही नहीं सकता। अतः ऐसे व्यक्ति को कभी साक्षी नहीं बनाना चाहिए।
असाक्ष्यपि हि शास्त्रेऽस्मिन् दृष्टः पञ्चविधो बुधैः ।
वचनादोषतो भेदान् स्वयमुक्तिर्मृत्तान्तरः ॥ 157 ॥
विधिवेत्ता पण्डितों ने असाक्षो—साक्षी न बनने योग्य—व्यक्तियों के निम्नोक्त
पांच रूप-भेद माने हैं—

  1. अपने वचन से मुकरने वाला, अर्थात् साक्ष्य भरने की स्वीकृति देकर
    समय आने पर मुकर जाने वाला अथवा कहने योग्य तथ्य न कहने वाला अथवा
    अपने ही कथन को सही न कर पाने वाला, अर्थात् किसी एक बात पर स्थिर न
    रहने वाला।
  2. दोषग्रस्त—शारीरिक रूप से पंगु -काणा, बधिर अथवा अन्य किसी
    विकार से ग्रस्त अथवा चारित्रिक रूप से लाञ्छित।
  3. भेद-बुद्धि रखने वाला व्यक्ति, अर्थात् एक के सामने कुछ और दूसरे के
    सामने कुछ और कहने वाला व्यक्ति।
  4. अपने आपको साक्ष्य के लिए प्रस्तुत करने वाला व्यक्ति। निश्चित है कि
    ऐसा व्यक्ति या तो स्वार्थ-प्रेरित है या धूर्त है। वह या तो आपके विरोधी का विरोधी
    है या फिर आप से कुछ पाना चाहता है।
  5. मृत व्यक्ति।
    श्रोत्रियास्तापसा वृद्धा ये च प्रव्रजिता नराः ।
    असाक्षिणस्ते वचनान्नात्र हेतुरुदाहृतः ॥ 158 ॥
    निम्नोक्त चार—1. वेदपाठी ब्राह्मण, 2. तपस्वी, 3. वृद्ध, चलने-फिरने आदि
    में असमर्थ तथा 4. संन्यासी—को कभी साक्षी नहीं बनाना चाहिए। इसके कारण
    के निर्देश की आवश्यकता नहीं; क्योंकि स्पष्ट है कि एक तो ये लोग विरक्त प्रकृति
    के होते हैं, इन्हें सांसारिक झंझटों से लगाव नहीं होता, इसलिए ये किसी भी समय
    न्यायालय में उपस्थित होने से इनकार कर सकते हैं। द्वितीय, ये सीधे-सादे व्यक्ति
    वकील और न्यायाधीश के उलटे सीधे प्रश्नों का सामना करने में असमर्थ होते हैं।
    अतः ये कुछ का कुछ कह सकते हैं। तृतीय, न्यायालय में इनका उपस्थित होना
    इनके लिए शोभनीय भी नहीं होता।
    स्तेनाः साहसिकार्च्चण्डाः कितवा बधकाश्च ये।
    असाक्षिणस्ते दुष्टत्वात्तेषु सत्यं न विद्यते ॥ 159 ॥
    निम्नोक्त पांच प्रकार के व्यक्ति समाज द्वारा अवहेलित, कलंकित और दुश्चरित्र
    होने के कारण साक्षी होने योग्य नहीं, अर्थात् इन्हें साक्षी नहीं बनाना चाहिए। ये
    लोग किसी भी समय धोखा दे सकते हैं—
    नारदस्मृति / 105
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  1. स्तेन (चोर), 2. साहसिक (डाकू-डंके की चोट पर दूसरों को लूटने
    वाला), 3. क्रूर दया ममता रहित, अत्याचारी एवं आततायी, अर्थात् अकारण-
    सकारण किसी की हत्या करने में भी संकोच न करने वाला, 4. धूर्त एवं शठ,
    अर्थात् दूसरों को तंग परेशान करने को ही अपना मनोरंजन मानने वाला तथा
  2. हिंसक, अर्थात् जीवहत्या करने वाला।
    ऐसे दुष्टों का वचन कभी विश्वसनीय नहीं होता। अतः इन्हें साक्षी बनाना
    कदापि उचित नहीं।
    राज्ञा परिगृहीतेषु साक्षिष्वेकार्थनिश्चये।
    वचनं यत्र भिद्येत ते स्युर्भेदादसाक्षिणः ॥ 160 ॥
    राग द्वेष से अथवा लोभ-लालच से किसी भी समय अपने वचन से मुकर
    जाने वाले तथा न्यायालय के बाहर कुछ और न्यायालय के भीतर कुछ कहने वाले,
    अर्थात् अस्थिर प्रकृति के, आसानी से बिक जाने वाले तथा धर्म को महत्त्व न देने
    वाले व्यक्तियों को भी साक्षी नहीं बनाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति भी साक्षी बनने योग्य
    नहीं होते।
    अनिर्दिष्टस्तु साक्षित्वे स्वयमेवैत्य यो वदेत्।
    शुचीत्युक्तः स शास्त्रेषु न स साक्षित्वमर्हति ॥ 161 ॥
    शास्त्रों के अनुसार घटना के समय उपस्थित न रहने वाला, अर्थात् प्रत्यक्षदर्शी
    तथा प्रत्यक्षश्रोता न होने पर भी साक्ष्य देने के लिए अपनी सहमति जतलाने वाले
    व्यक्ति को भी अपात्र ही मानना चाहिए। ऐसे व्यक्ति का आचरण धर्मविरुद्ध होने के
    कारण उसका साक्ष्य सर्वथा अनुचित एवं अग्राह्य समझना चाहिए।
    योऽर्थः श्रावयितव्यः स्यात्तस्मिन्नसति चार्थिनि ।
    कुतस्तद्वतु साक्षित्वमित्यसाक्षी मृतान्तरः ॥ 162 ॥
    व्यवहार के विचार के समय जीवित व्यक्ति ही अपने साक्ष्य के द्वारा सत्य पर
    प्रकाश डाल सकता है। मृत व्यक्ति तो कुछ कहने के लिए नहीं आ सकता। मृत
    व्यक्ति के स्थान पर कोई दूसरा व्यक्ति मृत व्यक्ति के मुख से बोले और अपने कान
    से सुने वचन के आधार पर मृतक का स्थानापन्न, अर्थात् उसका प्रतिनिधि बनकर
    साक्ष्य नहीं दे सकता। ऐसे व्यक्ति को भी साक्षी नहीं बनाना चाहिए।
    द्वयोर्विवदतोरर्थे द्वयोः सत्सु च साक्षिषु।
    पूर्वपक्षो भवेद्यस्य भवेयुस्तस्य साक्षिणः ॥ 163 ॥
    दोनों-पूर्वपक्ष अथवा वादी तथा उत्तरपक्ष अथवा प्रतिवादी-द्वारा अपने-
    अपने पक्ष में साक्षियों को प्रस्तुत करने में पूर्वपक्ष के साक्षियों के साक्ष्य को ही
    वरीयता देनी चाहिए।
    106 / नारदस्मृति
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आधर्यं पूर्वपक्षस्य यस्मिन्नर्थवशाद्भवेत्।
विवादे साक्षिणस्तत्र प्रष्टव्याः प्रतिवादिनः ॥ 164 ॥
वादी के साक्षियों के साक्ष्य के दोषपूर्ण, अविश्वसनीय तथा असत्य प्रतीत
होने पर प्रतिवादी के साक्षियों के साक्ष्य को अवश्य महत्त्व देना चाहिए।
न परेण समुद्दिष्टमुपेयात् साक्षिणं रहः ।
भेदयेत्तं न चान्येन हीयेतेवं समाचरन् ॥ 165 ॥
दोनों—वादी और प्रतिवादी—को एक दूसरे द्वारा घोषित एक दूसरे के साक्षियों
के साथ न तो एकान्त में गुप्त वार्तालाप करना चाहिए और न ही उन्हें तोड़ने अथवा
अपने पक्ष में करने का प्रयास करना चाहिए। प्रशासन को इस प्रकार की कुचेष्टा—
दूसरे के साक्षियों को तोड़ना—करने वाले पक्ष को पराजित घोषित कर देना चाहिए।
साक्ष्युद्दिष्टो यदि प्रेयाद् गच्छेद्वपि दिगन्तरम् ।
तच्छ्रोतारः प्रमाणं स्युः प्रमाणं ह्युत्तरा क्रिया ॥ 166 ॥
विधिशास्त्र में उत्तरक्रिया की प्रामाणिकता का स्वरूप इस प्रकार निर्दिष्ट है—
उद्दिष्ट साक्षी के मर जाने पर अथवा विदेश दूर देश को चले जाने पर उसकी
अनुपस्थिति में उसके मुख से सुने वचन को तद्वत् उद्धृत करने वाले उसके
किसी निकट सम्बन्धी अथवा मित्र आदि को स्थानापन्न साक्षी के रूप में मान्य
करना चाहिए।
सुदीर्घेणापि कालेन लिखितः सिद्धिमाप्नुयात् ।
आत्मनैव लिखेज्जानन्नचेदन्येन लेखयेत् ॥ 167 ॥
