नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextसाक्षी साक्ष्य देते समय सत्य-भाषण करता है अथवा असत्य बोलता है—
इसे कुबेर, आदित्य, वरुण, इन्द्र तथा वैवस्वत आदि देवता तथा सभी लोकपाल
अपनी दिव्य दृष्टि से देखते रहते हैं। अतः व्यक्ति इस लोक के प्राणियों से भले ही
वास्तविकता को छिपा ले, परन्तु अन्तर्यामी, सर्वज्ञ परमात्मा एवं उसके दिव्य पुत्रों-
देवों आदि से तो कुछ भी छिपाना सम्भव नहीं। इस तथ्य को जानने के उपरान्त भी
मिथ्या-साक्ष्य देने वाले को तो निपट मूर्ख ही मानना होगा।
यः परार्थे प्रहिणुयात् स्वां वाचं पुरुषार्थमः।
आत्मार्थे किं न कुर्यात् स पापो नरकनिर्भयः ॥ २२७ ॥
दूसरों के लिए अपनी वाणी को कलुषित करने वाले को नीच, विवेकहीन
और अधम पुरुष न कहा जाये, तो क्या कहा जाये? यहां यह भी विचारणीय हो
जाता है कि दूसरों के लिए पापाचरण करने वाला भला अपने हित-साधन के लिए
किस प्रकार निकृष्ट कार्य नहीं कर सकता? ऐसे आदमी पर भला कौन भरोसा
करेगा?
वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिस्सृता।
यो हि तां स्तेनयेद्वाचं ससर्वस्तेयकृन्नरः ॥ २२८ ॥
विश्व के सभी व्यापार—लेन-देन, सम्बन्ध-योजना, शिक्षा-दीक्षा तथा शाप
वरदान आदि-वाणी के ही विषय हैं। वाणी से उच्चरित शब्दों में ही अर्थ निहित
रहते हैं। मनुष्य के मन के भाव वाणी द्वारा ही निकलते-प्रकट होते हैं। इस प्रकार
वाक्इन्द्रिय का अन्य इन्द्रियों की अपेक्षा विशेष महत्त्व है। इस वाक्इन्द्रिय का
दुरुपयोग करने वाला, अर्थात् मिथ्या-भाषण करने वाला सभी पदार्थों के हरण के
पाप का भागी होता है।
साक्षिविप्रतिपत्तौ तु प्रमाणं बहवो यतः।
तत्साम्ये शुचयो ग्राह्यस्तत्साम्ये स्मृतिमत्तराः ॥ २२९ ॥
साक्षियों के साक्ष्य में अन्तर पाये जाने पर सत्य के निर्णय के लिए प्रमाणों का
निरीक्षण परीक्षण करना चाहिए। प्रमाणों में एकरूपता मिलने पर ही साक्ष्य की
पवित्रता को स्वीकार करना चाहिए। प्रमाण उपलब्ध न होने पर सुप्रसिद्ध पवित्र
आचरण वालों की स्मरणशक्ति को आधार बनाकर सत्य पर पहुंचने का प्रयास
करना चाहिए।
स्मृतिमत्साक्षिसाम्यं तु विवादे यत्र दृश्यते।
सूक्ष्मत्वात् साक्षिधर्मस्य साक्ष्यं व्यावर्तते ततः ॥ २३० ॥
तीव्र स्मृति वाले सदाचारी साक्षियों के कथन में एकरूपता पाये जाने पर सत्य
के निर्णय में सुविधा होती है। क्षीण स्मृति वाले लोगों को साक्षी बनने का अधिकार
ही नहीं। ऐसे लोगों को साक्ष्य देने के पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहिए; क्योंकि वे
नारदस्मृति / 121