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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

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  1. स्तेन (चोर), 2. साहसिक (डाकू-डंके की चोट पर दूसरों को लूटने
    वाला), 3. क्रूर दया ममता रहित, अत्याचारी एवं आततायी, अर्थात् अकारण-
    सकारण किसी की हत्या करने में भी संकोच न करने वाला, 4. धूर्त एवं शठ,
    अर्थात् दूसरों को तंग परेशान करने को ही अपना मनोरंजन मानने वाला तथा
  2. हिंसक, अर्थात् जीवहत्या करने वाला।
    ऐसे दुष्टों का वचन कभी विश्वसनीय नहीं होता। अतः इन्हें साक्षी बनाना
    कदापि उचित नहीं।
    राज्ञा परिगृहीतेषु साक्षिष्वेकार्थनिश्चये।
    वचनं यत्र भिद्येत ते स्युर्भेदादसाक्षिणः ॥ 160 ॥
    राग द्वेष से अथवा लोभ-लालच से किसी भी समय अपने वचन से मुकर
    जाने वाले तथा न्यायालय के बाहर कुछ और न्यायालय के भीतर कुछ कहने वाले,
    अर्थात् अस्थिर प्रकृति के, आसानी से बिक जाने वाले तथा धर्म को महत्त्व न देने
    वाले व्यक्तियों को भी साक्षी नहीं बनाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति भी साक्षी बनने योग्य
    नहीं होते।
    अनिर्दिष्टस्तु साक्षित्वे स्वयमेवैत्य यो वदेत्।
    शुचीत्युक्तः स शास्त्रेषु न स साक्षित्वमर्हति ॥ 161 ॥
    शास्त्रों के अनुसार घटना के समय उपस्थित न रहने वाला, अर्थात् प्रत्यक्षदर्शी
    तथा प्रत्यक्षश्रोता न होने पर भी साक्ष्य देने के लिए अपनी सहमति जतलाने वाले
    व्यक्ति को भी अपात्र ही मानना चाहिए। ऐसे व्यक्ति का आचरण धर्मविरुद्ध होने के
    कारण उसका साक्ष्य सर्वथा अनुचित एवं अग्राह्य समझना चाहिए।
    योऽर्थः श्रावयितव्यः स्यात्तस्मिन्नसति चार्थिनि ।
    कुतस्तद्वतु साक्षित्वमित्यसाक्षी मृतान्तरः ॥ 162 ॥
    व्यवहार के विचार के समय जीवित व्यक्ति ही अपने साक्ष्य के द्वारा सत्य पर
    प्रकाश डाल सकता है। मृत व्यक्ति तो कुछ कहने के लिए नहीं आ सकता। मृत
    व्यक्ति के स्थान पर कोई दूसरा व्यक्ति मृत व्यक्ति के मुख से बोले और अपने कान
    से सुने वचन के आधार पर मृतक का स्थानापन्न, अर्थात् उसका प्रतिनिधि बनकर
    साक्ष्य नहीं दे सकता। ऐसे व्यक्ति को भी साक्षी नहीं बनाना चाहिए।
    द्वयोर्विवदतोरर्थे द्वयोः सत्सु च साक्षिषु।
    पूर्वपक्षो भवेद्यस्य भवेयुस्तस्य साक्षिणः ॥ 163 ॥
    दोनों-पूर्वपक्ष अथवा वादी तथा उत्तरपक्ष अथवा प्रतिवादी-द्वारा अपने-
    अपने पक्ष में साक्षियों को प्रस्तुत करने में पूर्वपक्ष के साक्षियों के साक्ष्य को ही
    वरीयता देनी चाहिए।
    106 / नारदस्मृति