लेन-देन के मामले में बहुत समय बीत जाने पर भी लिखित प्रमाण के
उपलब्ध होने पर वसूली की जा सकती है और इनकार करने पर मुक़द्दमा चलाया
जा सकता है। यदि व्यक्ति जानकार है, तो स्वयं भी लेन देन के व्यवहार को
लिपिबद्ध कर सकता है और यदि विधि-मान्य भाषा के प्रयोग की अभिज्ञता नहीं,
तो विधि द्वारा स्थापित लेखक से लिखाया जा सकता है। दोनों प्रकार के दस्तावेज़—
अपने आप लिखा तथा दूसरे से लिखाया गया—समान रूप से मान्य होते हैं।
आष्टमाद्वत्सरात्सिद्धिः स्मारितस्येह साक्षिणः ।
आ पञ्चमात्तथा सिद्धिर्यदृच्छोपगतस्य च ॥ 168 ॥
साक्षी के रूप में एक बार उद्दिष्ट व्यक्ति आठ वर्षों तक मनोनीत करने वाले
पक्ष के द्वारा मान्य माना जाता है। कार्यस्थल पर उपस्थित और प्रशासन द्वारा साक्ष्य
के लिए आहूत व्यक्ति भी पांच वर्षों तक साक्ष्य देने के लिए अभिमत माना जाता
है।
आ तृतीयात्तथा वर्षात् सिद्धिर्गूढस्य साक्षिणः ।
आ संवत्सरात्ः सिद्धिर्वदन्त्युत्तरसाक्षिणः ॥ 169 ॥
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गुप्त रूप से ऋण के लेन देन के साक्षी का साक्ष्य तीन वर्षों तक मान्य रहता
है, इस अवधि के उपरान्त उसका साक्ष्य महत्त्वहीन हो जाता है। उत्तर-साक्षी-
साक्षी के मुख से उच्चरित को उद्धृत करने वाले-के वचन की प्रामाणिकता एक
वर्ष के लिए है, अर्थात् यदि एक वर्ष के भीतर सुने-देखे का विवरण दिया जा रहा
है, तो ठीक है, परन्तु यदि सुने देखे को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है,
तो उसे नितान्त सत्य नहीं माना जा सकता।
अथवा कालनियमो न दृष्टः साक्षिणं प्रति।
स्मृत्यपेक्षं हि साक्षित्वमाहुः शास्त्रविदो जनाः ॥ 170 ॥
कतिपय शास्त्रकारों और विधिवेत्ताओं की यह भी मान्यता है कि साक्ष्य में
समय की सीमा को आड़े नहीं आने देना चाहिए। यदि साक्षी चरित्रवान् व सत्यनिष्ठ
है, उसके वचन शास्त्र सम्मत तथा तथ्यों पर आदृत हैं, तो काल की अवधि की
उपेक्षा करते हुए उसे यथोचित गौरव देना ही चाहिए।
अभिप्राय यह है सत्यनिष्ठ को महत्त्व देना चाहिए, समय-सीमा को गौण ही
मानना चाहिए।
यस्य नोपहता बुद्धिः स्मृतिः श्रोत्रं च साक्षिणः ।
सुदीर्घेणापि कालेन स साक्षी साक्ष्यमर्हति ॥ 171 ॥
जिस व्यक्ति की बुद्धि, स्मृति और श्रवणशक्ति अप्रतिहत है, जो सभी बातों
को ठीक ढंग से यथावत् समझता है, सही तौर पर देखता-सुनता है और जिसे
वर्षों-पूर्व घटित घटनाओं की यथावत् स्मृति है, जो कुछ भी नहीं भूला है, समग्रतः
जिसकी इन्द्रियां अविकल एवं अक्षुण्ण हैं, ऐसा व्यक्ति कितने भी पुराने मामले में
साक्ष्य दे सकता है। ऐसे व्यक्ति के साक्ष्य को समय-सीमा अमान्य नहीं बना
सकती।
असाक्षिप्रत्ययास्त्वन्ये षड्विवादाः प्रकीर्तिताः ।
लक्षणान्येव साक्षित्वे येषामाहुर्मनीषिणः ॥ 172 ॥
निम्नोक्त छह विवादों में किसी प्रकार के साक्ष्य की कोई आवश्यकता ही
नहीं। व्यक्ति के लक्षण (रंगे हाथों पकड़ा जाना) उसके अपराधी होने के प्रत्यक्ष
एवं प्रबल प्रमाण होते हैं। विद्वानों ने प्रत्यक्ष चिह्नों को ही साक्षी-रूप में स्वीकार
किया है।
उल्काहस्तोऽग्निदो ज्ञेयः शस्त्रपाणिस्तु धानकः ।
केशाकेशिगृहीतश्च युगपत्पारदारिकः ॥ 173 ॥
छह विवाद इस प्रकार हैं—

  1. हाथ में जलती हुई लकड़ी लिये पकड़ा जाने वाला निश्चित रूप से आग
    लगाने वाला है।
    108 / नारदस्मृति
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  1. हाथ में शस्त्र लिये रहने पर पकड़ा जाने वाला हत्यारा है।
  2. हाथ में स्त्री के सिर के केश, वस्त्र, गन्ध आदि लिये रहने वाला परस्त्रीगामी
    है।
  3. तोड़-फोड़ के औज़ारों के साथ पकड़ा जाने वाला सेतुभञ्जक है।
  4. कुल्हाड़ी आदि के साथ पकड़ा जाने वाला वृक्षों को काटने वाला है तथा
  5. तमतमाये चेहरे वाला दूसरों से मार-पीट करने वाला है।
    इस प्रकार के चिह्नों को देखकर किसी अन्य साक्ष्य की अपेक्षा किये बिना
    इन अपराधियों को तत्काल यथोचित दण्ड देना चाहिए।
    कुद्दालपाणिर्विज्ञेयः सेतुभेत्ता समीपगः।
    तथाकुठारपाणिश्च वनच्छेत्ता प्रकीर्तितः ॥ 174 ॥
    स्मृतिकार इस सम्बन्ध में कुछ सावधानी बरतने की चेतावनी देते हुए कहता
    है—कभी-कभी फावड़ा हाथ में लिये किसी पुल के पास दीखने वाला व्यक्ति
    पुलिया का रक्षक—टूट-फूट की मरम्मत करने वाला—और कुल्हाड़ी हाथ में
    लिये रहने वाला वृक्षों को काटने वाला समझ लिया जाता है। यह धारणा सही हो
    भी सकती है और सही नहीं भी हो सकती है। अतः सत्य के निर्णय के लिए
    सतर्कता अपेक्षित रहती है।
    प्रत्यक्षचिह्नो विज्ञेयो दण्डपारुष्यकृन्नरः।
    असाक्षिप्रत्यया ह्येते पारुष्ये तु परीक्षणम् ॥ 175 ॥
    वस्तुतः अपराधी के चेहरे के हाव-भावों, उसकी चेष्टाओं व उसके छिपने के
    प्रयास आदि प्रत्यक्ष चिह्नों से उसके अपराधी होने का अनुभव हो जाता है, फिर भी
    सत्य को सुनिश्चित करने के लिए थोड़ी-बहुत पूछताछ अवश्य करनी चाहिए।
    'असत्य के पांव नहीं होते' उक्ति के अनुसार अपराध को छिपाना सम्भव
    नहीं होता और वास्तविकता सामने आ ही जाती है, फिर भी कुछ लोग जहां अपेक्षा
    से अधिक चतुर होते हैं, वहां कुछ लोग अत्यधिक भोले और सीधे-सादे होते हैं।
    अतः जांच-परख करना आवश्यक हो जाता है।
    कश्चित्कृत्वाऽऽत्मनश्चिह्नं द्वेषात् परमुपद्रवेत्।
    हेत्वर्थगतिसामथ्र्यैस्तत्र युक्तं परीक्षणम् ॥ 176 ॥
    कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कुछ चतुर एवं धूर्त लोग द्वेषवश किसी को
    फंसाने के लिए अपने शरीर पर कुछ कृत्रिम चिह्न बना देते हैं अथवा प्रताड़ित-
    पीड़ित सरीखी चेष्टाएं अथवा प्रदर्शन करने लगते हैं। इस स्थिति में वास्तविकता
    का निर्णय करने के लिए हेतु (कारण), प्रयोजन, सामर्थ्य और गति के आधार पर
    जांच करनी चाहिए, अर्थात् यह देखना चाहिए कि अपराध का कारण क्या हो
    सकता है ? उद्देश्य अथवा प्रयोजन क्या हो सकता है ? अपराधी में अपराध करने
    नारदस्मृति / 109
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का सामर्थ्य भी है अथवा नहीं ? इसके अतिरिक्त अपराध का स्वरूप क्या है ? क्या
सचमुच शिकायत करने वाले को किसी प्रकार की शारीरिक क्षति—सूजन, अंगभंग,
रक्त प्रवाह, घाव आदि—पहुंची भी है अथवा नहीं ?
