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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 107 of 304

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का तथा आंखों से देखे का यथावत् वर्णन करना है, परिणाम की चिन्ता नहीं करनी
है। व्यक्ति-विशेष के प्रति द्वेष भाव रखने वाला व्यक्ति साक्षि-धर्म का निर्वाह कर
ही नहीं सकता। अतः ऐसे व्यक्ति को कभी साक्षी नहीं बनाना चाहिए।
असाक्ष्यपि हि शास्त्रेऽस्मिन् दृष्टः पञ्चविधो बुधैः ।
वचनादोषतो भेदान् स्वयमुक्तिर्मृत्तान्तरः ॥ 157 ॥
विधिवेत्ता पण्डितों ने असाक्षो—साक्षी न बनने योग्य—व्यक्तियों के निम्नोक्त
पांच रूप-भेद माने हैं—

  1. अपने वचन से मुकरने वाला, अर्थात् साक्ष्य भरने की स्वीकृति देकर
    समय आने पर मुकर जाने वाला अथवा कहने योग्य तथ्य न कहने वाला अथवा
    अपने ही कथन को सही न कर पाने वाला, अर्थात् किसी एक बात पर स्थिर न
    रहने वाला।
  2. दोषग्रस्त—शारीरिक रूप से पंगु -काणा, बधिर अथवा अन्य किसी
    विकार से ग्रस्त अथवा चारित्रिक रूप से लाञ्छित।
  3. भेद-बुद्धि रखने वाला व्यक्ति, अर्थात् एक के सामने कुछ और दूसरे के
    सामने कुछ और कहने वाला व्यक्ति।
  4. अपने आपको साक्ष्य के लिए प्रस्तुत करने वाला व्यक्ति। निश्चित है कि
    ऐसा व्यक्ति या तो स्वार्थ-प्रेरित है या धूर्त है। वह या तो आपके विरोधी का विरोधी
    है या फिर आप से कुछ पाना चाहता है।
  5. मृत व्यक्ति।
    श्रोत्रियास्तापसा वृद्धा ये च प्रव्रजिता नराः ।
    असाक्षिणस्ते वचनान्नात्र हेतुरुदाहृतः ॥ 158 ॥
    निम्नोक्त चार—1. वेदपाठी ब्राह्मण, 2. तपस्वी, 3. वृद्ध, चलने-फिरने आदि
    में असमर्थ तथा 4. संन्यासी—को कभी साक्षी नहीं बनाना चाहिए। इसके कारण
    के निर्देश की आवश्यकता नहीं; क्योंकि स्पष्ट है कि एक तो ये लोग विरक्त प्रकृति
    के होते हैं, इन्हें सांसारिक झंझटों से लगाव नहीं होता, इसलिए ये किसी भी समय
    न्यायालय में उपस्थित होने से इनकार कर सकते हैं। द्वितीय, ये सीधे-सादे व्यक्ति
    वकील और न्यायाधीश के उलटे सीधे प्रश्नों का सामना करने में असमर्थ होते हैं।
    अतः ये कुछ का कुछ कह सकते हैं। तृतीय, न्यायालय में इनका उपस्थित होना
    इनके लिए शोभनीय भी नहीं होता।
    स्तेनाः साहसिकार्च्चण्डाः कितवा बधकाश्च ये।
    असाक्षिणस्ते दुष्टत्वात्तेषु सत्यं न विद्यते ॥ 159 ॥
    निम्नोक्त पांच प्रकार के व्यक्ति समाज द्वारा अवहेलित, कलंकित और दुश्चरित्र
    होने के कारण साक्षी होने योग्य नहीं, अर्थात् इन्हें साक्षी नहीं बनाना चाहिए। ये
    लोग किसी भी समय धोखा दे सकते हैं—
    नारदस्मृति / 105