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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 121 of 304

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Page 121

को सम्बोधित करते हुए कहना चाहिए-सज्जनो! आप लोग असत्य का तथा
छल कपट का, किसी प्रकार के गोपन के प्रयास का सर्वथा परित्याग करके
सत्य-यथाश्रुत एवं यथादृष्ट, अर्थात् यथार्थ--का वर्णन करें। सत्य को धारण करने
से आप लोगों के मन को शान्ति मिलेगी और मरणोपरान्त स्वर्गलोक के रूप में
सद्गति होगी। इसके विपरीत मिथ्या-भाषण करने का अर्थ न्याय की हत्या करना
होगा। इस अपराध का दण्ड मानसिक शान्ति की समाप्ति, लोक में अपकीर्ति, न्याय
न पाने वाले की हाय और मरणोपरान्त दुर्गति-नरकगमन-होगा।
नरकेषु च ते शश्वज्जिव्हामुत्कृत्य दारुणाः।
असिभिः शातयिष्यन्ति बलिनो यमकिङ्कराः ॥ 217 ॥
शास्त्र के इस वचन को कभी नहीं भूलना कि यमराज के निर्मम, बलवान्,
भयंकर एवं आतंककारी सेवक झूठ बोलने वालों की जीभ काट डालते हैं और
तलवार से उनके शरीर को काटकर भरता बना देते हैं।
शूलैर्भैत्स्यसि चाक्रम्य क्रोशन्तमपरायणम् ।
अवस्थितं समुत्कृत्य क्षेप्स्यन्ति त्वां हुताशने ॥ 218 ॥
यमराज के क्रूर एवं आततायी सेवक झूठ बोलने वालों को शूलों से बींधकर
और उन्हें खण्ड-खण्ड करके कुछ टुकड़े गिद्धों कौओं को फेंक देते हैं और कुछ
टुकड़े आग में फेंक देते हैं।
अनुभूय च तास्तीव्राश्चिरं नरकवेदनाः।
रह यास्यसि पापासु गृध्रकाकादियोनिषु ॥ 219 ॥
मिथ्या-साक्ष्य देने वाले दुष्ट व्यक्ति नरक में दीर्घकाल तक अनेक घोर एवं
विषम कष्टों को भोगने के उपरान्त गिद्ध, कौए आदि निकृष्ट पक्षियों की योनि में
जन्म लेते हैं और दुःख झेलते हैं।
ज्ञात्वैताननृते दोषान् ज्ञात्वा सत्ये च सद्गुणान् ।
सत्यं वदोद्धरात्मानं नात्मानं पातय स्वयम् ॥ 220 ॥
अतः बन्धुओ! सत्य के गुणों और असत्य के दोषों को भली प्रकार समझ कर
असत्य का परित्याग करो और सत्य को दृढ़ता से ग्रहण करो। अपनी आत्मा का
उद्धार करना अथवा अपने को पतन के गर्त में डुबोना आपके अपने ही हाथ में है।
न बान्धवा न सुहृदो न धनानि महान्त्यपि ।
अलं धारयितुं शक्तास्तमस्युग्रे निमज्जतः ॥ 221 ॥
असत्य-भाषण करके स्वयं अपने आपको गहरे अन्धकार में धकेलने वाले
की उसके आत्मीय बन्धु-बान्धव, हित चिन्तक मित्र तथा विपुल धन सम्पदा तथा
समृद्ध-साधन आदि कुछ भी सहायता नहीं कर सकते। उसके उद्धार में किसी
प्रकार समर्थ नहीं हो सकते।
नारदस्मृति / 119