इन सब तथ्यों पर विचार करने से अनुमान लगाना सम्भव हो जाता है कि
अपराधी ने सचमुच अपराध किया है अथवा उस पर मिथ्या आरोप लगाया जा रहा
है ?
नार्थसम्बन्धिनो नाप्ता न सहाया न वैरिणः ।
न दृष्टदोषाः प्रष्टव्याः साक्षिणः प्रतिदूषिताः ॥ 177 ॥
निम्नोक्त व्यक्तियों के वक्तव्य को सत्य के निर्णय के लिए प्रमाण के रूप में
ग्रहण नहीं किया जा सकता, अर्थात् ऐसे लोगों की सत्यनिष्ठा सन्देह के घेरे में आ
जाने से इनकी विश्वसनीयता खण्डित हो जाती है और वे साक्षी बनने के योग्य नहीं
रहते—

  1. कार्य-व्यापार में वर्तमान में सहभागी (पार्टनर) अथवा भूत में रह चुका
    व्यक्ति।
  2. निकट सम्बन्धी अथवा घनिष्ठ मित्र।
  3. अधीनस्थ कर्मचारी।
  4. शत्रु, जिससे कभी मन-मुटाव अथवा झगड़ा-फ़साद हो चुका है।
  5. किसी अन्य व्यवहार में मिथ्या साक्ष्य देने के लिए लाञ्छित नहीं है।
  6. लोक में तथा समाज में मिथ्यावादी के रूप में कुख्यात।
    दासनैकृतिकाश्राद्धवृद्धस्त्री बाल चाक्रिकाः ।
    मत्तोन्मत्तप्रमत्तार्त्तकितव ग्रामयाजकाः ॥ 178 ॥
    महापथिकसामुद्रवणिक् प्रव्रजितातूराः ।
    व्यङ्गैकश्रोत्रियाचारहीनक्लीवकुशीलवाः ॥ 179 ॥
    नास्तिक व्रात्य दाराग्नित्यागिनोऽयाज्ययाज्यकाः ।
    एकस्थालीसहायारिचरज्ञाति सनाभयः ॥ 180 ॥
    प्राग्दृष्टदोषशैलूषविषजीव्याहिनुण्डिकाः ।
    गरदाग्निदकीनाशशूद्रापुत्रौपपातिकाः ॥ 181 ॥
    क्लान्तसाहसिकश्रान्तनिर्धनान्त्यावसायिनः ।
    भिन्नवृत्तासमावृत्तजडतैलिकमूलिकाः ॥ 182 ॥
    भूताविष्टनृपद्विष्टवर्ष नक्षत्रसूचकाः ।
    अघशंस्यात्मविक्रेतृहीनाङ्गभगवृत्तयः ॥ 183 ॥
    कुनखी श्यामदन्तश्च मित्रध्रुक्शठशौण्डिकाः ।
    ऐन्द्रजालिकलुब्ध्रोग्रश्रेणीगणविरोधिनः ॥ 184 ॥
    110 / नारदस्मृति
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वधकश्चर्मकृत् पङ्गु पतितः कूटकारकः ।
कुहकः प्रत्यवसितस्तस्करो राजपुरुषः ॥ 185 ॥
मनुष्यपशुमांसास्थिमधुक्षीराम्बुसर्पिषाम् ।
विक्रेता ब्राह्मणश्चैव द्विजो वार्धुषिकश्च यः ॥ 186 ॥
च्युतः स्वधर्मात् कुलिकः स्तावको हीनसेवकः ।
पित्रा विवदमानश्च भेदकृच्चेत्यसाक्षिणः ॥ 187 ॥
निम्नोक्त व्यक्ति साक्षी बनने के योग्य नहीं होते, अतः इन्हें साक्षी नहीं बनाना
चाहिए-

  1. दास, 2. छल-कपट से व्यवहार करने वाले के रूप में प्रसिद्ध, 3. श्राद्ध के
    अयोग्य घोषित, अर्थात् आचारभ्रष्ट एवं पतित ब्राह्मण, 4. वृद्ध पुरुष, अर्थात् इन्द्रिय-
    शक्ति की क्षीणता के कारण असमर्थ बना व्यक्ति अथवा परोपजीवी, 5. स्त्री,
  2. बालक, 7. चक्रजीवी-तेली, रथकार तथा शकट-चालक आदि, 8. मत्त-
    मदिरा आदि के प्रभाव में ग्रस्त, 9. उन्मत्त, अर्थात् विक्षिप्त, 10. प्रमत्त-प्रमादग्रस्त,
    आलसी, सुस्त, 11. आर्त्त-विपत्ति-ग्रस्त, 12. द्यूतकार, 13. अशिक्षितों एवं ग्रामीणों,
    अर्थात् निम्न लोगों (अन्त्यजों) का पुरोहित, 14. महापथिक-दूसरे देशों की यात्रा
    करने वाला, 15. समुद्रजीवी, अर्थात् समुद्र में मिलने वाले जीवों, शंख-सीपी आदि
    से अपनी आजीविका चलाने वाला-ऐसा व्यक्ति समुद्र में मल-मूत्र विसर्जित
    करने वाला होने से म्लेच्छ होता है, 16. संन्यासी-उसका कोई निश्चित ठिकाना
    ही नहीं होता, 17. रोगी, अर्थात् जीवन से निराश, 18. विकलांग-अन्धा, काणा,
    बहरा, लंगड़ा, 19. एकाकी, मोहमाया से रहित अथवा समाज से निरपेक्ष होने से
    निराश एवं उदासीन, 20. श्रोत्रिय-वेदपाठी ब्राह्मण-इन पछड़ों को अवाञ्छनीय
    समझने वाला, 21. आचारहीन, 22. क्लीव (नपुंसक), 23. कुशीलव-नृत्य,
    गीत, वाद्य, आदि से आजीविका चलाने वाला, अर्थात् दूसरों का मनोरंजन करने
    वाला, 24. नास्तिक-वेदनिन्दक, 25. जाति-भ्रष्ट-जिसका यज्ञोपवीत संस्कार
    नहीं हुआ, विद्या का अनधिकारी, 26. अपनी पत्नी का त्याग करने वाला-पालन
    न कर सकने वाला अथवा क्लीव अथवा निर्मोही अथवा उत्तरदायित्व के निर्वहण
    को महत्त्व न देने वाला, 27. अग्नि-त्यागी-यज्ञ-यागादि न करने वाला,
  3. अयाज्य-याजक, यज्ञ के अनधिकारियों का पुरोहित बनने वाला, 29. एक ही
    पात्र में भोजन करने वाला, अर्थात् स्वाद, शालीनता आदि से विमुख, 30. अपने
    मित्र का शत्रु, 31. सन्देशवाहक अथवा गुप्तचर, 32. जाति-बन्धु-बुआ, मासी,
    चाचा तथा मामा की सन्तति, 33. दृष्टदोष-पूर्व से ही दुष्ट के रूप में ज्ञात,
  4. नर्तक, 35. विषजीवी-विषैले द्रव्यों का व्यापारी, 36. सर्प आदि भयंकर
    जीवों को पकड़ने अथवा उनसे आजीविका चलाने वाला, 37. विषदाता-दूसरों
    नारदस्मृति / 111
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को विष देकर-खिलाकर उनकी हत्या करने वाला, 38. दूसरों की सम्पत्ति (घर,
दुकान) को आग लगाने वाला, 30. पशुओं की हिंसा से आजीविका चलाने वाला,
40. शूद्रा का पुत्र, 41. छोटे-बड़े पाप करने वाला, 42. खिन्न, निराश तथा अशान्त
मन वाला, 43. डाकू-लुटेरा, 44. थका मांदा रहने वाला, 45. चाण्डाल आदि,
46. निर्धन, अभावग्रस्त, 47. अपने वंश परम्परागत व्यवसाय को छोड़कर दूसरे
किसी व्यवसाय को अपनाने वाला, 48. असमावृत्त-अपने स्तर से भिन्न, उच्च
अथवा निम्न वृत्ति को अपनाने वाला, 49. जड़-अविकसित बुद्धि,
50. तैलिक-घी, तेल आदि का क्रय-विक्रय करने वाला, 51. विद्याचोर, अर्थात्
गुरुकुल में प्रवेश लिये बिना और शुल्क चुकाये बिना गुप्त रूप से विद्या ग्रहण करने
वाला, 52. भूत-प्रेत से घिरा, 53. राजद्रोही, 54. ग्रह-नक्षत्रों को बताकर आजीविका
