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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 124 of 304

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तो इसके पात्र ही नहीं। जब उन्हें ठीक से कुछ याद ही नहीं रहता, तो फिर वे सही
तथ्यों को प्रस्तुत ही कैसे कर सकते हैं ?
स्वसाक्षिवर्जितो यस्तु दैववादी कथञ्चन।
उद्धारं तस्य नेच्छन्ति दिव्यैनापि मनीषिणः ॥ 231 ॥
साक्षी को साक्ष्य देने से रोकने वाले व्यक्ति को धर्म पर आस्था और ईश्वर पर
विश्वास रखने वाला माना ही नहीं जा सकता; क्योंकि साक्ष्य तो विवाद-निर्णय में
सहायक होने के कारण धर्मकार्य है और उसमें बाधा डालना तो बड़ा भारी पाप है।
धर्म और न्याय इस पापकर्म की अनुमति नहीं देते, अपितु इसे दण्डनीय अपराध
मानते हैं।
निर्दिष्टेष्वर्थजातेषु साक्षी चेत् साक्ष्य आगते।
न ब्रूयादक्षरसमं न तन्निगदितं भवेत् ॥ 232 ॥
निर्दिष्ट विषयों में साक्ष्य देने के लिए उपस्थित व्यक्ति अपने वक्तव्य की
सत्यता को सिद्ध करने के लिए समुचित प्रमाण नहीं जुटा पाता। ऐसे साक्षी की
उपस्थिति को भी अनुपस्थिति के रूप में ही लेना चाहिए; क्योंकि ऐसे व्यक्ति ने
आकर भी विवाद-निर्णय में कुछ सहयोग नहीं किया।
देशकालवयो द्रव्य प्रमाणाकृतिजातिषु।
यत्र विप्रतिपत्तिः स्यात् साक्ष्यं तदपि चान्यथा ॥ 233 ॥
साक्षी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य में और वास्तविक रूप में सम्बद्ध घटना के घटित
होने के स्थान, समय, सम्बद्ध व्यक्ति की आयु, जाति तथा आकृति और विवाद का
विषय बनी धन-राशि के परिमाण आदि के सम्बद्ध में उलट-फेर मिलने पर साक्ष्य
को असिद्ध और अमान्य घोषित कर देना चाहिए; क्योंकि ऐसे साक्ष्य को वास्तविकता
से परिचित माना ही नहीं जा सकता।
ऊनं वाप्यधिकं वार्थं प्रब्रूयुर्यत्र साक्षिणः।
तदप्यनुक्तं विज्ञेयमेष साल्यविधि स्मृतः ॥ 234 ॥
साक्ष्य स्वीकृति का यह भी नियम अथवा विधान है कि लेन-देन में आयी
और विवाद का विषय बनी धन-राशि के परिमाण को यथार्थ रूप में बताने के
स्थान पर न्यूनाधिक बताने वाले साक्षी के वक्तव्य को भी पूर्णतः अमान्य एवं
असिद्ध घोषित कर देना चाहिए।
प्रमादाद्धनिनो यत्र न स्याल्लेख्यं न साक्षिणः।
अर्थ चापह्नुते वादी तत्रोक्तस्त्रिविधो विधिः ॥ 235 ॥
उत्तमर्ण धनिक ने अधमर्ण को ऋण देते समय प्रमादवश न तो लिखा-पढ़ी
की है और न ही किसी को साक्षी बनाया है, विश्वास पर धन दे दिया है और अब
अधमर्ण ने विश्वास भंग करते हुए ऋण लेने को नकार दिया है। इस स्थिति में
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