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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

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Page 120

परित्याग कभी नहीं करना चाहिए; क्योंकि यही एकमात्र अद्वितीय और सुनिश्चित
सम्बल है।
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्।
अश्वमेधसहस्रात्तु सत्यमेव विशिष्यते॥ 211॥
यदि तुला के एक पलड़े पर सैकड़ों अश्वमेधादि यज्ञों के फल को रखा जाये
और दूसरे पलड़े में सत्य को रखा जाये, तो निश्चित समझिये कि सत्य का पलड़ा
ही भारी पड़ेगा। इस प्रकार सत्य भाषण का फल अश्वमेध यज्ञ को सम्पन्न करने
से भी कहीं अधिक है।
वरं कूपशताद्वापी वरं वापीशतात् क्रतुः।
वरं क्रतुशतात् पुत्रः सत्यं पुत्रशताद् वरम्॥ 212 ॥
सौ कूपों को खुदवाने की अपेक्षा एक वापी का खुदवाना अधिक उत्तम है,
सौ वापियों की अपेक्षा वेदविहित यज्ञ को सम्पन्न करने का फल अधिक है, सौ
यज्ञों को सम्पन्न करने की अपेक्षा एक पुत्र को जन्म देना अधिक सार्थक है और सौ
पुत्रों का पिता बनने की अपेक्षा सत्य का दृढ़ता से पालन करना अधिक फलदायक है।
भूर्धारयति सत्येन सत्येनोदेति भास्करः।
सत्येन वायुः प्लवते सत्येनापः स्रवन्ति च ॥ 213॥
सत्य के बल पर ही पृथिवी जगत् को धारण करती है, सत्य की शक्ति से सूर्य
उदित है, वायु प्रवाहित होता है तथा जल नीचे की ओर सरकता है। सत्य की
महिमा अनन्त एवं अपार है।
सत्यमेव परं दानं सत्यमेव परं तपः।
सत्यमेव परो धर्मो लोकानामिति नः श्रुतम्॥ 214 ॥
महर्षियों एवं सिद्ध महात्माओं ने सत्य को ही सर्वोत्तम दान, श्रेष्ठ तप एवं
उत्कृष्ट धर्म माना है। श्रुति ने भी इस तथ्य का समर्थन किया है।
सत्यं देवाः समासेन मनुष्यास्त्वनृतं स्मृतम्।
इहैव तस्य देवत्वं यस्य सत्ये स्थिता मतिः॥ 215 ॥
सत्य की महिमा को संक्षेप में तथा निष्कर्ष रूप में कहना चाहें, तो यही
कहा जा सकता है कि देवता सत्य रूप हैं और मनुष्य असत्य रूप है। सत्य के
कारण ही देवों का देवत्व है और मनुष्यलोक की अपेक्षा देवलोक की महत्ता एवं
प्रतिष्ठा है। सत्य में मति होने के कारण ही देवता मनुष्यों से ज्येष्ठ श्रेष्ठ हैं।
सत्यं ब्रूहनृतं त्यक्त्वा सत्येन स्वर्गमेष्यसि।
उक्त्वानृतं महाघोरं नरकं प्रतिपत्स्यसे॥ 216॥
यह सब सुनाने के उपरान्त न्यायाधीश को साक्ष्य के लिए उपस्थित व्यक्तियों
118 / नारदस्मृति