कमाने वाला-फलित ज्योतिषी, 55. अप्रासंगिक-ऊटपटांग बोलने वाला,
56. अपने को बेचने वाला-दासवृत्ति को अपनाने वाला, 57. अंगविहीन-एक
हाथ, एक टांग आदि का न होना, 58. पेट भरने के लिए पत्नी से वेश्यावृत्ति कराने
वाला, 59. मैला-कुचैला रहने वाला, गन्दे नाखूनों वाला, 60. तम्बाकू आदि के
अधिक सेवन से काले हो गये दांतों वाला, 61. मित्रद्रोही, 62. शठ-दुष्ट प्रकृति,
धूर्त, 63. मद्यविक्रेता, 64. जादूगर, 65. लोभी, 66. कठोर एवं निर्मम प्रकृति,
67. जाति-पांति का विरोधी, 68. समाज में प्रतिष्ठित वर्ण-व्यवस्था का विरोधी,
69. हत्यारा, 70. चर्म-व्यवसायी, 71. पंगु, 72. पतित, 73. कूटकर्म करने वाला,
अर्थात् चोरी-छिपे लोगों की हत्या करने वाला, 74. जादू-टोना करने वाला,
75. तस्कर-अवैध व्यापारी, 76. राजपुरुष-सरकारी कर्मचारी, 77. मनुष्य के
मांस का विक्रेता, 78. पशुमांस विक्रेता-क़साई, 79. अस्थि-व्यापारी, 80. मधुविक्रेता
81. क्षीरविक्रेता, 82. जलविक्रेता, 83. घृतविक्रेता, 84. वेद विक्रयी-धन लेकर
वेद पढ़ाने वाला, 85. ब्याज लेने वाला-ब्याज को आजीविका का साधन बनाने
वाला-द्विज, 86. धर्मभ्रष्ट, 87. शिल्पी, 88. सूत, मागध आदि आश्रयदाताओं की
स्तुति करने वाला, 89. हीन (अयोग्य, शूद्र अथवा पतित) की सेवा करने वाला,
90. पिता के साथ विवाद करने वाला, 91. परिवार में फूट डालने वाला।
ये सब विवश अथवा पतित अथवा भ्रष्ट होने के कारण अविश्वसनीय होते
हैं, अतः इनका साक्ष्य सर्वथा निरपेक्ष एवं सत्य पर आश्रित नहीं माना जा सकता।
बिकने वाले अथवा खरीदे जा सकने वाले व्यक्ति से सत्य पर टिकने की आशा को
ही नहीं जा सकती।
असाक्षिणो ये निर्दिष्टा दासनैकृतिकादयः ।
कार्यगौरवमासाद्य भवेयुस्तेऽपि साक्षिणः ॥ 188 ॥
ऊपर दासों और भ्रष्ट चरित्र व्यक्तियों के साक्षी न होने का उल्लेख किया
112 / नारदस्मृति

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गया है, परन्तु प्रचलित कहावत—'कीचड़ में कमल भी उत्पन्न होता है' अथवा
'कोयले की खान में कभी-कभी हीरा भी मिल जाता है,' अर्थात् छोटे अथवा बुरे
व्यक्तियों में भी अपवाद-रूप में भी चारित्रिक उत्कर्ष देखने को मिल जाता है। ऐसे
अपवाद बने सेवक और कुख्यात व्यक्ति भी विशेषतया अन्य साक्षियों के अभाव में
साक्षी बनाये जा सकते हैं और इनके साक्ष्य को मान्यता दी जानी चाहिए।
साहसेषु च सर्वेषु स्तेयसंग्रहणेषु च।
पारुष्ययोश्चाप्युभयोर्न परीक्षेत साक्षिणः ॥ 189 ॥
व्यक्तिगत चरित्र के अतिरिक्त एक अन्य विचारणीय तथ्य यह भी है कि
चोरी, डाका, छीना-झपटी, गाली-गलौच और मारपीट के मामलों के साक्षी तो
वहां उपस्थित रहने वाले चोर-डाकू आदि ही हो सकते हैं। भले आदमी तो ऐसी
घटनाओं से दूर रहने में ही अपना हित समझते हैं। वे तो घटनास्थल के समीप
फटकते ही नहीं। अतः इस प्रकार के मामलों में साक्षी बनने वाले व्यक्तियों के
चरित्र की परीक्षा नहीं करनी चाहिए, अन्यथा साक्ष्य का उपलब्ध होना ही दुर्लभ हो
जायेगा।
तेषामपि न बालः स्यान्न स्त्री नैको न कूटकृत्।
न बान्धवो न चारातिब्रूयुस्ते साक्ष्यमन्यथा ॥ 190 ॥
उपर्युक्त चोरी, डाका आदि मामलों में बालक, स्त्री, अपराधी मनोवृत्ति का
होने से आंख चुराने वाला, सामना न कर सकने वाला, बन्धु-बान्धव और शत्रु
आदि साक्षी नहीं बन सकते। इनके साक्ष्य की अप्रामाणिकता के कारण का उल्लेख
अगले पद्य में किया गया है।
बालोऽज्ञानादसत्यात्स्त्री पापाभ्यासाच्च कूटकृत्।
बिब्रूयाद्बान्धवः स्नेहाद्वैरनिर्यातनारिः ॥ 191 ॥
बालक लगभग अनजान होता है, स्त्रियों में असत्य-भाषण की प्रवृत्ति होती
है तथा वे स्वभाव से भीरु होती हैं, कूटाचारी का जीवन पापमय होता है, उसे तो
सत्य-असत्य का विचार ही नहीं रहता, उसे दूसरों को लड़ाने-भिड़ाने में ही
आनन्द आता है, बन्धु-बान्धवों से अनुराग और आसक्ति के कारण तथा विरोधी
शत्रु के द्वेष-भाव रखने के कारण तथा शत्रु को यातना देने को तत्पर होने के कारण
दोनों से यथार्थ कथन की अपेक्षा की ही नहीं जा सकती। रोग अथवा द्वेषग्रस्त
व्यक्ति निरपेक्ष हो ही नहीं सकता।
उभयानुमतो यः स्याद्द्वयोर्विवदमानयोः ।
असाक्षिकोऽपि साक्षित्वे प्रष्टव्यः स्यात् स संसदि ॥ 192 ॥
न्यायाधिकारी को साक्ष्य के लिए सर्वथा अनुपयुक्त एवं अपात्र, परन्तु विवाद
नारदस्मृति / 113

भूमिं लिखति पादाभ्यां बाहू वासो धुनोति च॥ 194॥

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में उलझे दोनों पक्षों को एक समान मान्य व्यक्ति से मामले के सम्बन्ध में पूछताछ
करनी चाहिए और उसके साक्ष्य को यथोचित महत्त्व देना ही चाहिए।
यस्त्वात्मदोषभिन्नत्वादस्वस्थ इव लक्ष्यते।
स्थानात् स्थानान्तरं गच्छेदैकैकं चानुधावति॥ 193॥
क्रासत्यनिभृतोऽकस्मादभीक्ष्णं निश्वसत्यपि।
भूमिं लिखति पादाभ्यां बाहू वासो धुनोति च॥ 194॥
भिद्यते मुखवर्णोऽस्य ललाटं विद्यते तथा।
शोषमागच्छतश्चोष्ठादूर्ध्वं तिर्यक् च वीक्षते॥ 195॥
त्वरमाण इवाकस्मादपृष्टो बहु भाषते।
कूटसाक्षी स विज्ञेयस्तं पापं विनयेन्नृपः॥ 196॥
कूटसाक्षी को परिभाषित करते हुए स्मृतिकार का कथन है—

  1. अपने दोष के प्रकट हो जाने की आशंका से भयभीत होना।
  2. किसी एक स्थान पर टिक न पाने तथा इधर-उधर भटकने वाला होना।
  3. अस्वस्थ एवं असंयत दीखना।
  4. एक-एक व्यक्ति की टोह लेना।
  5. लोगों के मौन से घबराना।
  6. क्षण-प्रतिक्षण दीर्घ श्वास लेना, पैरों से धरती को कुरेदना और धरती पर
    कुछ लिखना।
    7.अकारण ही अपनी भुजाओं और वस्त्रों को ऊपर-नीचे करते रहना।
  7. चेहरे के रंग का उड़ना।
  8. माथे पर पसीना आना।
