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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 105 of 304

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Page 105

सन्दिग्धेषु च कार्येषु द्वयोर्विवदमानयोः।
श्रुतदृष्टानुभूतार्थान् साक्षिभ्यो व्यक्तिदर्शनम्॥ 147 ॥
वादी-प्रतिवादी के मध्य किसी विषय पर मतभेद हो जाने पर दोनों में लेन
देन होने के समय उपस्थित प्रत्यक्षदर्शी अथवा दोनों में बातचीत कराने वाले अथवा
इस विषय से परिचित साक्षियों को सब कुछ यथावत् बताकर संशय अथवा सन्देह
का निराकरण कर देना चाहिए।
समक्षदर्शनात्साक्षी विज्ञेयः श्रोत्रचक्षुषोः।
श्रोत्रस्य यत् परो ब्रूते चक्षुषोर्दर्शनं स्वयंम्॥ 148॥
दो पक्षों में किये जाने वाले किसी समझौते की चर्चा कानों से सुनी जाती है
और चर्चा करने वालों को आंखों से देखा जाता है। इस प्रकार अपने कानों से सुनने
वाला तथा अपने नेत्रों से देखने वाला साक्षी कहलाता है। ऐसे साक्षी का साक्ष्य भी
प्रमाण होता है।
एकादशविधः साक्षी शास्त्रदृष्टो मनीषिभिः।
कृतः पञ्चविधस्तेषां षड्विधोऽकृत उच्यते॥ 149॥
विधिशास्त्र के तत्त्ववेत्ता मनीषियों ने साक्षियों के ग्यारह भेद स्वीकार किये हैं
और उन ग्यारह में से पांच भेदों को 'कृत,' अर्थात् स्वयं स्वीकृत (मनोनीत) तथा
छह भेदों को 'अकृत' माना है।
लिखितः स्मारितश्चैव यदृच्छाभिज्ञ एव च।
गूढश्चोत्तरसाक्षी च साक्षी पञ्चविधः कृतः॥ 150॥
पांच 'कृत' साक्षी निम्नोक्त रूप से हैं-

  1. लिखित- लिखित ऋण पत्र पर हस्ताक्षर करने वाला।
  2. स्मारित- अपने कानों से सुने वचनों को उद्धृत करने वाला।
  3. यदृच्छाभिज्ञ- व्यवहार के समय बिना बुलाये अपनी इच्छा से आने
    और सारी घटना की जानकारी रखने वाला।
  4. गूढ़- छिपकर सारी बातचीत को सुनने देखने वाला तथा
  5. उत्तरसाक्षी- कानों में भनक पड़ने की (Over hear) कहने वाला।
    षडेते पुनरुद्दिष्टाः साक्षिणस्त्वकृताः स्वयम्।
    ग्रामश्च प्राड्विवाकश्च राजा च व्यवहारिणाम्॥ 151॥
    कार्येष्वभ्यन्तरो यः स्यादर्थिना प्रहितश्च यः।
    कुल्याः कुलविवादेषु भवेयुस्तेऽपि साक्षिणः॥ 152॥
    छह अकृत साक्षी निम्नोक्त रूप से हैं-
  6. ग्राम- ग्राम के मध्य घटित घटना का सारा ग्राम ही साक्षी रहता है, ग्राम
    से अभिप्राय है ग्रामीण व्यक्ति।
    नारदस्मृति / 103