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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 118 of 304

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Page 118

प्रबोधित करते हुए कहना चाहिए-मिथ्या साक्ष्य देने वाले को नंगा, गंजा, भूखा
और प्यासा होकर दुःख भोगना पड़ता है, उसे अपनी क्षुधा-निवृत्ति के लिए हाथ में
कपाल लेकर भीख मांगने को विवश होना पड़ता है। झूठी गवाही देने वाले को
अन्धा होना पड़ता है और यहां तक कि शत्रु के घर की चाकरी तक करनी पड़
जाती है।
नग्नो मुण्डः कपालेन परद्वारे बुभुक्षितः ।
अमित्रान् भूयशः पश्येद्यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ॥ 202 ॥
मिथ्या साक्ष्य देने वाले को अभावग्रस्त जीवन जीना पड़ता है, उसे वस्त्रहीन
(नंगा) सिर मुंडा फ़क़ीर बनकर अपनी भूख मिटाने के लिए शत्रु के घर से भीख
मांगने को विवश होना पड़ता है। ऐसे दुर्दशाग्रस्त व्यक्ति को पग-पग पर अपने
शत्रुओं का सामना करना पड़ता है, अर्थात् उसे लज्जित एवं अपमानित होना पड़ता
है।
यां रात्रिर्माधविन्नास्त्री यां चैवाक्षपराजितः ।
यां च भाराभितप्ताङ्गो दुर्विवक्ता स तां वसेत् ॥ 203 ॥
जिस प्रकार पुरुष द्वारा दूसरी स्त्री को अपनाने पर उसकी पत्नी असह्य वेदना
से व्यथित हो उठती है, अर्थात् उसकी आंखों से नींद ग़ायब हो जाती है, उसके
लिए रात्रि का एक-एक पल बिताना एक समस्या का रूप ले लेता है, वह जल
बिन मछली के समान तड़पती है, जिस प्रकार द्यूत में सब कुछ हार चुके व्यक्ति की
सुख-शान्ति काफ़ूर हो जाती है, ऋण उतारने की चिन्ता उसे कहीं का नहीं रखती,
जिस प्रकार सामर्थ्य से अधिक भार उठाने वाले श्रमिक के लिए एक-एक पग
चलना और लक्ष्य पर पहुंचना कष्टसाध्य हो जाता है, उसी प्रकार झूठा साक्ष्य देने
वाला कभी सुख-शान्ति का जीवन नहीं जी सकता। उसका अपराध-बोध उसे
कहीं चैन से बैठने नहीं दे सकता।
साक्षी साक्ष्ये समुद्दिशन् गोकर्णशिथिलं वचः।
सहस्रं वारुणान् पाशान् भुङ्क्त स बन्धाद् ध्रुवम् ॥ 204 ॥
जो भी व्यक्ति साक्ष्य के लिए न्यायालय में उपस्थित होकर दृढ़ता और
विश्वास के साथ अपना साक्ष्य न देकर शिथिलता बरतता है, गाय के कान के
समान केवल उपस्थिति दर्ज कराता है, 'हां' 'न' में उत्तर देकर साक्ष्य को स्पष्ट
वाणी नहीं देता, ऐसा व्यक्ति वरुणदेव की दृष्टि में अपराधी है। वरुणदेव उसे अपने
हज़ारों पाशों से बांधकर असीम दुःख देते हैं।
तस्य वर्षशते पूर्णे पाश एव प्रमुच्यते ।
तदा पाशाद्विनिर्मुक्तः स्त्री सम्भवति मानवः ॥ 205 ॥
मिथ्या-साक्ष्य देने वाला वरुण के क्रोध का पात्र बनता है और सौ वर्षों तक
116 / नारदस्मृति