  9. कण्ठ शुष्क हो जाना।
  10. पागलों के समान दीखना।
  11. बुद्धि में चञ्चलता का भाव आना।
  12. छोटे से प्रश्न का लम्बा चौड़ा उत्तर देना।
    उपर्युक्त लक्षणों वाले व्यक्ति को कूटसाक्षी—झूठी गवाही देने वाला—समझना
    चाहिए और राजा अथवा सम्बद्ध अधिकारी द्वारा उसे ऐसा कठोर दण्ड देना
    चाहिए, जिससे दूसरे ऐसे दुस्साहसपूर्ण दुष्कर्म के सम्बन्ध में सोच भी न सकें।
    श्रावयित्वा तथान्येभ्यः साक्षित्वं यो विनिह्नुते।
    स विनेयो भृशतरं कूटसाक्ष्यधिको हि सः॥ 197॥
    साक्ष्य के लिए अपनी सहमति-स्वीकृति देने के उपरान्त साक्ष्य के समय
    इनकार करने वाला, अकारण अनुपस्थित रहने वाला अथवा टालमटोल एवं बहानेबाज़ी
    करने वाला कूटसाक्षी से भी बड़ा अपराधी होता है। राजा को ऐसे दुष्ट व्यक्ति को
    114 / नारदस्मृति
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भी अनुशासन बनाये रखने के लिए अत्यन्त कठोर दण्ड देना चाहिए।
आहूय साक्षिणः पृच्छेन्नियम्य शपथैर्भृशम्।
समस्तान् विदिताचारान् विज्ञातार्थान् पृथक् पृथक् ॥ 198 ॥
साक्षियों के सच्चरित्र तथा उनकी सत्यनिष्ठा से भली प्रकार परिचित होने पर
भी न्यायाधिकारी को प्रत्येक साक्षी को अलग अलग बुलाकर और घुमा-फिराकर
उनसे प्रश्न पूछने चाहिए। यहां तक कि उन्हें सत्य बोलने की शपथ दिलाकर
वास्तविकता को सुनिश्चित करने की अपनी ओर से भरसक चेष्टा करनी चाहिए।
कभी कभी सदाचारी व्यक्ति भी किसी विवशता—भय, लोभ, मोह, राग,
द्वेष तथा प्रतिशोध की भावना—के कारण असत्य भाषण करने लगता है। अच्छी
तरह न टटोले जाने पर उसे अपने उच्च चरित्र का अनुचित लाभ मिल जाता है।
अतः किसी व्यक्ति के सच्चरित्र होने के झांसे में आकर उसके वक्तव्य पर सहसा
विश्वास नहीं कर लेना चाहिए।
सत्येन शापयेद्विप्रं क्षत्रियं वाहनायुधैः।
गोबीजकाञ्चनैर्वैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु पातकैः ॥ 199 ॥
साक्ष्य के लिए उपस्थित होने वाले ब्राह्मण को सत्य की, क्षत्रिय को अश्व,
गज, रथ आदि वाहनों तथा धनुष, खड्ग आदि आयुधों की, वैश्य को गाय आदि
पशु, धान्य तथा स्वर्ण आदि की और शूद्र को सभी पापों से आविष्ट होने की शपथ
दिलानी चाहिए। उदाहरणार्थ, ब्राह्मण को इस प्रकार शपथ लेनी चाहिए—मैं अपना
साक्ष्य सत्यनिष्ठा से प्रस्तुत करूंगा, मेरे मिथ्या भाषण करने पर मैं सत्य से पतित हो
जाऊं। इसी प्रकार क्षत्रिय को कहना चाहिए—मैं अपने वाहनों और आयुधों की
शपथ लेता हूं कि साक्ष्य में जो कहूंगा, सत्य कहूंगा, सत्य के अतिरिक्त कुछ नहीं
कहूंगा। मेरे असत्य-भाषण का अर्थ मेरा वाहनों और आयुधों से वञ्चित होना होगा।
इसी प्रकार वैश्य और शूद्र को भी शपथ लेनी चाहिए, अर्थात् सत्य-भाषण के प्रति
समर्पित होने का संकल्प प्रकट करना चाहिए।
पुराणैर्धर्मवचनैः सत्यमाहात्म्यकीर्तनैः।
अनृतस्यापवादैश्च भृशमुत्रासयेदिमान् ॥ 200 ॥
न्यायाधीश द्वारा साक्ष्य के लिए उपस्थित व्यक्तियों को सत्य भाषण से यश,
सम्मान और गौरव की वृद्धि सम्बन्धी तथा इसके विपरीत भाषण से अपयश,
लोकनिन्दा तथा मानहानि होने सम्बन्धी, कुछ प्राचीन इतिहास, पौराणिक आख्यान
तथा अन्यान्य कथापरक उद्धरण एवं उदाहरण आदि सुनाकर उन्हें असत्य भाषण
के लिए निरुत्साहित एवं सत्य भाषण के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करना चाहिए।
नग्नो मुण्डः कपालेन भिक्षार्थी क्षुत्पिपासितः।
अन्धः शत्रुगृहं गच्छेद् यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ॥ 201 ॥
न्यायाधिकारी को साक्ष्य के लिए उपस्थित व्यक्तियों को चेतावनी के स्वर में
नारदस्मृति / 115

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प्रबोधित करते हुए कहना चाहिए-मिथ्या साक्ष्य देने वाले को नंगा, गंजा, भूखा
और प्यासा होकर दुःख भोगना पड़ता है, उसे अपनी क्षुधा-निवृत्ति के लिए हाथ में
कपाल लेकर भीख मांगने को विवश होना पड़ता है। झूठी गवाही देने वाले को
अन्धा होना पड़ता है और यहां तक कि शत्रु के घर की चाकरी तक करनी पड़
जाती है।
नग्नो मुण्डः कपालेन परद्वारे बुभुक्षितः ।
अमित्रान् भूयशः पश्येद्यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ॥ 202 ॥
मिथ्या साक्ष्य देने वाले को अभावग्रस्त जीवन जीना पड़ता है, उसे वस्त्रहीन
(नंगा) सिर मुंडा फ़क़ीर बनकर अपनी भूख मिटाने के लिए शत्रु के घर से भीख
मांगने को विवश होना पड़ता है। ऐसे दुर्दशाग्रस्त व्यक्ति को पग-पग पर अपने
शत्रुओं का सामना करना पड़ता है, अर्थात् उसे लज्जित एवं अपमानित होना पड़ता
है।
यां रात्रिर्माधविन्नास्त्री यां चैवाक्षपराजितः ।
यां च भाराभितप्ताङ्गो दुर्विवक्ता स तां वसेत् ॥ 203 ॥
जिस प्रकार पुरुष द्वारा दूसरी स्त्री को अपनाने पर उसकी पत्नी असह्य वेदना
से व्यथित हो उठती है, अर्थात् उसकी आंखों से नींद ग़ायब हो जाती है, उसके
लिए रात्रि का एक-एक पल बिताना एक समस्या का रूप ले लेता है, वह जल
बिन मछली के समान तड़पती है, जिस प्रकार द्यूत में सब कुछ हार चुके व्यक्ति की
सुख-शान्ति काफ़ूर हो जाती है, ऋण उतारने की चिन्ता उसे कहीं का नहीं रखती,
जिस प्रकार सामर्थ्य से अधिक भार उठाने वाले श्रमिक के लिए एक-एक पग
चलना और लक्ष्य पर पहुंचना कष्टसाध्य हो जाता है, उसी प्रकार झूठा साक्ष्य देने
वाला कभी सुख-शान्ति का जीवन नहीं जी सकता। उसका अपराध-बोध उसे
कहीं चैन से बैठने नहीं दे सकता।
साक्षी साक्ष्ये समुद्दिशन् गोकर्णशिथिलं वचः।
सहस्रं वारुणान् पाशान् भुङ्क्त स बन्धाद् ध्रुवम् ॥ 204 ॥
जो भी व्यक्ति साक्ष्य के लिए न्यायालय में उपस्थित होकर दृढ़ता और
विश्वास के साथ अपना साक्ष्य न देकर शिथिलता बरतता है, गाय के कान के
समान केवल उपस्थिति दर्ज कराता है, 'हां' 'न' में उत्तर देकर साक्ष्य को स्पष्ट
वाणी नहीं देता, ऐसा व्यक्ति वरुणदेव की दृष्टि में अपराधी है। वरुणदेव उसे अपने
हज़ारों पाशों से बांधकर असीम दुःख देते हैं।
तस्य वर्षशते पूर्णे पाश एव प्रमुच्यते ।
तदा पाशाद्विनिर्मुक्तः स्त्री सम्भवति मानवः ॥ 205 ॥
मिथ्या-साक्ष्य देने वाला वरुण के क्रोध का पात्र बनता है और सौ वर्षों तक
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उनके कठोर पाशों में बंधा विषम दुःख भोगता है। इस अवधि के उपरान्त भी वह
पाशमुक्त होने के लिए स्त्री की योनि में उत्पन्न होकर पराधीनता के कष्टपूर्ण जीवन
को बिताने पर विवश होता है।
एवं सम्बन्धनात् तस्मान्मुच्यते नियताच्च सः।
पशुगोऽश्वपुरुषाणां हिरण्यं भूर्यथाक्रमम्॥ २०६॥
पशु—गौ, अश्व—आदि, मनुष्य, स्वर्ण तथा भूमि सम्बन्धी विवाद में मिथ्या-
साक्ष्य के लिए मनुष्य को परलोक में कौन-कौन से दण्ड भुगतने पड़ते हैं—इसकी
चर्चा अगले पद्यों में की जा रही है। इतना तो निश्चित ही है कि मिथ्यासाक्षी
वरुणदेव के पाशों में बंधकर दीर्घकाल तक असह्य वेदना का शिकार बनता है।
यावतो बान्धवांस्तस्मिन् हन्ति साक्ष्येऽनृतं वदन्।
तावतः सम्प्रवक्ष्यामि शृणु सौम्यानुपूर्वशः॥ २०७॥
मिथ्यासाक्षी अपने पाप से अपने वंश के कितने पूर्वजों को, किस प्रकार
कलंकित करता है, उन्हें नरक-यातना सहन करने का उत्तरदायी बनाता है, इसका
विवरण कुछ इस प्रकार से है—
पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते।
शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं पुरुषानृते॥ २०८॥
बकरी आदि पशु सम्बन्धी विवाद में मिथ्या-साक्ष्य देने के अपराध के दण्ड
के रूप में उसके पांच बान्धवों—माता, पिता, पत्नी, सन्तान तथा स्वयं वह—की
मृत्यु हो जाती है। गाय के विषय में मिथ्या-साक्ष्य का दण्ड तो दस बान्धवों—पांच
वर्तमान—माता, पिता आदि तथा पांच पूर्वपुरुषों—को भुगतना पड़ता है। अश्व के
विवाद में झूठी गवाही का दण्ड सौ सम्बन्धियों का पतन तथा पुरुष—दास, स्त्री
आदि—के विवाद में मिथ्या-साक्ष्य का दण्ड हज़ार सम्बन्धियों का नरकवास है।
हन्ति जातानजातांश्च हिरण्यार्थेऽनृतं वदन्।
सर्वं भूम्यनृते हन्ति मा स्म भूम्यनृतं वदीः॥ २०९॥
इसी प्रकार स्वर्ण सम्बन्धी विवाद में मिथ्या-साक्ष्य का दण्ड झेलना पड़ता
है। भूमि-सम्बन्धी विवाद में तो पूरे वंश का सर्वनाश हो जाता है। अतः भूमि के
विषय में तो कभी मिथ्या साक्ष्य का सोचना तक नहीं चाहिए।
एकमेवाद्वितीयं तत् प्राहुः पावनमात्मनः।
सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव॥ २१०॥
जिस प्रकार नदी को पार करने का एकमात्र सुनिश्चित साधन नौका है, उसी
प्रकार आत्मा को पवित्र करने वाला साधन सत्य है, सत्य ही स्वर्ग का सोपान है।
अतः व्यक्ति को राग-द्वेष तथा लोभ मोह आदि किसी भी कारणवश सत्य का
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परित्याग कभी नहीं करना चाहिए; क्योंकि यही एकमात्र अद्वितीय और सुनिश्चित
सम्बल है।
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्।
अश्वमेधसहस्रात्तु सत्यमेव विशिष्यते॥ 211॥
यदि तुला के एक पलड़े पर सैकड़ों अश्वमेधादि यज्ञों के फल को रखा जाये
और दूसरे पलड़े में सत्य को रखा जाये, तो निश्चित समझिये कि सत्य का पलड़ा
ही भारी पड़ेगा। इस प्रकार सत्य भाषण का फल अश्वमेध यज्ञ को सम्पन्न करने
से भी कहीं अधिक है।
वरं कूपशताद्वापी वरं वापीशतात् क्रतुः।
वरं क्रतुशतात् पुत्रः सत्यं पुत्रशताद् वरम्॥ 212 ॥
सौ कूपों को खुदवाने की अपेक्षा एक वापी का खुदवाना अधिक उत्तम है,
सौ वापियों की अपेक्षा वेदविहित यज्ञ को सम्पन्न करने का फल अधिक है, सौ
यज्ञों को सम्पन्न करने की अपेक्षा एक पुत्र को जन्म देना अधिक सार्थक है और सौ
पुत्रों का पिता बनने की अपेक्षा सत्य का दृढ़ता से पालन करना अधिक फलदायक है।
भूर्धारयति सत्येन सत्येनोदेति भास्करः।
सत्येन वायुः प्लवते सत्येनापः स्रवन्ति च ॥ 213॥
सत्य के बल पर ही पृथिवी जगत् को धारण करती है, सत्य की शक्ति से सूर्य
उदित है, वायु प्रवाहित होता है तथा जल नीचे की ओर सरकता है। सत्य की
महिमा अनन्त एवं अपार है।
सत्यमेव परं दानं सत्यमेव परं तपः।
सत्यमेव परो धर्मो लोकानामिति नः श्रुतम्॥ 214 ॥
महर्षियों एवं सिद्ध महात्माओं ने सत्य को ही सर्वोत्तम दान, श्रेष्ठ तप एवं
उत्कृष्ट धर्म माना है। श्रुति ने भी इस तथ्य का समर्थन किया है।
सत्यं देवाः समासेन मनुष्यास्त्वनृतं स्मृतम्।
इहैव तस्य देवत्वं यस्य सत्ये स्थिता मतिः॥ 215 ॥
सत्य की महिमा को संक्षेप में तथा निष्कर्ष रूप में कहना चाहें, तो यही
कहा जा सकता है कि देवता सत्य रूप हैं और मनुष्य असत्य रूप है। सत्य के
कारण ही देवों का देवत्व है और मनुष्यलोक की अपेक्षा देवलोक की महत्ता एवं
प्रतिष्ठा है। सत्य में मति होने के कारण ही देवता मनुष्यों से ज्येष्ठ श्रेष्ठ हैं।
सत्यं ब्रूहनृतं त्यक्त्वा सत्येन स्वर्गमेष्यसि।
उक्त्वानृतं महाघोरं नरकं प्रतिपत्स्यसे॥ 216॥
यह सब सुनाने के उपरान्त न्यायाधीश को साक्ष्य के लिए उपस्थित व्यक्तियों
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को सम्बोधित करते हुए कहना चाहिए-सज्जनो! आप लोग असत्य का तथा
छल कपट का, किसी प्रकार के गोपन के प्रयास का सर्वथा परित्याग करके
सत्य-यथाश्रुत एवं यथादृष्ट, अर्थात् यथार्थ--का वर्णन करें। सत्य को धारण करने
से आप लोगों के मन को शान्ति मिलेगी और मरणोपरान्त स्वर्गलोक के रूप में
सद्गति होगी। इसके विपरीत मिथ्या-भाषण करने का अर्थ न्याय की हत्या करना
होगा। इस अपराध का दण्ड मानसिक शान्ति की समाप्ति, लोक में अपकीर्ति, न्याय
न पाने वाले की हाय और मरणोपरान्त दुर्गति-नरकगमन-होगा।
नरकेषु च ते शश्वज्जिव्हामुत्कृत्य दारुणाः।
असिभिः शातयिष्यन्ति बलिनो यमकिङ्कराः ॥ 217 ॥
शास्त्र के इस वचन को कभी नहीं भूलना कि यमराज के निर्मम, बलवान्,
भयंकर एवं आतंककारी सेवक झूठ बोलने वालों की जीभ काट डालते हैं और
तलवार से उनके शरीर को काटकर भरता बना देते हैं।
शूलैर्भैत्स्यसि चाक्रम्य क्रोशन्तमपरायणम् ।
अवस्थितं समुत्कृत्य क्षेप्स्यन्ति त्वां हुताशने ॥ 218 ॥
यमराज के क्रूर एवं आततायी सेवक झूठ बोलने वालों को शूलों से बींधकर
और उन्हें खण्ड-खण्ड करके कुछ टुकड़े गिद्धों कौओं को फेंक देते हैं और कुछ
टुकड़े आग में फेंक देते हैं।
अनुभूय च तास्तीव्राश्चिरं नरकवेदनाः।
रह यास्यसि पापासु गृध्रकाकादियोनिषु ॥ 219 ॥
मिथ्या-साक्ष्य देने वाले दुष्ट व्यक्ति नरक में दीर्घकाल तक अनेक घोर एवं
विषम कष्टों को भोगने के उपरान्त गिद्ध, कौए आदि निकृष्ट पक्षियों की योनि में
जन्म लेते हैं और दुःख झेलते हैं।
ज्ञात्वैताननृते दोषान् ज्ञात्वा सत्ये च सद्गुणान् ।
सत्यं वदोद्धरात्मानं नात्मानं पातय स्वयम् ॥ 220 ॥
अतः बन्धुओ! सत्य के गुणों और असत्य के दोषों को भली प्रकार समझ कर
असत्य का परित्याग करो और सत्य को दृढ़ता से ग्रहण करो। अपनी आत्मा का
उद्धार करना अथवा अपने को पतन के गर्त में डुबोना आपके अपने ही हाथ में है।
न बान्धवा न सुहृदो न धनानि महान्त्यपि ।
अलं धारयितुं शक्तास्तमस्युग्रे निमज्जतः ॥ 221 ॥
असत्य-भाषण करके स्वयं अपने आपको गहरे अन्धकार में धकेलने वाले
की उसके आत्मीय बन्धु-बान्धव, हित चिन्तक मित्र तथा विपुल धन सम्पदा तथा
समृद्ध-साधन आदि कुछ भी सहायता नहीं कर सकते। उसके उद्धार में किसी
प्रकार समर्थ नहीं हो सकते।
नारदस्मृति / 119

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पितरस्त्ववलम्बन्ते त्वयि साक्षित्वमागते।
तारयिष्यति किं तस्मात् किं चायं पातयिष्यति ॥ २२२ ॥
साक्ष्य के लिए उपस्थित आप लोगों की ओर आपके पितर बड़ी उत्सुकता से
देख रहे हैं कि हमारी सन्तति हमारे नाम को उज्ज्वल करती है कि हमें अपमानित
करती है। आपके सत्य बोलने से आपके पितर प्रसन्न होंगे और उन्हें सुख मिलेगा।
इसके विपरीत आपके मिथ्या-भाषण से वे भी आत्मग्लानि तथा लज्जा से अपना
सिर झुकाने को विवश होंगे। आपके पितर निकृष्ट आचरण वाली पीढ़ी को देखकर
दुखी और खिन्न होंगे। अब यह आपके अपने हाथ में है कि आप अपने पितरों को
तृप्त करते हैं कि सन्तप्त करते हैं।
सत्यमात्मा मनुष्यस्य सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्।
सत्यमुक्त्वात्मनात्मानं श्रेयसा सन्नियोजय ॥ २२३ ॥
अपनी आत्मा की ध्वनि को सुनिये। आत्मा सत्स्वरूप परमात्मा का अंश होने
से सत्य है। सत्य के बल पर ही धरती स्थिर है। सत्य-भाषण के द्वारा आप अपनी
आत्मा को श्रेय के साथ जोड़कर अपना ही हित करेंगे। आप लोग मिथ्या-भाषण
करके अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने की भूल कदापि न कीजिये।
यस्यां रात्रावजनिष्ठा यस्यां रात्रौ मरिष्यसि।
वृथा तदन्तरं तुभ्यं साक्ष्यं चेदन्यथा कृथाः ॥ २२४ ॥
आपके द्वारा मिथ्या-भाषण का अर्थ—अमूल्य मानव-जीवन को सर्वथा नष्ट
करना होगा। जन्म से मृत्यु की मध्यावधि में किये गये आपके सभी शुभकर्म
आपके मिथ्या-साक्ष्य देते ही तत्क्षण भस्म हो जायेंगे और आप घोर पापी बन
जायेंगे।
ब्रह्मघ्नस्य तु ये लोका ये च स्त्री बालघातिनाम्।
ये च लोकाः कृतघ्नस्य ते ते स्युर्ब्रुवतो यथा ॥ २२५ ॥
इस तथ्य का कभी विस्मरण नहीं करना चाहिए कि मिथ्या साक्ष्य देने वालों
को ब्रह्महत्या करने वाले, अबला का वध करने वाले, अबोध बालक की हत्या
करने वाले और कृतघ्न व्यक्तियों को मिलने वाले घने अन्धकार से घिरे अत्यन्त
दुर्गन्धित नरकों की प्राप्ति होती है।
नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम्।
साक्षिधर्मे विशेषेण सत्यमेव वदेदतः ॥ २२६ ॥
सत्य से बड़ा कोई दूसरा धर्म और असत्य से बड़ा कोई दूसरा पाप इस धरती
पर है ही नहीं। साक्षियों के लिए तो सत्य भाषण का विशेष महत्त्व है, अतः मेरा
आपसे सत्य बोलने का पुनः पुनः अनुरोध है।
टिप्पणी—इस सम्बन्ध में पुराण में कहा गया है—
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साक्षी साक्ष्य देते समय सत्य-भाषण करता है अथवा असत्य बोलता है—
इसे कुबेर, आदित्य, वरुण, इन्द्र तथा वैवस्वत आदि देवता तथा सभी लोकपाल
अपनी दिव्य दृष्टि से देखते रहते हैं। अतः व्यक्ति इस लोक के प्राणियों से भले ही
वास्तविकता को छिपा ले, परन्तु अन्तर्यामी, सर्वज्ञ परमात्मा एवं उसके दिव्य पुत्रों-
देवों आदि से तो कुछ भी छिपाना सम्भव नहीं। इस तथ्य को जानने के उपरान्त भी
मिथ्या-साक्ष्य देने वाले को तो निपट मूर्ख ही मानना होगा।
यः परार्थे प्रहिणुयात् स्वां वाचं पुरुषार्थमः।
आत्मार्थे किं न कुर्यात् स पापो नरकनिर्भयः ॥ २२७ ॥
दूसरों के लिए अपनी वाणी को कलुषित करने वाले को नीच, विवेकहीन
और अधम पुरुष न कहा जाये, तो क्या कहा जाये? यहां यह भी विचारणीय हो
जाता है कि दूसरों के लिए पापाचरण करने वाला भला अपने हित-साधन के लिए
किस प्रकार निकृष्ट कार्य नहीं कर सकता? ऐसे आदमी पर भला कौन भरोसा
करेगा?
वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिस्सृता।
यो हि तां स्तेनयेद्वाचं ससर्वस्तेयकृन्नरः ॥ २२८ ॥
विश्व के सभी व्यापार—लेन-देन, सम्बन्ध-योजना, शिक्षा-दीक्षा तथा शाप
वरदान आदि-वाणी के ही विषय हैं। वाणी से उच्चरित शब्दों में ही अर्थ निहित
रहते हैं। मनुष्य के मन के भाव वाणी द्वारा ही निकलते-प्रकट होते हैं। इस प्रकार
वाक्इन्द्रिय का अन्य इन्द्रियों की अपेक्षा विशेष महत्त्व है। इस वाक्इन्द्रिय का
दुरुपयोग करने वाला, अर्थात् मिथ्या-भाषण करने वाला सभी पदार्थों के हरण के
पाप का भागी होता है।
साक्षिविप्रतिपत्तौ तु प्रमाणं बहवो यतः।
तत्साम्ये शुचयो ग्राह्यस्तत्साम्ये स्मृतिमत्तराः ॥ २२९ ॥
साक्षियों के साक्ष्य में अन्तर पाये जाने पर सत्य के निर्णय के लिए प्रमाणों का
निरीक्षण परीक्षण करना चाहिए। प्रमाणों में एकरूपता मिलने पर ही साक्ष्य की
पवित्रता को स्वीकार करना चाहिए। प्रमाण उपलब्ध न होने पर सुप्रसिद्ध पवित्र
आचरण वालों की स्मरणशक्ति को आधार बनाकर सत्य पर पहुंचने का प्रयास
करना चाहिए।
स्मृतिमत्साक्षिसाम्यं तु विवादे यत्र दृश्यते।
सूक्ष्मत्वात् साक्षिधर्मस्य साक्ष्यं व्यावर्तते ततः ॥ २३० ॥
तीव्र स्मृति वाले सदाचारी साक्षियों के कथन में एकरूपता पाये जाने पर सत्य
के निर्णय में सुविधा होती है। क्षीण स्मृति वाले लोगों को साक्षी बनने का अधिकार
ही नहीं। ऐसे लोगों को साक्ष्य देने के पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहिए; क्योंकि वे
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तो इसके पात्र ही नहीं। जब उन्हें ठीक से कुछ याद ही नहीं रहता, तो फिर वे सही
तथ्यों को प्रस्तुत ही कैसे कर सकते हैं ?
स्वसाक्षिवर्जितो यस्तु दैववादी कथञ्चन।
उद्धारं तस्य नेच्छन्ति दिव्यैनापि मनीषिणः ॥ 231 ॥
साक्षी को साक्ष्य देने से रोकने वाले व्यक्ति को धर्म पर आस्था और ईश्वर पर
विश्वास रखने वाला माना ही नहीं जा सकता; क्योंकि साक्ष्य तो विवाद-निर्णय में
सहायक होने के कारण धर्मकार्य है और उसमें बाधा डालना तो बड़ा भारी पाप है।
धर्म और न्याय इस पापकर्म की अनुमति नहीं देते, अपितु इसे दण्डनीय अपराध
मानते हैं।
निर्दिष्टेष्वर्थजातेषु साक्षी चेत् साक्ष्य आगते।
न ब्रूयादक्षरसमं न तन्निगदितं भवेत् ॥ 232 ॥
निर्दिष्ट विषयों में साक्ष्य देने के लिए उपस्थित व्यक्ति अपने वक्तव्य की
सत्यता को सिद्ध करने के लिए समुचित प्रमाण नहीं जुटा पाता। ऐसे साक्षी की
उपस्थिति को भी अनुपस्थिति के रूप में ही लेना चाहिए; क्योंकि ऐसे व्यक्ति ने
आकर भी विवाद-निर्णय में कुछ सहयोग नहीं किया।
देशकालवयो द्रव्य प्रमाणाकृतिजातिषु।
यत्र विप्रतिपत्तिः स्यात् साक्ष्यं तदपि चान्यथा ॥ 233 ॥
साक्षी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य में और वास्तविक रूप में सम्बद्ध घटना के घटित
होने के स्थान, समय, सम्बद्ध व्यक्ति की आयु, जाति तथा आकृति और विवाद का
विषय बनी धन-राशि के परिमाण आदि के सम्बद्ध में उलट-फेर मिलने पर साक्ष्य
को असिद्ध और अमान्य घोषित कर देना चाहिए; क्योंकि ऐसे साक्ष्य को वास्तविकता
से परिचित माना ही नहीं जा सकता।
ऊनं वाप्यधिकं वार्थं प्रब्रूयुर्यत्र साक्षिणः।
तदप्यनुक्तं विज्ञेयमेष साल्यविधि स्मृतः ॥ 234 ॥
साक्ष्य स्वीकृति का यह भी नियम अथवा विधान है कि लेन-देन में आयी
और विवाद का विषय बनी धन-राशि के परिमाण को यथार्थ रूप में बताने के
स्थान पर न्यूनाधिक बताने वाले साक्षी के वक्तव्य को भी पूर्णतः अमान्य एवं
असिद्ध घोषित कर देना चाहिए।
प्रमादाद्धनिनो यत्र न स्याल्लेख्यं न साक्षिणः।
अर्थ चापह्नुते वादी तत्रोक्तस्त्रिविधो विधिः ॥ 235 ॥
उत्तमर्ण धनिक ने अधमर्ण को ऋण देते समय प्रमादवश न तो लिखा-पढ़ी
की है और न ही किसी को साक्षी बनाया है, विश्वास पर धन दे दिया है और अब
अधमर्ण ने विश्वास भंग करते हुए ऋण लेने को नकार दिया है। इस स्थिति में
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